Wednesday, January 30, 2008

बालों की सेहत पर एक पोस्ट


यह श्री पंकज अवधिया की बुधवासरीय अतिथि पोस्ट है। इस पोस्ट में अवधिया जी बालों के विषय में मुक्त चर्चा कर रहे हैं। आप वह पढ़ कर लाभान्वित हों। मैं उनके लिये स्थान छोड़ता हूं:


यूं तो पाठकों की समस्याओं पर आधारित दसियों सन्देश लगातार मिल रहे हैं पर चूँकि इसमे बालों की विभिन्न समस्याओं से सबन्धित सन्देश बहुत अधिक हैं, इसलिये इस बार इसी विषय पर चर्चा करते हैं।

आप कही भी बैठे हों; जैसे ही आपने बालो की समस्या की बात छेडी नहीं कि दसियों उपाय बताने की लोगो मे होड़ लग जाती है। आज हमारे पास ढेरो उत्पाद बाजार में उपलब्ध हैं - एक से बढकर एक दावों के साथ कि वे ही बालों की समस्या को दूर कर सकते हैं। बालों के लिये बहुत सारे घरेलू नुस्खे हैं, और आम लोग इन्हे जानते भी हैं। पर कभी आपने यह सोचा है कि फिर भी क्यों सभी बालो की समस्याओं से परेशान हैं? क्यो इतने सारे अनुसन्धान और उत्पाद जमीनी स्तर पर नाकाम साबित हो रहे हैं?

मै तो चिकित्सक नही हूँ। मै देश के विभिन्न भागों मे आम लोगों और विशेषकर पारम्परिक चिकित्सको के पास उपलब्ध पारम्परिक चिकित्सकीय ज्ञान का दस्तावेजीकरण कर रहा हूँ। एक दशक से भी अधिक समय तक इन लोगों के साथ रहते हुये मैने हजारों वनस्पतियों और उन पर आधारित लाखों दवाओं के विषय मे जाना है। वनस्पति के संग्रहण से लेकर उसके उपयोग और फिर रोगी के ठीक होते तक मैने पूरी प्रक्रिया को देखा और फिर वैज्ञानिक भाषा मे उसका दस्तावेजीकरण किया है।

जब कोई रोगी बालों की समस्या लेकर पारम्परिक चिकित्सकों के पास पहुँचता है तो वे तुरत-फुरत उसे तेल नही देते हैं। वे उससे लम्बे समय तक बात करते हैं और इस समस्या के लिये उत्तरदायी कारणों का पता लगाते हैं। उसके बाद चिकित्सा आरम्भ होती है। चिकित्सा का मुख्य उद्देश्य रोग की जड तक जाना है। उनका मानना है कि रोग की ज़ड पकडने से मुख्य समस्या के साथ और भी कई प्रकार की समस्याओं का निराकरण हो जाता है। मैने अब तक 5000 से अधिक वनस्पतियो से तैयार किये जाने वाले केश तेलों का अध्ययन और दस्तावेजीकरण किया है। पारम्परिक चिकित्सकों का मानना है कि इन तेलो का चुनाव बडी टेढी खीर है। एक ही तेल अलग-अलग रोगियों पर अलग-अलग प्रभाव दिखा सकता है क्योकि सभी की एक ही समस्या के लिये एक ही तरह के कारक जिम्मेदार नही हैं। यह तो बडी गूढ़ बात लगती है पर आप आधुनिक चिकित्सा ग्रंथो या सन्दर्भ साहित्यों को पढ़ेंगे तो वे भी इस बात का समर्थन करते नजर आयेंगे। यदि यह सही है तो फिर बाजार मे बिकने वाला एक प्रकार का आँवला केश तेल कैसे करोडो लोगो को राहत पहुँचा सकता है? यह सोचने वाली बात है। आयुर्वेद दुनिया को भारत का उपहार है। पर जिस आयुर्वेद को आजकल हम उत्पादों मे खोजते है वह व्यवसायिक आयुर्वेद है। यह व्यवसायिक आयुर्वेद मूल आयुर्वेद के सामने कुछ नही है।

बालों की समस्या के लिये जब लोग मुझसे राय माँगते हैं तो वे सोचते है कि मै किसी केश तेल की बात करूंगा। पर मै उनसे "दिन भर वे क्या-क्या खाते है" - इसकी जानकारी माँगता हूँ। इससे मुझे पारम्परिक चिकित्सकों के सानिध्य से सीखे गुर के आधार पर रोग के कारण का अनुमान हो जाता है फिर बहुत ही सरल उपाय भोज्य सामग्री के रूप मे लोगों द्वारा दी गयी भोजन तालिका मे जोड देता हूँ। बाद मे लाभांवित होकर जब वे आते हैं तो उनसे पूछ लेता हूँ कि आपका बवासिर अब कैसा है? माइग्रेन के क्या हाल है? लोग आश्चर्यचकित हो जाते है कि ये तो बताया नही था फिर इन्हे कैसे पता? इसमे मेरा अपना कोई हुनर नही है। यह अपने देश का पारम्परिक चिकित्सकीय ज्ञान है। कभी मै सोचता हूँ कि जीवन के कुछ वर्ष आधुनिक चिकित्सा की पढाई मे लगाये जायें और फिर आधुनिक और पारम्परिक चिकित्सा प्रणालियो के समन्वय से नयी चिकित्सा प्रणाली विकसित की जाये। पर दस्तावेजीकरण के कार्य से मुक्ति ही नहीं मिल पाती है।

आम तौर बालों के लिये जो आधुनिक रसायनों से युक्त उत्पाद हम आकर्षक विज्ञापनो से अभिभूत होकर उपयोग करते है वे ही हमारे लिये अभिशाप बन जाते हैं। केश तेलों का प्रयोग भी सावधानी से करने की जरुरत है। मै आपको छोटा सा उदाहरण देता हूँ। मेरी माताजी ने बाजार से एलो वेरा और कुछ आम वनस्पतियो से तैयार केश तेल लिया और उपयोग किया। आशातीत परिणाम नहीं मिले। मैने सभी वनस्पतियाँ एकत्र की और घर पर पारम्परिक तरीके से वही तेल बनाया। तेल बनाना कठिन नही है। सभी वनस्पतियो को लेकर ताजी अवस्था मे ही आधार तेल जो कि आमतौर पर तिल का तेल होता है, में डुबो कर सूरज के नीचे निश्चित अवधि तक रख दिया जाता है। आम तौर पर यह अवधि चालीस दिनों की होती है। फिर तेल को छानकर उपयोग कर लेते हैं। माताजी को घर पर बने तेल से अच्छे परिणाम मिले। कुछ वर्षो पहले एक वैज्ञानिक सम्मेलन मे एक बडी दवा कम्पनी के मुख्य विशेषज्ञ से मैने पूछा कि क्या आप धूप मे रखकर तेल बनाते हैं तो वे हँसे और बोले किसे फुर्सत है यह सब करने की। हम तो तेल को उबाल लेते हैं और आधे घंटे के अन्दर ही सारी प्रक्रिया पूरी हो जाती है। वे यह भी बोले कि जब अमिताभ बच्चन इसे बेचते है तो यह अपने आप असर करने लगता है। इन तेलो मे उपयोग होने वाली वनस्पतियों की गुणवत्ता पर भी ध्यान नही दिया जाता है। ये वनस्पतियाँ आपके आस-पास आसानी से मिल सकती हैं। भृंगराज का ही उदाहरण ले। सुनने मे तो यह कोई दुर्लभ वनस्पति लगती है पर आम धान के खेतो मे यह खरपतवार की तरह उगती है और किसान इसे उखाडते-उखाडते परेशान हो जाते हैं। यदि आपने गाँव के स्कूल मे पढाई की होगी तो ब्लैक बोर्ड को काला करने के लिये जिस पौधे को घिसा होगा वही तो भृंगराज है।

अत: मै आप सभी को यही सलाह दूंगा कि आप अपने दैनिक भोजन की तालिका भेजें। उसी आधार पर मै आपको नयी तालिका सरल प्रयोगो के साथ वापस लौटा दूंगा। आप आजमायें और लाभांवित हों।

पंकज अवधिया

© इस लेख का सर्वाधिकार पंकज अवधिया का है।


कल मैने अपने दफ्तर (जो सूबेदारगंज में है) की विद्युत व्यवस्था की बात की थी और यह भी बताया था कि छपरा स्टेशन पर भी ऐसी प्रकाश व्यवस्था की गयी है। कई लोगों ने इसे इलाहाबाद स्टेशन की व्यवस्था समझा और इन्द्र जी ने इसको स्पष्ट करने के लिये पूछा भी कि यह व्यवस्था कहां की है?

मैं इलाहाबाद स्टेशन पर या उत्तरमध्य रेलवे के अन्य मुख्य स्टेशनों की प्रकाश व्यवस्था, सौर ऊर्जा के प्रयोग आदि की जानकारी एकत्र कर बाद में बताऊंगा। यात्री सुविधाओं में व्यापक परिवर्तन हो रहे हैं और प्रकाश व्यवस्था उनका प्रमुख अंग है। रेल के प्रति लोगों की उत्सुकता मुझे बहुत सुखद लगती है! धन्यवाद।

प्रतिक्रियायें :
 

16 Comments:

दिनेशराय द्विवेदी said...

पंकज भाई की यह पोस्ट बड़े काम की है। मैंने आयुर्वेद पढ़ा है। मेरे तो बाल अब बीस प्रतिशत बचे है। लेकिन बेटे के अभी से उड़ रहे हैं। उस की मां को इस की बहुत चिन्ता है। उस से कहूंगा कि वह भोजन तालिका पंकज जी को भेजे। पर कहाँ?

Parul said...

Pankaj ji namaskaar,bahut accha topic hai aaj kaa...aapko bhojan taalika kaisey aur kahan bhejen ye bhi kripya kar bataayen...dhanyavaad

Shastriji said...

भारतीय पारंपरिक औषध ज्ञान को दस्तावेजीकरण के द्वारा सुरक्षित करने के लिये पंकज जो कार्य कर रहे हैं इसके लिये भावी पीढियां हमेशा उनकी आभारी रहेगी.

पिछले 5000 सालों में हजारों तकनीकी विषयों पर उपलब्ध भारतीय विरल ज्ञान लुप्त हो चुका है. जो बचा है उस धरोहर को जो व्यक्ति सुरक्षित करने का यत्न कर रहा है वह हर तरह से प्रोत्साहन के योग्य है. ऐसे लोग हैं भारतीय समाज के सच्चे नायक.

ALOK PURANIK said...

भोजन तालिका आप ही बता दें तो वो आइटम एड कर लेंगेजी।

mamta said...

आज का विषय तो हर एक के लिए लाभकारी है क्यूंकि हर किसी को बालों की कोई ना कोई समस्या तो रहती ही है।

Kakesh said...

एक स्टैंडर्ड तालिका बना के चिपका दें जी.

Sanjeet Tripathi said...

हाय बाल, आह बाल।
ऐ मेरे प्यारे बालों,
कहां जा रहे हो तुम सालों
लौट के आ जाओ तुम
रस्ता तुम्हारा निहारूं मैं
ऐ मेरे प्यारे बालों।

अब ऐसा है जी कि अपने बालों के समयपूर्व पलायन की गति देखकर तो अपन ने सोच लिया है कि बस अगले कुछेक साल के अंदर अपन तो एकदम "सेक्सी बाल्ड" नज़र आएंगे।
अपने आप को इसके लिए मन से तैयार भी करते जा रहे हैं ;)

नीरज गोस्वामी said...

बाल बाल बचा लिया आप ने पंकज जी वरना मैं तो मेह्गा वाला तेल खरीद कर बालों की गत बिगाड़ने वाला था. आप की पोस्ट बहुत ही उपयोगी होती है. अपना ज्ञान और अनुभव हम लोगों के बीच बांटने का बहुत बहुत बहुत धन्यवाद.
नीरज

anuradha srivastav said...

पंकज जी बहुत ही उपयोगी लेख है। भोजन तालिका कहां भेजूं बता तो दीजिये।

Tarun said...

itni bariya jankari dene ka bahut bahut dhanyvaad, aaj hi se apne khanpaan ko thik karte hain pehle

Saurabh said...

बहुत अच्छे..
सच कहूँ तो पंकज अवधिया की यह पहली पोस्ट है जो मैंने पूरी पढी है :)
अब आप जल्दी से भोजन तालिका भेजने का पता बताइए
और हाँ कहने की जरूरत नहीं - भविष्य में भी ऐसे ही पोस्ट लिखते रहिये.
सौरभ

अविनाश वाचस्पति said...

बालों की चर्चा
पढ़्कर ब्लागरानियां
भी आयेंगी

कुछ बालों की खाल
तलाशने वाले भी आयेंगे

बालों का बवाल
और धमाल मचाने
धोनी भी आ सकता है

ज्ञान जी रेडी हैं
या पान्डेय हैं.

पंकज अवधिया Pankaj Oudhia said...

आप सभी की टिप्पणियो के लिये धन्यवाद। ज्ञान जी का भी आभार जो आपके और मेरे बीच सेतु का कार्य कर रहे है। आप मेरे जीमेल वाले पते पर तालिका भेज सकते है। इस सप्ताह मुझे 150 लोगो के लिये तालिकाए बनानी है और प्रति तालिका दो-तीन घंटे लगते है। यह कार्य नि:शुल्क है। पर मै पूरी कोशिश करूंगा कि आपके बाल रहते तक मै तालिका तैयार कर लूँ। ;)


और काकेश जी स्टैण्डर्ड जैसा कुछ नही है सभी के लिये अलग बनानी होगी तभी असर होगा।

Gyandutt Pandey said...

बहुत से लोग पंकज अवधिया जी का ई-मेल पता पूछ रहे हैं। वह उनके ब्लॉगस्पॉट वाले प्रोफाइल पेज पर उपलब्ध है।

anitakumar said...

पकंज जी धन्यवाद, हम भी लग रहे हैं लाइन में भोजन तालिका भेजने में। जरा हमारी उमर का भी ख्याल रखिएगा , ऐसा न हो कि जब तक भोजन तालिका बना कर दें हम टें बोल चुके हों…॥:)

anitakumar said...

ज्ञान जी रेलवे के आंतरिक कार्य कलापों के बारे में जानकारी दे कर आप सरकार पर बहुत बड़ा एहसान कर रहे हैं। अब रेलवे की कमियों पर बोलने से पहले दस बार सोचेगें कितनी बड़ी व्यवसथा करनी पड़ती है और कितना सोच विचार जाता है उसमें।

कुछ पोस्टें: