देवी चरण उपाध्याय तो उम्मीद से ज्यादा रोचक चरित्र निकले! कल की पोस्ट पर बोधिसत्व जी ने जो देवीचरण उपाध्याय पर टिप्पणी की, और उसको ले कर हमने जो तहकीकात की; उससे इस पोस्ट का (हमारे हिसाब से रोचक) मसाला निकल आया है.
कल अनूप सुकुल जी की पोस्ट पर वर्षा के बारे में निराशा के साथ टिपेरा तो शाम को वह पूरे रंग समेत चढ़ दौड़ी. दफ्तर से घर आने में भीषण तेज वर्षा में ड्राइवर के और मेरे पसीने छूट गये. रास्ता दीख नहीं रहा था. सड़क पर टखने के ऊपर पानी था. घर में आने पर बिजली नहीं. घर के पीछे गंगा नदी थोड़ी दूर पर हैं. मूसलाधार बरिश से गंगा के किनारे रहने वाले सियारों की मान्दों में पानी भर गया था. सो बाहर निकल कर खूब हुआं-हुआं कर रहे थे. बिजली न हो, तेज हवा और वर्षा हो और सियारों का समूह गान हो तो क्या समा बन्धता है!
कल शाम से बिजली न होने से आज फिर इंक-ब्लॉगिंग का ही सहारा है.
वैसे पिछली पोस्ट पर आप सब ने इतनी बढ़िया टिप्पणियां की हैं कि मैने उनका टिप्पणी में वनलाइनर जवाब भी देना उचित समझा. उतने में लैपटॉप की बैटरी खतम.
खैर, अब इंक में मेरी मारी हुई मख्खियाँ देखें.






7Comments so far:
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बचपना छूट जाये, तो भी बचपन को दोबारा तलाशा जा सकता है,इंक राइटिंग ब्लागिंग में।
आपकी रेलवे तो पूरी दुनिया है। तरह-तरह के कैरेक्टर हैं वहां। पोस्टों का सिलसिला चलायें, जिसमें बताया जाये कि बिना टिकट सफलतापूर्वक यात्रा कैसे करें। देवीचरणजी की तरकीब तो मैंने नोट कर ली है।
देवी चरन चच्चा वाही हिंदी त तोहार नाहीं लगत बा..... लिखावट भले तोहार होई।
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