Wednesday, June 20, 2007

नारद का कलेवर अखबार जैसा करें जनाब!


@gyandutt I'm reading: नारद का कलेवर अखबार जैसा करें जनाब!Tweet this (ट्वीट करें)!

मैं अखबार के स्पोर्ट्स और फिल्म के पन्ने पर शायद ही जाता होऊं. भरतलाल (मेरा भृत्य) केवल फिल्म के पन्ने निहारता है. नगर/महानगर/अंचल की खबरें मेरे पिताजी पढ़ते हैं. यानि हर एक की पसन्द का अपना पन्ना. अखबार को ले कर घर में कोई चौंचियाहट नहीं है.

वही हाल नारद का होना चाहिये. हिन्दू का पन्ना; मुसलमान का पन्ना, सेकुलर का पन्ना; बच्चों का पन्ना, बाड़मेर पुलीस का पन्ना, खेल का पन्ना, रेल का पन्ना, बैन का पन्ना, कविता का पन्ना, सभ्य का पन्ना, गाली देने वाले का पन्ना.... सब अपने ब्लॉग को मन माफिक पन्ने के ऊपर पंजी करा लें. या फिर सहूलियत हो कि लिख्खाड़ ब्लॉगर लोग जो दिन में 5 पोस्ट लिखें और वे पांच अलग अलग पन्नों पे टंग जायें – उनके टैग के मुताबिक. उनकी सहूलियत के लिये दो चार और पन्ने क्रियेट कर दिये जायें - भुतहे पन्ने जहां कभी कोई भूले भटके ही जाता हो.

मेरा कर्तव्य नारद के वर्तमान झाम का सॉल्यूशन सोचना था. तकनीकी सिर फोड़ी जीतेन्द्र जैसे करें. वैसे भी लोग उनको तलाश रहे हैं! कुछ बाड़मेर पुलीस वाले ब्लॉग पर एफ.आई.आर. न कर आये हों!

कैसी लगी ये मुन्नी (मिनी) पोस्ट? जब प्रिय लोगों ने टार्गेट दिया है 1000 पोस्ट का तो ऐसी मुन्नी पोस्ट ही बन पायेंगी!
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Joke apart, I feel, some kind of segregation will help. Once you have proliferation and variety in the content and do not want to police the Blog content (which otherwise you cannot do), the better option is sorting the Blogs and letting people decide where they want to go or what they want to read.
At present energy is wasted in clicking and finding that you have come to a post which is not in synchronism with your thought. But once you come to a post, like an obsessive blogger,you read and you fume and you comment and then suck your thumb because your comment will not make the chap change his views!
Sarcasm in comments, if avoided, can serve the purpose to a large extent. A post on Effective Commenting by Mr Sameer Lal is long over-due!
लगता है ब्लॉग में अंग्रेजी ठूंसने पर अमित और श्रीश अपनी कृपाणें ले कर आने वाले होंगे!

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प्रतिक्रियायें :
 

18 महत्वपूर्ण टिप्पणियां:

अनूप शुक्ला said...

इस बारे में विद्वान लोग बहुत पहले से विचार कर रहे हैं। अलग-अलग कैटेगरी में ब्लाग लिस्ट किये जायें। अब अपना ब्लाग किस कैटेगरी में रखना चाहेंगे यह तय करें! फिल्हाल होते-होते आप पचास-साठ पोस्ट और बना लीजिये!

अरुण said...

१० टैग वाले पन्ने और ज्ञान जी की १०० शब्दो वाली पोस्ट मे हर एक टैग १०/१० बार,बस हर जगह ज्ञान जी नजर आयेगे
:)

SHASHI SINGH said...

आपकी राय दरअस्ल वक़्त की जरूरत है। इस पर तकरीबन साल भर से चिंतन चल रहा है, अब देर करना ठीक नहीं।

अनुनाद सिंह said...

अब चिट्ठे बहुत अधिक हो गये हैं इसलिये यह कार्य आवश्यक भी है और उपयोगी भी। मुझे लगता है कि इसमें कुछ कठिनाइयाँ जरूर हैं लेकिन एक व्यावहारिक हल निकाला जा सकता है। इस पर नारद को गम्भीरता पूर्वक विचार करना चाहिये।

हिन्दी के बीच में अंगरेजी ठूस देना मुझे भी बुरा लगता है।

संजय बेंगाणी said...

कुछ टंटो की वजह से यह काम अटका पड़ा है. विचार चल रहा है. सुझाव अच्छा है.

आप अंग्रेजी के ज्ञाता है, इसे स्वीकार लिया गया है :)

आलोक पुराणिक said...

