Wednesday, October 24, 2007

एक पुरानी पोस्ट का री-ठेल


@gyandutt I'm reading: एक पुरानी पोस्ट का री-ठेलTweet this (ट्वीट करें)!


मैने हिन्दी ब्लॉग शुरू किया इस साल 23 फरवरी को और पांचवीं पोस्ट छापी 3 मार्च को। हिन्दी लिखने में ही कष्ट था। सो जरा सी पोस्ट थी। शीर्षक था - 'हरिश्चन्द्र - आम जिन्दगी का हीरो'। नये नये ब्लॉगर को पढ़ते भी कितने लोग? फिर भी तीन टिप्पणियाँ आयी थीं - श्रीश की, धुरविरोधी की और रिपुदमन पचौरी जी की। धुरविरोधी तो बेनाम का छूत छुड़ा कर शायद किसी अन्य प्रकार से लिखते पढ़ते हैं। श्रीश तो जबरदस्त ब्लॉगर थे, हैं और रहेंगे। रिपुदमन जी का पता नहीं। शुरुआती पोस्टों पर उनकी टिप्पणियां थीं। पर उनके ब्लॉग आदि का पता नहीं। अगर यह पढ़ रहे हों तो कृपया टिपेरने की कृपा करें।

यह पोस्ट मैं आज री-ठेल रहा हूं। यह 'री-ठेल' शब्द पुन: ठेलने के लिये अलंकारिक लग रहा है!
असल में घर में कुछ और निर्माण का काम कराना है और हरिश्चन्द्र (जिसने पहले घर में निर्माण कार्य किया था) की ढ़ुंढ़ाई मच गयी है। हरिश्चन्द्र मुझे बहुत प्रेरक चरित्र लगा था। आप उस पोस्ट को देखने-पढने की कृपा करें -

'हरिश्चन्द्र - आम जिन्दगी का हीरो'


आपकी आँखें पारखी हों तो आम जिन्दगी में हीरो नजर आ जाते हैं. च्यवनप्राश और नवरतन तेल बेचने वाले बौने लगते है. अदना सा मिस्त्री आपको बहुत सिखा सकता है. गीता का कर्मयोग वर्तमान जिन्दगी के वास्तविक मंच पर घटित होता दीखता है.

आपकी आँखों मे परख हो, बस!
हरिश्चंद्र पिछले महीने भर से मेरे घर में निर्माण का काम कर रहा था. उसे मैने घर के बढाव और परिवर्तन का ठेका दे रखा था. अनपढ़ आदमी है वह. उसमें मैने उसमें कोई ऐब नहीं पाया. काम को सदैव तत्पर. काम चाहे मजदूर का हो, मिस्त्री का या ठेकेदार का, हरिश्चंद्र को पूरे मनोयोग से लगा पाया.

आज काम समाप्त होते समय उससे पूछा तो पता चला कि उसने मजदूरी से काम शुरू किया था. अब उसके पास अपना मकान है. पत्नी व दो लड़कियां छोटी सी किराने की दुकान चलाती है. बड़ी लड़की को पति ने छोड़ दिया है, वह साथ में रहती है. पत्नी पास पड़ोस में ब्यूटीशियन का काम भी कर लेती है. लड़का बारहवीं में पढता है और हरिश्चंद्र के काम में हाथ बटाता है.
मेहनत की मर्यादा में तपता, जीवन जीता - जूझता, कल्पनायें साकार करता हरिश्चंद्र क्या हीरो नहीं है?
मार्च 3'2007

यह छोटी सी पोस्ट तब लिखी थी, जब हिन्दी ब्लॉगरी में मुझे कोई जानता न था और हिन्दी टाइप करने में बहुत मेहनत लगती थी! नये आने वाले ब्लॉगर शायद उस फेज़ से गुजर रहे हों।
आज महसूस हो रहा है कि नये ब्लॉगरों के ब्लॉग पर रोज 4-5 टिप्पणी करने का नियम बना लेना चाहिये। बस उसमें दिक्कत यह है कि फीड-एग्रेगेटरों पर जाना होगा और वहाँ जाने का अर्थ है अधिक पढ़ना! Nerd
सब आदमी ऊर्जा में समीर लाल जी सरीखे तो बन नहीं सकते!

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प्रतिक्रियायें :
 

17 महत्वपूर्ण टिप्पणियां:

Udan Tashtari said...

भाई जी, यह आप जैसे उत्साहवर्धनकारियों का ही कमाल है कि हम चले जा रहे हैं.

आज आपने उकसाया है तो आने वाले जल्द समय में हम इसका राज खोल ही देंगे कि कैसे सारे ब्लॉग पढ़े और टिपियायें-इसमें भी एक विज्ञान है हर बात की भाँति. वरन कहाँ संभव है इतने सारे ब्लॉग पढ़ना और सार्थक टिप्पणी देना.

हरिश चन्द्र के व्यक्तित्व के बारे में पहले जाना बिना टिपियाये और आज फिर जाना टिपिया कर. :)

ऐसे ही जारी रहें री-ढेल और नई ढेल के साथ. शुभकामनायें.

अनूप शुक्ल said...

पोस्ट अलबेली है। रिठेली है। अदा अलबेली है। हमने झेल ली है।

काकेश said...

अच्छी लगी यह पोस्ट.वैसे पहले भी पढ़ी थी पर पता नहीं क्यों टिपियाया नहीं था. खैर अब समीर जी से विज्ञान का ज्ञान लेना है उसी की प्रतीक्षा है.

ALOK PURANIK said...

हरिश्चंद्रजी को साधुवाद, ऐसे ही लोग दुनिया चला रहे हैं। बाकी तो सब यूं ही है।
वैसे रिठेल शब्द का जवाब नहीं है। ग्रेट। इसके जवाब में अनूप शुक्लजी यूं भी लिख सकते थे-रिझेल।
पर हमरे लिए तो नयी है यह पोस्ट। वैसे इस तरह के संस्मरण काफी हो गये हैं आपके पास, एक किताब अलग बन सकती है-अनटोल्ड हीरो टाइप। काफी प्रेरणा दायक किताब होगी यह। छपवाने की सोचिये।

Srijan Shilpi said...

हिन्दी साहित्य में प्रेमचन्द थे जिन्होंने होरी, घीसू, माधो जैसे अति साधारण समझे जाने वाले पात्रों को अपने उपन्यासों और कहानियों के नायक/महानायक के रूप में लोकमानस में प्रतिष्ठित कर दिया। हिन्दी चिट्ठाकारी में उसी तरह का काम आप कर रहे हैं।

आपने अपने लेखन से हिन्दी चिट्ठाकारी का मिजाज, तेवर और फोकस बदल देनेका सफल प्रयास किया है। अपने आस-पास के अत्यंत साधारण, महत्वहीन-से लगने वाले तत्वों को गहरी संवेदनशीलता और अंतर्दृष्टि से पकड़कर उसे रोचक अंदाज में छोटी-छोटी पोस्टों के रूप में 'ठेल' सकने की खूबसूरत कला केवल आप में ही पाई जाती है।

अनिल रघुराज said...

सुंदर री-ठेल है। पहली बार पढ़ा। वैसे, अपने यहां बुजुर्गों में जीवन और दर्शन की अद्भुत समझ होती है। इस मायने में शायद भारतीय सारी दुनिया में अद्वितीय हैं।

Gyandutt Pandey said...

अनिल रघुराज>...पहली बार पढ़ा। वैसे, अपने यहां बुजुर्गों में जीवन और दर्शन की अद्भुत समझ होती है।
-------------------------------
क्या हमें गिन रहे हैं बूढ़ों में? या इस पोस्ट के हीरो हरिश्चन्द्र को! (-:

मीनाक्षी said...

बहुत सही कहा आपने... परख का होना बहुत आवश्यक है..

PD said...

आपकी ठेलम-ठेल अच्छी है.. मैंने वो वाली पोस्ट भी पढी थी.. या यूं कहें की मैंने आपकी सारी पोस्ट पढी है तो ज्यादा अच्छा होगा..
और आपके संस्मरण से मुझे काफी कुछ सीखने को भी मिला है..

Sanjeet Tripathi said...

पढ़कर तब न टिप्पियाने की गलती को आज सुधार लेते हैं जी, तब हम भी नए नए ही थे, फ़रवरी मे ही ब्लॉगजगत मे अवतरण हमहूं ने लि्या था और वर्डप्रेस मे झोपड़ा बनाया था जिसे मार्च मे ब्लॉग्स्पॉट पे ले आए थे!!

