Friday, September 14, 2007

हरतालिका तीज की पूर्व सन्ध्या की खरीद


(मनिहारी की दुकान में खरीददारी में जुटी महिलायें)
बुरे फंसे हरतालिका तीज की पूर्व सन्ध्या खरीद में. मेरी पत्नी कल शाम को खरीददारी के लिये निकल रही थीं. मैं साथ में चला गया इस भाव से कि इस बहाने शाम की वॉक हो जायेगी. पर पैदल चलना हुआ सो हुआ, खरीददारी में चट गये पूरी तरह. बाजार में बेशुमार भीड़ थी. सभी औरतें तीज के एक दिन पहले ही खरीददारी को निकली थीं. टिकुली, बिन्दी, आलता, रिबन, नेल पॉलिश, शीशा, कंघी, मेन्हदी, डलिया, चूड़ी, कपड़ा, सिंधूरदानी, बिछिया, शंकर-पार्वती की कच्ची मिट्टी की मूर्ति... इन सब की अपनी अपनी श्रद्धानुसार खरीद कर रही थीं वे सभी औरतें. छोटी-छोटी दुकानें, भारी भीड़ और उमस. सारा सामान लोकल छाप और डुप्लीकेट ब्राण्ड. अंतत: वह ब्राह्मण/ब्राह्मणी को दान ही दिया जाना है तो मंहगा कौन ले! पर उसमें भी औरतें पसन्द कर रही थीं रंग और स्टाइल. कीमतों में मोल भाव की चेंचामेची मचा रही थीं.

कुल मिला कर मुझे लगा कि अगर ब्लॉग न लिखना हो और सरकारी नौकरी न हो तो सबसे अच्छा है मनिहारी की दुकान खोल कर बैठना. बस आपमें लोगों की खरीददारी की आदतें झेलने की क्षमता होनी चाहिये और बिना झल्लाये सामान बेचने का स्टैमिना. बहुत मार्केट है!

एक और बात नोट की - त्योहार हिन्दुओं का था पर मनिहारी की दुकान वाले मुसलमान थे.

पत्नी जी जब तक खरीददारी कर रही थीं - तब मोबाइल से मैने कुछ फोटो लिये दुकानों के. उनमें से दो का आप अवलोकन करें.
(सड़क के किनारे ठेले पर लगी तीज विषयक दुकान)
अब हरतालिका तीज के बारे में कुछ पंक्तियां सरका दी जायें. शैलराज हिमालय की पुत्री ने शिव को वर रूप में पाने के लिये विभिन्न प्रकार से तप- व्रत किया:
नित नव चरन उपज अनुरागा, बिसरी देह तपहिं मनु लागा ||
संबत सहस मूल फल खाए, सागु खाइ सत बरष गवाँए ||
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पुनि परिहरे सुखानेउ परना, उमहि नाम तब भयउ अपरना ||
देखि उमहि तप खीन सरीरा, ब्रह्मगिरा भै गगन गभीरा ||
भयउ मनोरथ सुफल तव सुनु गिरिजाकुमारि, परिहरु दुसह कलेस सब अब मिलिहहिं त्रिपुरारि ||
शैलजा को जब तप-व्रत से शिव मिल गये तो वही फार्मूला हमारी कुमारियों-विवाहिताओं ने अपना लिया. उमा की तरह सहस्त्रों वर्ष तो नहीं, हरतालिका तीज के दिन वे निर्जल व्रत और शृंगार कर शिव जैसा पति पाने की कामना करती हैं. भगवान उन्हें सफल करें और इस प्रक्रिया में सभी पुरुषों को शिव जैसा भोला-भण्डारी बना दें!
वैसे कल हमें पता चला कि बाबा तुलसीदास अपनी वसीयत तो विद्वानों के नाम कर गये हैं. हम जैसे लण्ठ के हाथ तो गड़बड़ रामायण ही है. लिहाजा तुलसी को उधृत करना भी शायद साहित्यिक अपराध हो!

बढ़िया है; बाबा ने अपने जमाने में संस्कृत के साहित्यिक पण्डितों को झेला और अब हिन्दी के साहित्यिक पण्डित उनपर अधिकार करने लगे! जय हो! जिस "मति अनुरूप राम गुन गाऊं" को उन्होने "गिरा ग्राम्य" में आम जन के लिये लिखा, अंतत: साहित्यकारों ने उसपर अपना वर्चस्व बना ही लिया.

बोधिसत्व और अभय क्षमा करें. वे मित्रवत हैं, इसलिये यह फुटनोट लिखा. अन्यथा चुप रह जाते!

प्रतिक्रियायें :
 

13 Comments:

Udan Tashtari said...

मनिहारी की दुकान खोल कर भी तो ब्लॉगिंग कर सकते हैं. फुटनोट बंदों से चिंता न पालें, अपने हिसाब से चलें.

अरुण said...

रहीमन गाय बजाय के दियो काठ मे पाव..? ये आप को क्या सूझी ..? कहा चल दिये थे आप .. ? हमे तो डर है कि अब कही रिटायर होकर यहा से वहा ना शिफ़्ट हो जाओ..? लेकिन चिंता नही है वो रोग आपके बस का है नही लौट जल्दी ही आओगे..

अभय तिवारी said...

माफ़ी.. ज्ञान भाई!!

ALOK PURANIK said...