वैधानिक चेतावनी -यह व्यंग्य नहीं है।
कुछ सुझाव
-सारे चिठ्ठे वैसे तो नजर आयें, जैसे अभी आ रहे हैं। यानी एक मल्टीप्लेक्स,या बड़े डिपार्टमेंटल स्टोर टाइप। सारी वैराइटी के चिठ्ठों का ओवरव्यू एक जगह हो सके।
-फिर मोटी-मोटी कैटेगिरी-राजनीतिक, साहित्यिक, प्रवचन, तकनीकी जुगाड़मेंट के तहत चिठ्ठों का वर्गीकरण किया जा सकता है। इनके अलग से लिक दिये जा सकते हैं।
-मेरे चिठ्ठे का लिंक-गंभीर चिंतन, दर्शन, समाजशास्त्र, के तहत दिया जाना चाहिए।
पब्लिक की डिमांड हो, तो व्यंग्य के तहत भी दिया जा सकता है।
आलोक पुराणिक

masijeevi said...

हिन्दी के बीच में अकारण अंगरेजी झाड़ देना मुझे भी खास अच्‍छा नहीं लगता। आपकी अंग्रेजी अच्‍‍छी ही होगी हमारे प्रमाण की क्‍या दरकार- हमारी अंगेजी खराब ही है- लीजिए वैसे ही मान लेते हैं- लो हो वैसे ही हो गए कुंठित।

इस अलग अलग टैग वाले मुद्दे पर पहले भी सुझाव दिया गया है- ओपेरा ब्राउजर की तरह टैग वाले पेज बनाए जा सकते हैं या जो तकनीकी तरीका तकनीकज्ञ निकालें

Shrish said...

ज्ञानदत्त जी इस बारे में पहले भी विचार हुआ है कि नारद पर ब्लॉगों की श्रेणियाँ बनाई जाएं, पर हिन्दू-मुस्लिम आधार पर नहीं बल्कि साहित्य, काव्य, तकनीकी आदि आधार पर। विषय आधारित ब्लॉग अधिक न होने से फिलहाल इसको टाल दिया गया लेकिन आगे जब ब्लॉगों की संख्या हजारों में पहूँचेगी तो ऐसा करना आवश्यक होगा।

लगता है ब्लॉग में अंग्रेजी ठूंसने पर अमित और श्रीश अपनी कृपाणें ले कर आने वाले होंगे!

हा हा, यह बात पढ़कर बहुत देर हँसता रहा। :) बाकी यह भी पता लगा कि आप बिना गुस्से के भी अंग्रेजी बोलते हैं।

अमित और श्रीश को इंग्लिश से कतई कोई विरोध नहीं, बल्कि दोनों ही इस मामले में कई हिन्दी चिट्ठाकारों से भिन्न विचार रखते हैं कि वर्तमान परिदृश्य में अंग्रेजी का ज्ञान आवश्यक है। लेकिन चूंकि नारद हिन्दी ब्लॉगों के लिए बनाया गया है अतः अपेक्षा की जाती है कि यहाँ हिन्दी में लिखा जाए बाकी थोड़ी बहुत अंग्रेजी से आपति नहीं जैसा कि नारद जी भी कहते हैं।

हाँ अगर कोई लगातार पूरी की पूरी पोस्टें अंग्रेजी में लिखना चाहे तो अलग से इंग्लिश ब्लॉग बनाना उचित है।

Raviratlami said...

आपने कल ही ज्ञान झाड़ा कि हिन्दी वाले मलाई को मथ कर छाछ बना देते हैं (संदर्भ नारद) तो फिर अभी छाछ के बाद ये क्या बनाया जा रहा है?

जोक्स अपॉर्ट, योर सजेशन इज राइट, हैड बीन थॉट अर्लियर, एण्ड व्हेन क्वांटिटी गोज बियांड ए क्रिटिकल मास, देयर विल बी नो ऑप्शन बट टू कैटेगराइज देम...

अब ये अलग बात है कि श्रेणी आपके सुझाए अनुसार होती है या नहीं :)

मैंने इशारा किया है - अंग्रेजी आप ऊपर लिखे अनुसार भी लिख सकते हैं तब शायद अमित , श्रीश वगैरह को कोई आपत्ति न हो...

अनुराग भारती said...

SHASHI SINGH कहा था...
आपकी राय दरअस्ल वक़्त की जरूरत है। इस पर तकरीबन साल भर से चिंतन चल रहा है.

इतना देरी तो ज्ञानीजी की छुक छुक रेलगाड़ी भी नहीं करती

Sanjeet Tripathi said...

थोड़ा मुश्किल काम होगा कैटेगराईज़ करना!!

अब आपकी अंग्रजी से तो तकलीफ़ उन्हें होगी ना जिन्हें अंग्रेजी आती होगी। अपन के टाईप लोगों को जिन्हें अंग्रेजी नही आती वो तो अंग्रेजी वाला पैराग्राफ़ देखेंगे ही नहीं ऐसे ही सटक लेंगे!!

अतुल शर्मा said...

शायद आने वाले समय में यह भी देखने को मिले।

eSwami said...

हमें बहुत खुशी होती है जब हमसे अपेक्षाएं लगाई जाती हैं - अपेक्षाएं अपनों से ही होती हैं.

