कल मैने शांती पर एक पोस्ट पब्लिश की थी. कुछ पाठकों ने ब्लॉगरी का सही उपयोग बताया अपनी टिप्पणियों में. मैं आपको यह बता दूं कि सामान्यत: मेरे माता-पिताजी को मेरी ब्लॉगरी से खास लेना-देना नहीं होता. पर शांती की पोस्ट पर तो उनका लगाव और उत्तेजना देखने काबिल थी. शांती उनके सुख-दुख की एक दशक से अधिक की साझीदार है. अत: उनका जुड़ाव समझमें आता है.
कल मेरे घर में बिजली 14 घण्टे बन्द रही. अत: कुछ की-बोर्ड पर नहीं लिख पाया. मैने कागज पर अपने माता-पिता का इंवाल्वमेण्ट दर्ज किया है, वह आपके समक्ष रख रहा हूं.






13Comments so far:
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ये रंगत बढि़या है..
आप की हिन्दी की लिखावट बता रही है कि आठवीं नवीं कक्षा के बाद आप ने कलम लेकर सिर्फ़ अंग्रेज़ी में घसीटा है..
आपके द्वारा समाज में हो रहे सुखद बदलाव की जानकारी अच्छी लगी । ऐसे ही सामाजिक विषयों पर लिखते रहें ।
साभार,
सचमुच , अनूपजी की इंक ब्लागिंग का उन १४ घंटों में सार्थक प्रयोग किया आपने। रचनात्मक...:)
घर के बुजुर्ग जब कई घंटे कंप्यूटर में सिर घुसाए देखते है तो भन्ना जाते हैं कि क्या क्या करते रहते हो इतनी देर कंप्यूटर पर, लेकिन जब उन्हें ऐसे ही किसी अच्छे प्रयोजन के बारे में बताया जाता है तो सुखद सहमति मिल जाती है उनकी और वे भी भाव विभोर हो उठते हैं।
मै कल्पना कर सकता हूं कि आपने कल शान्ति की कहानी पोस्ट की उसके बाद आपके माता-पिता कितने बेकल रहे होंगे उस पर आए लोगों के कमेंट्स जानने को!
अम्मा शान्ती को समझाती हैं-'तू इण्टरनेट पर आई जाबू। दुनियां भर के लोग तोके देखिहीं.'
शान्ती ज्यादा नहीं समझती. सरलता से पूछती है-'कौनो पइसा मिले का?'
--कितना सहज और सरल प्रश्न है! दिल को छू गया. आप कह रहे हैं कि शान्ती ज्यादा नहीं समझती: भाई साहब, यहाँ तो जो ज्यादा समझते हैं वो भी इसी इन्तजार में लगे हैं कि -'कौनो पइसा मिले का?' :)
आपकी हस्त लेखन भी आपके भावुक हृदय होने को प्रमाणित करता है.
आपकी पोस्ट से माता जी, पिता जी के दिल में मची सनसनी को भली प्रकार समझा जा सकता है, जबकि उस पोस्ट नें हम सब के दिलों में सनसनी मचा दी. माता जी और पिताजी को मेरा सादर नमन.
अब इंक ब्लॉगिंग में भी आपकी पताका लहर रही है, देख कर सुखद अनुभूति हो रही है. ऐसे ही आपका हर क्षेत्र में परचम लहराता रहे, इस हेतु शुभकामनायें.
"आरंभ" संजीव तिवारी का चिट्ठा
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