एक दुकान की फोटू के ऊपर पर्सनाल्टी डेवपलमेंट का बैनर लगा हुआ, बोले तो पर्सनाल्टी चमकानी हो, तो दुकानदारी और वो भी लेडीज के आइटमों की दुकानदारी करनी चाहिए। साड़ी की दुकानदारी बंदे को एकाध हफ्ते में इत्ता धैर्यवान बना देती है कि वह मोक्ष के करीब हो जाता है। ये वाला कलर वो वाला डिजाइन,वो वाला फिनिश और यह वाला प्राइज -सारे कांबिनेशन्स जमाना सीख लेता है। पर दुकान खोलने के मामले गोलगप्पे की दुकान खोलना सही विकल्प है। हुल्लड़ मुरादाबादी की कुछ लाइनों का आशय यह है कि चाहता है जो हसीनों से करीबी,चाट का ठेला लगा ले।
अभी जरा काम धाम से फुरसत मिल जाये, तो इंडिया गेट पर चाट का ठेला लगाना है। ज्वाइंट वेंचर चाहिए, तो अभी से पईसा भिजवा दीजिये।

Shiv Kumar Mishra said...

'धर्म परिवर्तन' का ज़माना है. आईडिया बुरा नहीं है. ब्लागर धर्म वाले धर्म परिवर्तन का सहारा लेकर 'खुदरा-व्यापार धर्म' की शरण में जा सकते हैं. ख़तरा केवल रिलायंस और भारती ग्रुप से रहेगा.

@पुराणिक जी,
सर प्राइवेट इक्विटी के लिए कोई संभावना हो तो बताईयेगा. हम तैयार हैं. नाम भी सजेस्ट कर दे रहा हूँ. कार्पोरेट के नाम के हिसाब से 'ए पी वाटर बाल्स लिमिटेड' (मेरा मतलब फुचका के ठेले से है) ठीक रहेगा. फ़ूड प्रोसेसिंग के नाम पर चलाया जा सकता है.:) :)

Neeraj Rohilla said...

ज्ञानदत्तजी,
अगर हमने कभी कोई दुकान खोली तो कचौडी की दुकान खोलेंगे । हमारे घर के पास (मथुरा में) मोहन मिष्ठान्न भंडार है, मोहन भैया सुबह ४ घंटे के लिये भगवान बन जाते हैं । हर कोई चिल्लाता है, मोहन भाई दो कचौडी, मोहन भाई ६ कचौडी । और मोहन भाई जिसे देख लें वो निहाल हो जाये ।

दुकान खोलेंगे तो कचौडी की ही, ये तो पक्का है वरना तेल के धंधे में जिन्दगी बिता देंगे :-)

annapurna said...

आप इंटरनेट पर मनिहारी की दुकान क्यों नही खोल लेते ?

औरतें टिकुली, चूड़ी की ई-शापिंग भी करेगीं साथ ही आपके उपदेशों के टिप्स भी मिलेंगें।

बोधिसत्व said...

मुझे कई प्रकाशकों के यहाँ से किताब बेचने के लिए उनकी दुकान पर बैठने का बुलावा है। पर हो सकता है मैं अपनी किताब की दुकान या सायकिल से अखबार फेंकने का काम करूँ। और कोई धंधा मैं नहीं कर सकता।
ज्ञान भाई अभय के साथ ही मुझे भी माफ करदें।
क्षमा बड़न को चाहिए,छोटन को उत्पात
क्षमा नहीं करने पर बच्चे लेते हैं काट।

mamta said...

चलो भाई अब खरीददारी मे कोई दिक्कत नही आएगी। और शायद कुछ कंसेशन भी मिल जाएगा आख़िर ब्लॉगर भाईयों की दुकान जो है। :)

अजय यादव said...

क्या बात है! सभी दुकान खोल रहे हैं! एक ही मार्केट में खोल लीजिये. दोपहर या कभी भी खाली व्क्त मिलने पर ब्लागर-मीट (माफ कीजियेगा मिलन) भी हो जाया करेगा. ज्ञान भाई! आप क्या कहते हैं?

Sanjeet Tripathi said...

सच है! तीज के समय बाज़ार की हालत देख कर तो यही ख्याल आता है

anitakumar said...

ज्ञानदत्त जी आप के लेख से हमारी भी कुछ पुरानी यादें ताजा हो आयीं, उत्तर प्रदेश में थे तो तीज का पता चलता था, शिव जी को याद करने की या व्रत रखने की उम्र तो नहीं थी हमारी, पर पड़ौसियों के घर से आया पक्का खाना का स्वाद अब तक हमारे मुहँ में है, हरे काचँ की चूड़ियाँ, पावँ में अल्ता, और झूले की पीगें, वो भी क्या दिन थे।
पर ये क्या पुराणिक जी आप इक्विटी के मामले में हमको कैसे भूल गये? 'ए पी वाटर बाल्स लिमिटेड' में हम भी शामिल होगें। आप और ज्ञानद्त्त जी गोलगप्पे खिलाए(हुल्ल्ड़ जी की बात मानते हुए)हम कैश काउन्टर सभांल लेगें।
ज्ञानद्त्त जी फोटो बहुत अच्छी हैं, आपका मोबाइल कैमरा काफ़ी एड्वांसड है

प्रियंकर said...

देशज संस्कृति की ऐसी झलक पाने के लिए ही तो आपके पास आता हूं जो इधर कम से कमतर दिखाई देती है. इसलिए पोस्ट पढ कर मन बहुतै हरसाया . आपकी उंगली पकड़ कर अपने बचपन में पहुंच गया और वह अनूठी दुनिया किसी चलचित्र की तरह खुलने लगी .

बाद में दुखी भी हुआ यह सोच कर कि पता नहीं कब नारीवादी स्त्री-पुरुष आ धमकें बमकते हुए कि स्त्री को गुलामी की जंजीरों की ओर उन्मुख करने वाले ऐसे प्रतिगामी त्यौहार की चर्चा करके आपने जघन्य पुरुषवादी मानसिकता का परिचय दिया है .

ईश्वर आपकी रक्षा करे और पुलिटिकली करैक्ट होने की नेमत बख्शे .

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