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Thursday, May 17, 2007
हुसैन और चन्द्रमोहन दोनो एक ही केटेगरी में आते हैं
@gyandutt I'm reading: हुसैन और चन्द्रमोहन दोनो एक ही केटेगरी में आते हैंTweet this (ट्वीट करें)!
ढ़ाई आखर में “क्या ये खजुराहो को उड़ायेंगे” है. उसमें नसीरुद्दीन जी ने तालिबानियों की खबर ली है:
तालिबानियों को लगा कि बामियान के बुद्ध को नष्ट कर, वे प्रसिद्धि के शिखर पर चले जायेंगे। शिखर पर तो गये पर हमेशा की बदनामी के कलंक के साथ। इतिहास हमेशा उन्हें अतिवादी कठमुल्लों के रूप में याद करेगा। और बामियान के बुद्ध का क्या बिगाड़ा.... वे तो स्मृतियों में थे और स्मृतियों में जिंदा रहेंगे।
....... नसीरुद्दीन
बस, अब वे उसी तर्ज पर, मुस्लिम काल में भारत में हजारों मूर्तियों/मन्दिरों के भंजन को भी, उसी स्पिरिट में, अनुचित ठहरा दें। बड़ी कृपा होगी। अपने को उस विरासत से अलग करलें, तो साफ लगेगा की वे केवल हुसैन को बचने को तालिबान की क़ुरबानी नहीं दे रहे वरन सैद्धांतिक बात कर रहे हैं।
पर हुसैन जी फिर भी धतकरम वाले रहेंगे। उनके साथ एक और नाम जुड़ गया है - चन्द्र मोहन का। सायाजी विश्व विद्यालय मे उनके कारण बवाल चल रहा है। मानवाधिकार वाले मोर्चा सम्भाले हैं।
आइए हाथ उठाएं हम भी में लाल्टू जी उसे सेनसेशनलाइज करते हैं : हमला कलाकारों पर है. अभी तक किसी को मारा नहीं है.
पर चन्द्र मोहन के बारे में पॉयोनियर में लिखा है : इस कलाकार ने "कमोड पर नग्न ईसा मसीह के गिरते वीर्य" और "बच्चा जनती नग्न औरत" जिसका कैप्शन था "दुर्गा माता" जैसे अश्लील चित्र बनाये।
अगर पायोनियर का लिखा पढ़ें तो ये कलाकार कुत्सित और बजारू प्रतीत होते हैं। आप पायोनियर का लेख पढ़ाने की कृपा करें। उसके बाद ही अपना खेमा, यदि तय करना चाहते हों, तो करें।
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और एक बात। खजुराहो या हिंदू साहित्य में नग्नता का घिसा रिकार्ड न बजायें, कृपया। उस के बारे में पहले ही मैं भी लिखा चुका हूँ "हुसैन क्यों फंसे हैं" में।
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8 महत्वपूर्ण टिप्पणियां:
भाइ जी अब ये नजर नही आयेगे या कोई और कहानी शुरु कर देगे बस यही है इनका सारा इतिहास,भूगोल.नागरिकशात्र, हसी तब आती है घुघुती जी जैसो को भी ये प्रयोग कर डालते है अपने घृणित कार्य्क्रम मे
सत्य वचन महानुभाव.
सही लिखा आपने.
मै भी अरुण जी से सहमत हूँ।
नसीरुद्दीन जी नहीं आये
यह पोस्ट नेट पर चढ़े 24 घंटे से ज्यादा हो गये हैं पर नसीरुद्दीन जी नहीं आये. स्टैटकाउंटर गवाह है कि लोग रिपीटेड वे में झांक-झांक कर गये. शायद यह जानने कि कोई टिप्पणी चल रही है या नहीं.
अरुण जी सही टिप्पणी दे रहे थे. नसीरुद्दीन जी किसी और विषय पर किसी और प्रकार से लिखेंगे. तालिबान को नकारना आसान है पर भारत में मन्दिरों का भंजन गलत हुआ – यह मानना रिलीजियसली अप्रिय होगा.
इतिहास में क्या हुआ, उसे छोड़ देना चाहिये. मन्दिरों का भंजन गलत था. बाबरी ढ़ांचे का भंजन भी गलत था. भूल चूक लेनी देनी. आगे चलो. पर ढ़ाई आखर/हाशिया/मुहल्ला जैसा सेकुलरिज्म बन्द कर सही माने में प्रेम प्यार बढ़ाओ. इस देश में जनसंख्या विस्फोट के बावजूद बहुत स्पेस है – हिन्दू के लिये भी और मुसलमान के लिये भी. शांतिपूर्ण सह अस्तित्व केवल नारा नहीं – जरूरत भी है. नसीरुद्दीन जी आयें. मैं इतिहास का सवाल वापस लेता हूं.
आपको हिन्दी ब्लाग का चाचा चौधरी कहने पर कोई शक नही है।
अखिर मे सच तो है ज्ञान जी का दीमाग वैसे ही हलचल थोड़े ही करना है।
पोयोनियर पढ़ लिया है और सचाई जान ली है परंतु अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का राग अलापने वाले यह सब जानकर भी आँखें मूँद लेंगे।
कुछ दिनों पहले एक पोस्ट में लिखा था :
"धर्मनिरपेक्षता बहुत महान मूल्य है.बहुत ज़रूरी भी . पर धर्मनिरपेक्षता मूर्खता और फ़ूहड़पन को धो देने वाला साबुन नहीं है . धर्मनिरपेक्षता तर्कशून्यता और जाहिली को ढंकने वाला मुखौटा नहीं है ."
शायद मौजू हो .
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