Thursday, May 31, 2007

लिंक से लिंक बनाते चलो

काकेश; लगता हैं बड़े मंजे ब्लॉगर हैं। अरे वाह हम भी लिंक्ड हुई गवा नाम से एक बढ़िया पोस्ट लिखी हैं। यह रेखांकित करती है ब्लॉगिंग के मेन फन्डा को। आप को अगर पोस्ट पढ़वानी है तो लिन्क कीजिये - लिंक लाइक मैडजितना अधिक आप लिंक करेंगे, जितना विस्तार आपकी लिंकिंग में होगा उतनी आपकी हिटास बुझेगी। अब यही परेशानी है की काकेश की (या किसी अन्य की) खुराफात (!) कुछ ऐसा लिंक न कर दे की वह रसायन शास्त्र ही नहीं दर्शन शास्त्र नजर आये!
जब मैं यह लिखता हूं कि लिंक लाईक ए मैड तो मैं यह अन्डरलाईन करना चाहता हूँ कि ब्लोगरी एकांत में लिखा जाने वाला लेखन नहीं हैं। इसलिए जो वह लिखते हैं जिसे केवल आइन्स्टीन पढ़ सकता हैं तो वह गफलत में रहते हैं। ब्लॉग लेखन एक-एक कड़ी की तरह बढ़ता है - जैसे एक व्यक्ति कहानी का एक पैरा सोचे और दूसरा अपनी कल्पना से आगे बढ़ाये, तीसरा और आगे... ब्लोगारी ओर्गेनिक केमिस्ट्री की तरह हैं - कार्बन-हाइड्रोजन बॉण्ड लिंक से लिंक बनाते विशालकाय अणु बन जाते हैं। अंतत: जो पदार्थ सामने आता हैं उसकी लिंक बनाने की प्रक्रिया प्रारम्भ करते समय कल्पना भी नहीं की गयी होती। अब देखिए न - काकेश अब तक लिंक का उल्लेख कर सफ़ाई दे रहे थे की वे नारी नहीं नर हैं और शादी शुदा हैं। कल बहुत संभव हैं की वे रसायन शास्त्र के गुण-दोष की चर्चा करने लगें। परसों अगर कोई और मैड लिंकर किसी और विज्ञान/शास्त्र को जोड़ बैठा तो बात किसी और तरफ मुड़ जायेगी।
काकेश लिंक मिल रहा हैं न!

प्रतिक्रियायें :
 

5 Comments:

Udan Tashtari said...

सच में, हैं तो मंजे हुये ब्लॉगर. :)

ज्ञान प्राप्ति तो सब को हो गई है. अब लिंक से लिंक बनाते चलें. शुभकामनायें.

अभय तिवारी said...

तो ये था आपकी ऑर्गेनिक केमिस्ट्री का रहस्य..अब समझा .. सही उपमा है..

अनूप शुक्ला said...

ब्लोगरी एकांत में लिखा जाने वाला लेखन नहीं हैं। इसलिए जो वह लिखते हैं जिसे केवल आइन्स्टीन पढ़ सकता हैं तो वह गफलत में रहते हैं। सत्यवचन! हम आपसे सहमत हैं!

अतुल शर्मा said...

जितना अधिक आप लिंक करेंगे, जितना विस्तार आपकी लिंकिंग में होगा उतनी आपकी हिटास बुझेगी।

आपने ज्ञान करा दिया, यही तत्वज्ञान है ब्लॉगिंग का।

परमजीत बाली said...

अच्छी जानकारी है।

कुछ पोस्टें: