Tuesday, February 12, 2008

ऐसा क्यूं है?


अजीब लगता है। हिन्दी ब्लॉग जगत में बहुत प्रतिभा है। बहुत आदर्श है। बहुत सिद्धांत हैं। पर आम जिन्दगी स्टिंक कर रही है।
 
मैं घर लौटते समय अपने ड्राइवर का बन्धुआ श्रोता होता हूँ। वह रेडियो पर फोन-इन फिल्मी फरमाइशी कार्यक्रम सुनाता है। एक लड़की बहुत प्रसन्न है कि उसका पहली बार फोन लग गया है। उद्घोषिका उस लड़की से उसकी पढ़ाई और उसकी भविष्य की योजनाओं के बारे में पूछती है। लड़की पहली बार फोन लगने में चकाचौंध महसूस कर रही है। पोलिटिकली करेक्ट जवाब देने की बजाय साफ साफ कह बैठती है -"क्या बतायें, अपनी शादी के बारे में बहुत परेशान हैं।"

उद्घोषिका असहज महसूस करती है। नहीं समझ पाती कि यह बेबाक कथ्य कैसे समेटे। वह आदर्शवादी बात कहती है - "आप अभी मन लगा कर पढ़ें। आगे कैरियर बनाने की सोचें। शादी तो समय आने पर होगी ही ---" फिर लड़की भी दायें बायें बोलती है। वह भी समझ गयी है कि अपने मन की बात साफ साफ बोल कर फिल्मी गाने के कार्यक्रम में तनाव सा डाल दिया है उसने।
 
मेरा ड्राइवर भी असहज महसूस करता है। अचानक वह रेडियो बन्द कर देता है। मैं एक लम्बी सांस ले कार के बाहर की लाइटें देखने और सोचने लगता हूं।

बहुत आदर्श बूंकने वाले हैं। कविता में, गद्य में, आमने में, सामने में, सब में। दहेज की समस्या यथावत है। समता - समाजवाद की अबाध धारा बह रही है। जला देने के मामले और तिल तिल कर जिलाने के मामले भी ढ़ेरों हैं। कम नहीं हो रहे। जागृति न जाने कहां बिला जाती है। जिससे मिलो, वही कहता है कि उसे अच्छी बहू चाहिये, पैसा नहीं। या फलाने लड़के की शादी में उन्होने कुछ नहीं मांगा/लिया।
 
फिर वह फोन-इन वाली लड़की परेशान क्यूं है?
 
इतने सारे विद्वान और आदर्शवादी हैं कि समाज पटा पड़ा है। तब यह सड़ांध कहां से आ रही है जी? तब एक सांवली सी इन्सिपिड (insipid - नीरस, मन्द, फीकी) आंखों वाली लड़की परेशान और भयभीत क्यूं है?
 
ऐसा क्यूं है जी?
भारत में प्राप्त आंकड़ों के अनुसार चार घण्टे या उससे कम में एक दहेज - मौत होती है। यह तो नेशनल क्राइम रिकार्ड ब्यूरो के आंकड़े हैं। असलियत अधिक भयावह होगी।
 

प्रतिक्रियायें :
 

19 Comments:

नितिन व्यास said...

आदर्शवाद सिर्फ सलाह देने के लिये होता है, अपनाने के लिये नहीं। यदि अपना लें तो सब गांधी ना बन जायेंगे ...

दिनेशराय द्विवेदी said...

आज की आप की पोस्ट का कोई जवाब नहीं है। यह फोन वाली लड़की इसलिए परेशान है कि उसे कोई समझ नहीं रहा है। न माता पिता, न दोस्त, न भाई बहन, शायद कोई नहीं। उस की तड़प यही है कि कोई तो उसे समझे। उद्घोषिका भी नहीं समझ पायी।

Tarun said...

kya gyanji, media halkaan hokar breaking news de reha tha "Amitabh ko chink aayi.." aur kuch kuch aisa hi aur aap nahak ye boring sa subject utha diye.

jab tak ye breaking news ki sansani ka logic nahi badalta tab tak is terah ke vishay me shayad blogger hi sochta rahega aur blogger hi kosta rahega....

ghun hai ye samaj mein.

नीरज गोस्वामी said...

भईया
आप समाज के गटर का ढक्कन न उठाएं वरना इतनी बदबू फैलेगी की साँस लेना दूभर हो जाएगा .खोखले नारों और हकीकत में बहुत अन्तर है. देखा गया है की आज भी हम सामंती विचारों के दास हैं जहाँ महिलाएं पाँव की जूती से अधिक और कुछ नहीं. शादी के लिए क्या प्रपंच करने पड़ते हैं ये जान ने के लिए ज्ञान चतुर्वेदी जी का व्यंग उपन्यास "बारामासी" कहीं मिल जाए तो ज़रूर पढिएगा.
नीरज

अरुण said...

जीवन को हरपल जीते रहना
कहना सरल है कठिन है जीना
चाहो चांद को,खॊ जाती है चांदनी भी
फ़िर आने का गम सताता है
वरना छॊड दे जिंदगी भी..?

संजय बेंगाणी said...

अभी क्या बोलें जी? आपने भी हमे निशब्द कर दिया.

मनीषा पांडेय said...

बहुत अच्‍छा, बहुत सहज। वो लड़की बुद्धिजीवी नौटंकियों से बहुत दूर है, इसलिए सहज ही अपने मन की बात कह दी। लेकिन एक बात है कि आदर्शवादी या बुद्धिजीवी जैसा कुछ वो उद्घोषिका भी नहीं है। वो भी कोई नौटंकी बतला रही है। हर कोई, कोई-न-कोई नौटंकी बतला रहा है।

डा० अमर कुमार said...

