मैं अपने एक इंस्पेक्टर को कहा रहा था कि कहीं से दिनकर की उर्वशी खरीद लायें। मेरी प्रति खो गयी है।
मेरे एक गाडी नियंत्रक पास में खडे थे। बोले - साहब आपने पिछली बार दिल्ली भेजा था तो कुछ लोग वहां बात कर रहे थे कि आपकी हिंदी के बारे में अगर कोई प्राबलम हो तो एक साईट इण्टरनेट पर खुली है। नारद के नाम से। कोई कनाडे और दुबई वाले ने मिल कर खोली है। आप तो इन्टरनेट देखते रहते हैं, उनसे नारद पर सहायता ले सकते हैं।
मैं देखता रह गया । नारद की ख्याति फैल रही है। पर किसा रुप में!
Tuesday, April 3, 2007
नारद और हिंदी के हर मर्ज की दवा
@gyandutt I'm reading: नारद और हिंदी के हर मर्ज की दवाTweet this (ट्वीट करें)!
ब्लॉग लेखन - ज्ञानदत्त पाण्डेय Gyandutt Pandey समय (भारत) 5:05 PM
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अरे आपने तो सन्यास ले लिया था। फिर से बैटिंग करने आ गये, चहिये टीम मे सेलेक्ट कर लिया गया है अच्छा प्रदर्शन करियेगा।
शुभकामना
वाह जी..क्या बात है :)
-यह दुबई वाले का तो हमने भी सुना है और कनाडे वाले कौन हैं?? इनका नहीं सुनें हैं, सॉरी. :) वो गाड़ी नियंत्रक साहब जो पास खड़े थे अगर ज्यादा दूर न गये हों तो पूछ कर बताईये न!! शायद नाम जानते हों.. :)
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