ज्ञानदत्त जी, इधर देसी जनता एक ही ब्लाग पर, एक पोस्ट में दफ़्तर में बैठ कू अपनी मम्मी की याद में कविता करती और दूसरी में नये जॉब पर जावा की वेब-सर्विस बनाने में आई समस्या का हल पूछती है!

कई बार तो एक ही पोस्ट में अलग अलग पैरा में चार अलग अलग विषय पर बात होती है, कौन सी पिच्चर देखी, वेजिटेरियन होने के फ़ायदे, दारू पीने के नुकसान, यू.एन. में भारत की पक्की सीट काहे नही है आदी और पोस्ट होती है "ऐसे ही"/"यूं ही" श्रेणी में लिखी गई.

हमें ब्लागर्स को पूरी स्वतंत्रता देते हुए कोई गरिमापूर्ण हल निकालना होता है. चलिये आन द फ़्लाई डाईनामिक वर्गिकरण की बात करें - टैग आधारित वर्गिकरण की बात करें, सीधे टैग या कीवर्ड आधारित वर्गिकरण भी नही किया जा सकता मसलन "जावा" माने कॉफ़ी या प्रोग्रामिंग लेंग्वेज़?

लेकिन इसका मतलब यह भी नहीं की ये वर्गिकरण कोई असंभव कर्म हो. सच बोलूं तो मैने अभी इस पर उथला-उथला ही सोचा है और वैसे अपनी सोच ज्यादा गहरी नही है.. ज्यादा गहराई से डर लगता है!

आपकी पोस्ट अच्छी लगी - समझ में आ गई ना इसलिये. ;-)

Sagar Chand Nahar said...

आपसे विनम्र अनुरोध है कि मुझ जैसे सिर्फ हिन्दी के जानकारों पर रहम करें। आपने अंग्रेजी में क्या लिखा है हम तो पढ़ ही नहीं पाये और आपके अमूल्य लेखन को पढ़ने से वंचित रह गये।

Sanjeeva Tiwari said...

आदरणीय, आपकी व्‍यथा हम समझ रहे हैं कम से कम मैं प्रयास करूगा बेबजह ब्‍लगिया के पाठक के समय को व्‍यर्थ न करने का । श्रीमननारायण नारायण का गुरू मंत्र दिया है उसका पालन होगा ।

mahashakti said...

कम शब्‍दों में काफी कुछ कह गये।

पर एक बात ध्‍यान देने योग्‍य हे जो स्‍वामी जी ने कहा है कि
्ञानदत्त जी, इधर देसी जनता एक ही ब्लाग पर, एक पोस्ट में दफ़्तर में बैठ कू अपनी मम्मी की याद में कविता करती और दूसरी में नये जॉब पर जावा की वेब-सर्विस बनाने में आई समस्या का हल पूछती है!

कई बार तो एक ही पोस्ट में अलग अलग पैरा में चार अलग अलग विषय पर बात होती है, कौन सी पिच्चर देखी, वेजिटेरियन होने के फ़ायदे, दारू पीने के नुकसान, यू.एन. में भारत की पक्की सीट काहे नही है आदी और पोस्ट होती है "ऐसे ही"/"यूं ही" श्रेणी में लिखी गई.

हम लोग एक ही ब्‍लाग में कई श्रेणी में रचना करते है। हमारे लिये निर्धारण में दिक्‍कत आयेगी।

Udan Tashtari said...

सुझाव तो बेहतरीन हैं मगर यह अंग्रेजी का क्या शुरु किया गया है आजकल. जरा बतायें तो. कोई फायदा होता होगा तो हम भी कोशिश करें. एक ठो डिक्शनरी जुगाड़ लाये हैं. :)

अनामदास said...

वर्गीकरण करिएगा तो मुश्किलें अगर बढ़ेंगी नहीं तो कम भी नहीं होंगी. किसी संगीतकार के निधन पर लिखे ब्लॉग को कहाँ रखिएगा, समचार, विचार, संगीत,कला,मनोरंजन या मातमपुर्सी में...ऐसे सैकड़ों उदाहरण हैं...मैच फिक्सिंग के आरोप में क्रिकेटर जेल जाएगा तो खेल की कैटेगरी में रखेंगे, कि जेल की कैटेगरी में...मुश्किल अब भी है, तब भी रहेगी, मेहनत करिएगा तो ध्यान रखिएगा कि उसकी क्या सार्थकता है. कुछ कैटेगरी ज़रूर अलग की जा सकती है जैसे कविता, तकनीकी, इधर-उधर की यूट्यूब की क्लिप वगैरह, स्वलिखित सामग्री और किसी किताब से उठाकर बाक़ियों के ज्ञानवर्धन के लिए दी गई सामग्री आदि...वैसे आलोक जी का सुझाव सही है कि पहले जनरल रहने दें फिर जिसे सिर्फ़ कविता पढ़नी हो, वह कविता के लिंक पर क्लिक करे या व्यंग्य पर...
ईस्वामी जी ने काफ़ी गहरी बात कही है, सोचने की ज़रूरत है.
धन्यवाद

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