तब पढ़कर सोचा था आज लिख देते हैं--
"यह ब्लॉगर अफ़सर होकर भी संवेदनशील है, दिखते के पार भी देखने की कोशिश करता है।"

इस रि-ठेल्ड पोस्ट को पहली बार पढ़कर यही ख्याल आया था!!

नए नए ब्लॉग्स पर टिप्पियाना तो अत्यंत आवश्यक मानता हूं मै, क्योंकि जब हम खुद नए थे तो कमेंट्स देखकर जी खुश हो जाता था और फ़िर लिखने की तैयारी मे लग जाते थे!!

बोधिसत्व said...

मेरे लिए तो यह एक दम न्यू-ठेल है। हरिश्चंद्र तो देखा जाना चरित्र लगा...। एकदम पहचाना। आप और री-ठेलें।

अजय यादव said...

पिछले कई दिनों से अपनी व्यस्तता के चलते चिट्ठा-जगत से अनुपस्थित रहने के बाद आज कुछ वक्त मिला है चिट्ठों को पढ़ पाने का. एक ऐसे व्यक्तित्व के विषय में पढ़ना सदैव अच्छा लगता है जो अपने काम में (चाहे वो काम कुछ भी हो)पूरी लगन से तत्पर रहता है, बिना किसी शिकवा-शिकायत के. यही लोग सच्चे कर्मवीर हैं.

- अजय यादव
http://ajayyadavace.blogspot.com/
http://merekavimitra.blogspot.com/

Shastri JC Philip said...

आजकल मै़ अपने दफ्तर से बाहर हूँ अत: जाल की सुविधा न के बराबर है. अत: टिप्पणिया़ कम हो पा रही हैं. लेख पहले से लिख लिये थे अत: सारथी पर नियमित छप रहे है. हां आपके लेख हर दिन पढता जरूर रहा हुं.

इस लेख में जिस हीरो की आपने चर्चा की है उसे मेरा भी सलाम. ये ही हैं हिन्दुस्तान के नायक.

इस बार केरला ए़क्स्प्रेस पर यात्रा अच्छी लगी. खाना एकदम गर्म और ताजा. एक शराबी ने गाली दे दे कर और चिख चीख कर हम सब की निंद हराम कर दी और मेरी शिकायत पर रेलवे पुलीस ने तुरंत कार्यवाही की.

सोचा अपके विभाग की शिक्यायत बहुत लोग करते है, अत: तारीफ की बातें भीं बता दी जायें

-- शास्त्री

हिन्दी ही हिन्दुस्तान को एक सूत्र में पिरो सकती है

बाल किशन said...

ज्ञान भइया हम तो वैसे भी नए है और हमारे लिए तो आपकी ये री-ठेल एकदम नई और प्रेरणादायक लगी. शुरुआत की पंक्तियाँ पढ़ कर उत्साह वर्धन भी हुआ है. लिखते रहने की प्रेरणा मिली. कृपया और री-ठेले.

Dard Hindustani (पंकज अवधिया) said...

पहले लगा कि हरीशचन्द्र आपके द्वारा प्रेरित नया चिठ्ठाकार तो नही है। पर बाद मे स्थिति साफ हो गई। :)


आपके फैन बढ रहे है। कैसे सब जगह टिपियायेंगे?? चलिये कुछ रास्ता खोजता हूँ आपके लिये।

anitakumar said...

ज्ञानदत्त जी
आपकी ये रीठेल हमारे लिए एकदम नयी है, जब दोबारा पढ़ने वालों को इतनी अच्छी लगी तो हम नये पढ़ने वालों को कितनी अच्छी लगी होगी, सोचिए। सच है, एकदम आम सी दिखने वाली घट्नाओं को, पात्रों को आप की पारखी नजर और अदभुत सोच खास बना देती है।
चलिए आप की इस पोस्ट का एक सबसे बड़ा फ़ायदा ये हुआ कि जिस राज के खुलने का हर ब्लोगर को बड़ी बेसब्री से इंतजार था उसे निकट भविष्य में खोलने का समीर जी ने वादा तो कर दिया।

Shastri JC Philip said...

चारपांच टिप्पणी प्रति दिन ?? मजाक कर रहे हैं क्या. आप जैसे व्यक्ति को तो कम से कम 10 जनों का उत्साहवर्धन करना चाहिये !!

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