अब देखें – ऐसा कई बार होता है कि आप पूरा लेख पढ़ जायें; आपके पल्ले कुछ शब्दों की चिन्दियां भर पडें.
गज भर लम्बा लेख आप इस लालच में पढ़ें कि आप उसपर कुछ मस्त टिपेरकर इंटेलेक्चुअल छाप काम करेंगे. पर अंत तक आते-आते आपको लगे कि चिठेरा लेख में जो कुछ ले कर चला था उसका कुछ उलट ही सिद्ध कर रहा है. लेकिन आप की हिम्मत न बने कि यह बोध शब्दों मे लिख सकें. यानि फ्राड चिठेरा आपको इतना कंफ्यूजिया दे; उसका इंटेलेक्चुअल होने का लेबल आपको ऐसा टैरराइज कर दे; कि आप चुप-चाप दबे पांव वापस चले आयें उस वेब साइट से.
ऐसा मेरे साथ कई बार हुआ है. मैने कुशा ले कर संकल्प भी किया है कि उन साइटों पर नहीं जाऊंगा. पर धुरविरोधी के शब्द उधार लूं, तो निषेध ही निमंत्रण वाली थ्योरी के अनुसार फिर वहां के चक्कर मार आता हूं.
ये ब्लॉगर 80-98 आई.क्यू. बैण्ड वाले पाठक को सामने रख कर क्यों नहीं लिखते चिठ्ठा? क्यों अपने को सुपर इंटेलेक्चुअल प्रमाणित करना चाहते है? क्यों वे पढ़ने वाले को सच्चिदानन्द हीरानन्द वात्स्यायन अज्ञेय (वाकई!) मान कर चलते हैं? क्यों वे सही-साट और साधारण बात न करने की कसम खाये बैठे हैं?
जरूरी नहीं कि वे अपने ब्लॉग को संता-बंता डॉट कॉम की पूअर कॉपी बना दें. पर वे समझ में आ जाये, ऐसा तो लिख सकते हैं.
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स्पष्टीकरण (यह टिप्पणी में भी है)
इतने लोगों ने कहा है तो स्पष्टीकरण देना पड़ेगा ही. मैं उदाहरण देता हूं – ब्लॉगरी से नहीं, हिन्दी साहित्य से. भारतेन्दु जी, मुंशी प्रेम चन्द जी सबकी समझ में आते हैं. पढ़्ते चले जाने का मन करता है. वहीं अज्ञेय जी, जैनेन्द्र कुमार जी और राजेन्द्र यादव जी के पन्ने दर पन्ने पढ़ जाइये. उसके बाद सिर खुजाना पड़ता है. ज्यादा पढ़ लिया तो कायम चूर्ण की तलब होती है. कविता में दिनकर जी को पढ़ें तो सस्वर पाठ करने लगते हैं. मन होता है कि राह चलते को रोक लें और सुना कर छोड़ें कुरुक्षेत्र. पर कई कवि हैं कि आसमान में चांद पर लिखते है पर वर्णन जलेबी का करते हैं.
ब्लॉगरी में रोज नये जुड़ रहे हैं. इनमें से ज्यादातर शाम को घर लौटते नेनुआ, सतुआ, भूंजा और किराने के सामान की पन्नी ले कर आते होंगे. उनको घर आने पर बुद्धिवादी और तथाकथित बुद्धिवादी लोगों के गरुह-गरुह ब्लॉग पढ़ने को मिलें तो उनका कष्ट मेरे कष्ट जैसा ही होगा. न हो तो कहे सुने की माफी.





19Comments so far:
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सुनीता(शानू)
यदि आपका अर्थ यही है तो सरल हिन्दी का पक्षधर होने के बावजूद मैं कहूँगा कि कुछ लोगों के लिए जो हिन्दी मुश्किल है दूसरों के लिए सामान्य है।
इस बारे में हम और कुछ तभी कह सकते हैं जब आप अपनी बात सपष्ट करें।
अब तक तो मैं सोचता था कि शायद ये मेरे अल्पबुद्धि होने के कारण ही हो पर आपकी बात से लगता है कि गड़बड़ कहीं और है.
ब्लॉगरी में रोज नये जुड़ रहे हैं. इनमें से ज्यादातर शाम को घर लौटते नेनुआ, सतुआ, भूंजा और किराने के सामान की पन्नी ले कर आते होंगे. उनको घर आने पर बुद्धिवादी और तथाकथित बुद्धिवादी लोगों के गरुह-गरुह ब्लॉग पढ़ने को मिलें तो उनका कष्ट मेरे कष्ट जैसा ही होगा. न हो तो कहे सुने की माफी.
काहे जाते हो ऐसी गली जिसका रास्ता नहीं मालूम खुद उनको जिनकी गली है तो आप तो खूब समझ सके.. हा हा!!
मस्त रहो और व्यस्त रहो का सिद्धांत अपना लो, सुखी रहोगे. सब समझना आवश्यक नहीं. :)
बधाई यह ज़ज्बा दिखाने को.
Samajh mein nahin aanewaala chittha, chitthakaar ki mazboori ki paidaeesh hai.Kaisi mazboori?Wahi, pehchaan khone ke dar se paida honewaali mazboori.Samajh mein nahin aaye, aise chitthon se hi to pehchan bani hai. Aur aap chaahte hai ki woh aisa kuchh likhein jo sabhi ki samajh mein aa jaaye..Kisi ki pehchan chali jaaye, aisa aap kyon chaahte hain?
Aur ek baat hai.Aise chitthakar is baat se chintagrast rahte hain ki aaj se 50 saal baad hindi bhasha kaisi rahegi..
Aapne kabhie hindi bhasha ke bhavishya ke baare mein socha hai?
Apni apni shaili ho sakti hai.Lekin samajh mein na aaye, ye kaun si shaili hai bhaiya.
जब 'आंखिन की देखी' और अनुभूत सच्चाई की बजाय आदमी 'कागद की लेखी' के गरब-गुमान में लिथड़ जाता है और सामने वाले को चित्त कर देने के उद्देश्य से तगड़ा फ़ोकस मारना चाहता है तब विट्जेंसटाइन के शब्दों में भाषा छुट्टी पर चली जाती है . और तब भाषाई विकलांगता और ज्ञान के अजीर्ण का 'लीथल कॉम्बीनेशन' एक धाकड़ किस्म की 'कन्फ़्यूजियाने' और 'टैररियाने' वाली पोस्ट का प्रजनन करता है. शेक्सपीयर से इसके लिए एक जुमला उधार लूं तो कह सकता हूं : 'अ टेल टोल्ड बाय एन ईडियट सिग्नीफ़ाइंग नथिंग'.
पर इसका मतलब यह भी नहीं है कि पोस्ट को लॉलीपॉप की तरह इंस्टैंट घुलनशील होना चाहिए.थोड़ा बहुत अक्किल तो लगानी पड़ेगी . कई लोग पोस्ट के पास जाते हैं और दिमाग घर भूल आते है. कुछ लोग उसकी एफ़डी करवा कर मुस्कुराते घूमते हैं यह सोचकर कि हारे दर्ज़े पांच-सात साल में डबल तो होना ही है .
मामला गंभीर है . विद्वानों से गहन विचार-विमर्श की मांग करता है. अविलंब एक जांच समिति बिठाई जाए .
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