बोलना नहीं चाहता था, पर..
यह श्री तरूणजी किस देवलोक में विराजते हैं कि
विष्ठा की गंध से सनसना गये ? क्षमा करें हम
कबतक सँड़ाध को सनसनी में शुमार करते रहेंगे ?
इनको ख़ारिज़ करना आरंभ हो जाय तो सनसनाहट भी जाती रहेगी ! किंतु सच को सामने लाना कोई
सनसनी नहीं है, मित्र !
व्यास महाराज कि टिप्पणी पर इतना ही कहूँगा कि आज से 26 वर्ष पहले जब इस कायस्थ कुलबोरण
कुपुत्र ने सगाई में मिले एक लाख नगद को लेने
से मना कर दिया था तो मेरी मानसिक स्वास्थ्य
पर संदेह के बादल मँड़राने लगे थे और लोकाचार
के नाते 5000/-स्वीकार करना ही पड़ा था ! यह
कौन सी मानसिकता थी कि मुझे चूतियों में गिना
जाने लगा , गाँधी बनना तो दूर ! फिर मैं तो
गाँधी बनना भी नहीं चाहता हूँ, केवल थ्योरी में ग़लत के रूप में परिभाषित मापदंडों को प्रैक्टिकल में उतारने की मंशा रखता हूँ,बस । विचार करें समाज की ईकाइयों के स्तर से.. ईंट बदलोगे तो इमारत कमजोर होने पर रोना नहीं पड़ेगा ।
और,गुरुजी क्षमा चाहता हूँ किंतु चूतिया अब हमारे लोकतांत्रिक शब्दकोष में समाहित हो चुका है, इसलिये इसपर कैंची न चलायें । कम से कम
यहतो सनद रहे कि यह भी मनुष्यों की कोई
श्रेणी हुआ करती थी, वरना टेस्टट्यूब से निकली
पीढ़ीयाँ तो इससे अपरिचित ही रह जायेंगी ।

ALOK PURANIK said...

जिंदगी अपने रा फार्म, अपने कच्ची सूरत में इत्ती इत्ती विकट चीज है कि कोई बड़का से बड़का से बुद्धिजीवी भी उसे एक्सप्लेन नहीं ना कर सकता। बालिका परेशान है, उसे सही सलाह की जरुरत है। रेडियो वाले सलाह नहीं माल बेचते हैं। सभी यही कर रहे हैं। अपने तजुरबों से सीखे बगैर गुजारा नहीं है। अपने तजुरबों से सीखा हुआ काम आता है। कई बार मैंने देखा बहुत ज्ञानी लोग मौन हो जाते हैं, बोलना बेकार ही समझते हैं। जिंदगी को बोल कर नहीं समझाया जा सकता। और लफ्फाजी से नहीं समझा सकता। हालांकि फिर भी करते सब यही हैं।

डा० अमर कुमार said...

पुनश्चः
बदबू में तो साँस लिया ही जारहा है, लेकिन 'क्या करियेगा ' की मज़बूरी ढोते हुये, जब तक इस तरह की नौटंकियों को मूक दर्शक मिलते रहेंगे यह तो उद्-घोष होता ही रहेगा..
'शान्तताः नौट्ंकी चालू आहे '

mamta said...

ऐसा इसलिए है क्यूंकि हम सभी इन बातों से अपने आप को ये सोचकर अलग रखते है कि ये हमारी परेशानी नही है।

पंकज अवधिया Pankaj Oudhia said...

आपको आश्वस्त करना चाहता हूँ कि यदि विवाह किया तो आपको शिकायत का मौका नही दूंगा। :)

Sanjeet Tripathi said...

ह्म्म्म, क्या कहूं समझ नही पा रहा, बहुत मार्के की बात कही आपने।

इष्ट देव सांकृत्यायन said...

भारतीय साहित्य और कला या मीडिया जगत का सबसे बड़ा संकट उसका आडम्बर और दोमुहांपन ही है. भाई लोग झंडा उठाए फिरेंगे अमेरिका मी हत्या के खिलाफ. छाता तानेंगे चीन में बरसात के ख़िलाफ़. अपने देश में जब कोई आतंकवादी मारा जाएगा या उसे पकड़ा जाएगा तो मानवाधिकार का मसला उठाया जाएगा. लेकिन उन मुद्दों पर कोई बात तक नहीं करेगा जिनसे जनता सचमुच जूझ रही है. सबकी स्थिति उन बाबाओं जैसी है जो अपने धर्म के अनुयायिनों की संख्या घटने के लिए दूसरे धर्मों को जिम्मेदार ठहराते फिरते हैं, लेकिन अपने गिरेबान में झाँकने की हिम्मत कभी नहीं करते. आपने एक सार्थक मसला उठाया इसके लिए धन्यवाद. वैसे ब्लॉग पर ही ऐसे मसलों को लेकर अभियान चलाया जा सकता है. इस बारे में आपका क्या ख्याल है?

काकेश said...

आलोक जी ने कहा ज्ञानी चुप रहता है. इसलिये हम कूछ नहीं बोलेगा...

भुवनेश शर्मा said...

नीरजजी ने सब कह दिया.......अब आगे क्‍या कहें.

बोधिसत्व said...

आपने एक बड़ी और जटिल बात बड़ी आसानी से कह दी है...
आपको लगातार पढ़ रहा हूँ...पर अक्सर चुप रह जाता हूँ...

Kirtish Bhatt, Cartoonist said...

बात तो पते की है ज्ञानजी.
और मेरी सलाह है की वो लडकी बजाय रेडियो वाली को फोन लगाने के आपके ब्लॉग पर अपना प्रश्न पूछे. परेशानी का ग्यारंटीड हल होगा.

टेक्नालजी said...

chup hi hain hum b post padh ke .. !

http://techsamadhan.blogspot.com

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