Tuesday, February 26, 2008

दीन दयाल बिरद सम्भारी - पुन: दृष्टि



एक साल गुजर गया। मैने पहली पोस्ट लिखी थी इस ब्लॉग पर २३ फरवरी’२००७ को। एक अनगढ़ पोस्ट - दीनदयाल बिरद सम्भारी। आज उसे देखता हूं तो लगता है बहुत पानी बह गया है गंगा में। लिखने का तरीका, फॉण्ट का प्रयोग, प्रेजेण्टेन और वैचारिक परिपक्वता - सब में अन्तर है। भाषा में प्रवाह पहले से बेहतर है। हिन्दी में टाइप करने की क्षमता में विकास ने पोस्ट में विस्तार और टिप्पणियां करने में सहूलियत प्रदान की है। फलस्वरूप मुझे भी पाठक मिले हैं।

टिप्पणियों के लिये कुछ हद तक अहो रूपम - अहो ध्वनि का भाव रखना होता है। उसमें हतोत्साहित होने की बजाय आत्मविश्वास बढ़ता है। पहले पहल मैं इसे काफी हेय भावना मानता था। पर अब लगता है कि दूसरों में प्रशंसा का कोई मुद्दा ढूंढना और उसे आगे रख बात करना बहुत महत्वपूर्ण है न केवल ब्लॉगिन्ग में वरन सामान्य जीवन में भी। यह वैसे ही है कि किसी फिल्म की एक्स्ट्रा की प्रशंसा कर उसे फिल्म की नायिका बनने में मदद करना। वही मेरे साथ हुआ। कई लोगों ने मुझे प्रोत्साहन दिया। मेरे अक्खड़पन ने कुछ लोगों में मेरे प्रति अरुचि भी पैदा की। पर बैलेन्स शायद मेरे फायदे में रहा। मैं इस सूत्र का महत्व उत्तरोत्तर अधिकाधिक समझता गया हूं। यह सूत्र सरकारी अफसरी की रुक्षता की सीमायें पार कर गया है।

मैं पहले पहल अपने को एमेच्योर और अतिथि ब्लॉगर मानता था। उस सोच में कुछ ही अन्तर आया है। अभी भी लगता है कि कभी भी दूसरे काम का दबाव मुझे विरत कर सकता है। हां, अगर मुझे ब्लॉगिन्ग से कुछ आय होने लगे और भविष्य में यह सेल्फ सस्टेनिंग एक्टीविटी बन सके तो शायद नजरिया बदल सके। फिलहाल वह मॉडल बनता नजर नहीं आता। लेकिन इतना अवश्य लगता है कि ब्लॉग पर चाहे सप्ताह में एक पोस्ट पब्लिश हो; वह पूर्णत: समाप्त शायद ही हो।

मेरी विभिन्न वर्गों और विचार धाराओं के प्रति असहिष्णुता में कमी आयी है। इसी प्रकार आलोचना को कम से कम हवा दे कर झेलने का गुर भी सीखने का अभ्यास मैने किया है। मैने अपनी सोच में पानी नहीं मिलाया। पर दूसरों की सोच को फ्रॉड और खोखला मानने का दम्भ उत्तरोत्तर कम होता गया है। बहुत नये मित्र बने हैं जो मेरी भाषागत अक्षमताओं के बावजूद मेरे लेखन को प्रोत्साहित करते रहे हैं। उनका स्नेह तो अमूल्य निधि है।

केवल नित्य २५-५० हिन्दी ब्लॉग पठन मुझे अभी पर्याप्त विचार नहीं दे पा रहा है कि मैं उसके बल पर सप्ताह में ४-५ पोस्टें लिख-पब्लिश कर सकूं। मुझे आस-पास का अवलोकन; ब्लॉग से इतर अध्ययन और विभिन्न विषयों पर स्वतन्त्र रूप से अपने विचारों का परिमार्जन करना पड़ रहा है। उससे शायद मुक्ति नहीं है। पर मैं यह अवश्य चाहूंगा कि हिन्दी ब्लॉगजगत में नये अनछुये विषयों पर अथॉरिटेटिव तरीके से लिखने वाले बढ़ें। वह हो भी रहा है - पर शायद और तेजी से होना चाहिये।

कुल मिला कर बहुत सन्तुष्ट करने वाला रहा यह हिन्दी ब्लॉगिंग का वर्ष।

मेरी पहली पोस्ट - दीनदयाल बिरद सम्भारी
आदमी कभी न कभी इस दुनिया के पचडे में फंस कर अपनी नींद और चैन खोता है. फिर अपने अखबार उसकी मदद को आते हैं. रोज छपने वाली – ‘गला रेत कर/स्ल्फास की मदद से/फांसी लगा कर मौतों की खबरें’ उसे प्रेरणा देती हैं. वह जीवन को खतम कर आवसाद से बचने का शॉर्ट कट बुनने लगता है.
ऐसे में मंत्र काम कर सकते हैं.
मंत्र जाप का अलग विज्ञान है. मैं विज्ञान शब्द का प्रयोग एक देसी बात को वजन देने के लिये नहीं कर रहा हूं. मंत्र आटो-सजेशन का काम करते हैं. जाप किसी बात या आइडिया को अंतस्थ करने में सहायक है.
अर्जुन विषादयोग का समाधान ‘मामेकं शरणमं व्रज:’ में है. अर्जुन के सामने कृष्ण उपस्थित थे. कृष्ण उसके आटो-सजेशन/रिपीटीशन को प्रोपेल कर रहे थे. हमारे पास वह सुविधा नहीं है. हमारे पास मंत्र जाप की सुविधा है. और मंत्र कोई संस्कृत का टंग-ट्विस्टर हो, यह कतई जरूरी नहीं. तुलसी बाबा का निम्न पद बहुत अच्छा काम कर सकता है:
दीन दयाल बिरद संभारी. हरहु नाथ मम संकट भारी.
बस हम निश्चय करें, और प्रारंम्भ कर दें.
(२३ फरवरी’२००७)


और चलते चलते मुझे यह लिखना ही पड़ा:

मुझे जिस का अन्देशा था, वह हो गया है। मेरे विभाग ने मेरा काम बदलने का निर्णय किया है। भारतीय रेलवे में उत्तर मध्य रेलवे को “वर्क हॉर्स” अर्थात काम करने वाले घोड़े की संज्ञा दी जाती है। घोड़े का काम तेज गति से वहन करना है। यह उत्तर-मध्य रेलवे, पूर्व-पश्चिम और उत्तर-दक्षिण का बहुत सा माल यातायात वहन करती है।

अबतक मेरा कार्य उत्तर-मध्य रेलवे के सवारी यातायात का प्रबन्धन था। अब यह बदल कर माल यातायात (freight traffic) का प्रबन्धन हो रहा है। माल यातायात में सवारी यातायात से कहीं अधिक प्रबन्धन के परिवर्तनीय अंग (variables) होते हैं और उनपर कस कर निगाह न रखी जाये तो अव्यवस्था होने की सम्भावनायें ज्यादा होती है। कुल मिला कर यह ज्यादा इंवाल्वमेण्ट का काम है (यह मेरा नजरिया है; कई लोग इससे सहमत नहीं भी हो सकते!)।

ज्यादा इंवाल्वमेण्ट का अर्थ उससे इतर कामों में कम समय दे पाना भी होता है। अत: ब्लॉगिंग में कटौती अनिवार्य है। मेरी पत्नी का कथन है कि ब्लॉगिंग पूर्णत: बन्द न की जाये। अत: मैं “मानसिक हलचल” पर ताला नहीं लगा रहा। पर अपनी आवृति अवश्य कम कर रहा हूं। ब्लॉग लेखन अब सप्ताह में दो या तीन दिन होगा। पोस्ट सोम, वृहस्पति (और सम्भव हुआ तो शनिवार) को पब्लिश करूंगा। अगर उसमें लगा कि पोस्ट के स्तर से समझौता हो रहा है तो फिर यह निर्णय बदल कर आवृति और कम करूंगा। ब्लॉग लेखन में रेगुलॉरिटी बनाये रखूंगा, भले ही आवृति कम हो जाये।

मुझे आशा है कि श्री पंकज अवधिया अपनी अतिथि पोस्ट यथावत बुधवार को देते रहेंगे; भले ही मेरी ब्लॉग एक्टिविटी में कमी आये। कल तो उनकी पोस्ट है ही।
धन्यवाद।

26 Comments so far:

नितिन व्यास said...

सालगिरह की बधाई!!
आपके लेखों का इन्तजार रहता है, आवृति भले ही कम करें लेकिन लेखन जारी रखें।

नये काम के लिये शुभकामनायें!!

Anonymous said...

Salgirah ke din hi jhatkaa. Isi ko Kahate hai Jor ka Jhatka Dheere se. Dukh to hoga Lekin kya kiya jaaye.

yunus said...

जिंदगी की व्‍यस्‍तताएं ब्‍लॉगिंग की आवृत्ति पर असर भले डालें पर ब्‍लॉगिंग की शिद्दत कम नहीं होनी चाहिए । ज्ञान जी हम तो आपकी 'ज्ञान-बिड़ी' के नियमित ग्राहक हैं । आप सप्‍ताह में तीन दिन भी आए तो भी ज्ञान-गंगा बहती रहेगी ।
मानसिक हलचल की सालगिरह मुबारक हो ।
आपके भीतर जो बदला हो सो ठीक, पर आपकी मानसिक हलचल ने हम जैसों को बहुत कुछ दिया है, बदला है, सोचने पर मजबूर किया है ।
एक शेर सुनिए--

हम पर दुख का परबत टूटा तो हमने दो चार कहे

उसपे भला क्‍या बीती होगी जिसने शेर हज़ार कहे

ये आपके लिए था ।
फिर बधाईयां

दिनेशराय द्विवेदी said...

आप का ब्लॉगिंग के पहले वर्ष का अनुभव कुछ मेरे जैसा ही है। मुझे उस से साहस मिला है।
मंन्त्रों का उपयोग सदैव वैयक्तिक होता है। इस पर अपने विचार कभी कर सका तो व्यक्त करूँगा।
आप के काम बदलने का आप के ब्लॉग उत्पादन पर पड़ना स्वाभाविक है। रीता भाभी का आग्रह यदि उन्हें टाइप करना सिखा दे तो हमें आप के ब्लॉग पर एक फुलटाइम महिला ब्लॉगर दे सकती है। परिस्थितियाँ ही नई चीजों को जन्म देती हैं और वे अभी हैं। नए काम में भी कुछ दिन बाद आप को समय मिलने लगेगा ही और आप की ब्लॉगिंग वापस सामान्य रुप से पटरी पर आ जाएगी।

arvind mishra said...

कुछ हजम नही हुयी .जरूर कोई और बात है .
अगर इस गतिविधि का लकआप की आज की पोस्ट पढ़ कर अवसाद सा हुआ .व्यस्तता की आड़ मे आप इतने अच्छे सामाजिक दायित्व से तोबा कर रहे हैं -बात मात्र धनार्जन ही है तो यह भी हो सकता है की आप हिन्दी ब्लागिंग पूरी तरह से बंद ही कर दें .
इतने अच्छे कार्य की यह परिणति मन अवसाद से भर गया -क्षमा करें एक ज्ञानी से ऐसी उम्मीद तो कदापि नही थी .
आप की धर्म साहित्य मे रूचि है ,गीता के इस श्लोक पर ध्यान चाहता हूँ -
यद्यदाचरेत श्रेस्तः तद्देवो इतरः जनः
सह यत प्रमाणं कुरुते लोक्स्त्द्नवर्तते
हो सकता है विभागीय अंतर्विरोधों के चलते खीज का ठीकरा आपने इस ब्लॉग पर फोड़ दिया हो -पुनर्विचार का आग्रह है .
और कृपा कर धनार्जन वाली बात तो कभी इस ब्लॉग पर लाईये ही नही -इससे इस ब्लॉग का अब तक किया धरा सब मिटटी मे मिल जायेगा
बहुत से काम हम एक सामाजिक बोध के तहत करते हैं -पैसा उद्देश्य नही होता है.और फिर कौन सा कम आपने अभी तक कमाया है कि ब्लॉग की और देख रहे हैं ?

mamta said...

पहली सालगिरह की बहुत-बहुत बधाई और भविष्य के लिए शुभकामनाएं ।
आप भले ही कम पर लिखते जरुर रहे।

Tarun said...

सालगिरह की बहुत बहुत बधाई, लिखना चाहे कम कीजिये बंद ना कीजिये लेकिन काम पहले। शुरूआत के दिनों की मुझे अभी भी याद है जब आपकी मानसिक हलचल से हिंदी जगत में हलचल मच गयी थी।

संजय तिवारी said...

पानी जितना भी बहा हो आप तो स्थिर ही रहे.

काकेश said...

सालगिरह मुबारक.

ब्लॉगिंग करना सचमुच बड़ा टाइम टेकिंग है..ऊपर से आज के युग में काम का दबाब और फिर हम तो सरकारी मुलाज़िम भी नहीं हैं ;-) ..कभी कभी मन में आता भी है कि इसे बंद कर दिया जाये...लेकिन आप जैसे नियमित लिखने वालों को देखकर आशा बँधती है..अब आप अपनी आवृति कम करेंगे तो हम को भी सोचना ही पड़ेगा .. अभी तक तो आप संडे को ही रेलक्सिंग कर रहे थे..अब ज्यादा करेंगे ..?? ना जी ना ...नियमित लिखिये ...भले ही यह लिखिये कि आज दुकान बंद है..क्योंकि हम तो हर रोज आयेंगे आपके द्वारे...बांकी आपकी इच्छा...:-)

अनिल रघुराज said...

ज्ञान जी, यकीन मानिए मैं तो आपकी मानसिक हलचल की परिक्रमा करके ही मान लिया करता हूं कि मैंने पूरा हिंदी ब्लॉग जगत घूम लिया। ये मेरे एक अनुष्ठान जैसा बन गया है। इसीलिए आपको डीह बाबा भी कहा था। आप लिखते रहें ताकि एक ईमानदार सोच से रूबरू होता रहूं। और एप्रोच वही होना चाहिए, जैसा आपने लिखा है, "मैने अपनी सोच में पानी नहीं मिलाया। पर दूसरों की सोच को फ्रॉड और खोखला मानने का दम्भ उत्तरोत्तर कम होता गया है।"

Priyankar said...

हिंदी ब्लॉगिंग आपने कुछ हिचकिचाहट के साथ ही शुरू की थी . पर इस एक वर्ष में आपने कई मानक स्थापित किए हैं . ब्लॉग की पहली वर्षगांठ पर बहुत-बहुत बधाई!

Raviratlami said...

साल भर की ब्लॉगिंग के इत्ते सारे फायदे गिनाए, और आखिर में जिससे फायदा हुआ उसी में कटौती! बात कुछ हजम नहीं हुई.

बहरहाल, सालगिरह की बधाईयाँ. और निवेदन तथा कामनाएँ कि ज्ञान बिड़ी रोज जलती रहे...

कमलेश मदान said...

आपको सालगिरह की शुभकामनाएं और रही बात आपके ब्लॉगिंग से थोड़ा दूर रहने की तो ये बात हमको अच्छी नहीं लगी क्योंकि सुबह होते ही आलोक पुराणिक जी और आपकी पोस्ट ना पढें तो दिन मुश्किल से गुजरता दिखता है ।

नियमित होने की कोशिश जरूर कीजियेगा यां समय-सारिणी में परिवर्तन करेंगें तो भी चलेगा.

ALOK PURANIK said...

जैसा मन आये, वैसा करें।
ब्लागिंग मन की मौज का मामला है।
एक साल वैसे बहुत कुछ होता है
पर आप जैसे व्यक्ति की क्षमताओं को देखते हुए एक साल की ब्लागिंग की बधाई नहीं दी जानी चाहिए। दस साल बाद बधाई मिलनी चाहिए।
शुभकामनाएं।
नये कार्यभार के लिए शुभकामनाएं।
माल भाड़े से रेलवे को बहुत उम्मीदें है।

नीरज गोस्वामी said...

भैय्या
कमाल है, एक साल हो गया? मुझे याद है शिव ने फ़ोन कर के कहा था की भैय्या मेरे ज्ञान भईया ने एक ब्लॉग खोला है आप ज़रूर पढिएगा. तब न मुझे ज्ञान भैय्या का कुछ पता था और ना ही ब्लॉग का. सुना ही नहीं था की ब्लॉग नाम की भी कोई चिडिया होती है जिसपे सवार होके आप अपने सपनों का आकाश नाप सकते हैं. उसके बाद तो आप और आप के ब्लॉग दोनों ने मंत्रमुग्ध कर दिया.
नए काम के बोझ तले हो सकता कुछ दिनों आप को दबे रहना पड़े लेकिन उसके बाद आप फ़िर से अपनी लेखनी से नए नए विषयों पर अपने विचार सजाते मिल जायेंगे ऐसी पक्की सम्भावना है. वैसे भी शक्षम को ही भारी जिम्मेदारी दी जाती है ये ही रिवायत है.
नीरज

Parul said...

badhaayi aapko, merey liye blogs kholney ka arth GYAAN JI ka chitthha subh subh padhnaa, ab aap roz nahi likhengey to kahin na kahin kuch kami aayegi zaruur.....jaisa yunus ji ne kahaa ..aapki posts se bahut kuch seekhney ko milaa hai ab tak.....shubhkaamnaayen

Sanjeet Tripathi said...

इस बात से तो मैं भी सहमत हूं कि ब्लॉगिंग के चलते लेखन और व्यक्तित्व में बहुत सुधार होता है!!

समय की कमी के चलते भले ही आप कम लिखें पर लिखें जरुर
और हां इस कम लिखने के निर्णय पर मेरा विरोध जरुर दर्ज किया जाए!
साल पूरा करने पर बधाई!
शुभकामनाएं तो आपके साथ रहेंगी ही!

पंकज अवधिया Pankaj Oudhia said...

नये दायित्व के लिये शुभकामनाए। ब्लागिंग के क्षेत्र से मै भी अब विदा ही लेने वाला हूँ। अभी तक मधुमेह की रपट के नाम पर कम्प्यूटर पर बैठना हो जाता था पर अब फिर जंगल जाना है। दिसम्बर से फिर सक्रिय हो पाऊँगा। पर सप्ताह मे कुछ दिन विशेषकर सोमवार को आरम्भ, बुधवार को आपके ब्लाग पर और गुरुवार को जी.के. अवधिया जी की वेबसाइट पर लिखना जारी रखना चाहूंगा।

संजय बेंगाणी said...

बधाई स्वीकारें. जो ब्लॉगर एक साल निकाल देता है वह स्थायी ब्लॉगर हो जाता है. लागी छूटे ना की तर्ज पर.

आपके लेखो की प्रतिक्षा रहती है. टिप्पणी दें ना दे..पढ़ते जरूर हैं.

Udan Tashtari said...

सालगिरह की बधाई! आप जब मौका लगे, बस लिखते रहें. इसे आग्रह ही मानें. आपसे मिलना जीवन के स्वर्णिम संदर्भों का हिस्सा है, बस यह बतलाना चाहता था.

मीनाक्षी said...

ज्ञान जी, हम भी अरविन्द जौ और उन जैसे सभी सोचने वालों से सहमत हैं.वैसे आप कम भी लिखें तो भी आपसे और आपके परिवार से मिलने की इच्छा बिन बुलाए मेहमान की तरह पूरी कर ही लेंगे..

Pramod Singh said...

मालभाड़े की नयी जिम्‍मेदारी में यह अच्‍छी बात है कि झट पलटकर आप उसे फ्रॉड कहने के सुख से वंचित रहेंगे! बकिया माल के साहचर्य-सुख में तो रहेंगे ही.. बाकी ब्‍लॉग की अपनी पसेंजर ट्रेन ठेले रखें. इतनी शुभकामनायें मिल रही हैं, और क्‍या चाहिए?

डा० अमर कुमार said...

सर्वप्रथम नमन
हिंदी ब्लागिंग के मात्र अपने एक वर्ष के यात्रा में
सुपरफ़ास्ट ऎक्सप्रेस जैसी उपलब्धियों के लिये !
तत्पश्चात आभार
मुझे ऎसा लगता है कि मुझे हिंदी ब्लाग लेखन की ओर आपने ही खींचा । पहली टिप्पणी और एक
व्यक्तिगत ई मेल से हौसला बढ़ा , मन में था कि
चलो देखते हैं, कोई नॊटिस न लेगा तो दुकान बंद
कर देंगे । पर आप शायद पहले ग्राहक थे ।
एक विनम्र आग्रह
सप्ताह में तीन पोस्ट तो अवश्य ही दें, चाहेंगे तो
समय निकलेगा ही । बहुतों को आपने लतिहर बना
दिया तो अब खुराकी बंद करके तलबियों की हाय न लें ।
एक चेतावनी
अपने दस्तावेजी प्रमाण के प्रति उदासीन होना एक गंभीर ब्लाग-अपराध है । अतएव अपने होने का यह प्रमाण सुरक्षित रखें ।
और एक शंका भी
इतने अल्प समय में स्टार स्टेटस पा लेने के बाद
रिटायरमेंट लेने की भूमिका बना आप लोगों का मन तो नहीं टोह रहे हैं ?
तो ब्लाग जारी रहे, क्योंकि...
मुझसे ही आज सुन लो, मेरे तमाम दुःख-सुख ।
क्या जाने किन लबों पर, कल मेरी दास्ताँ हो ॥

Hindi Blogger said...

ब्लॉगिंग में साल पूरा करने पर बधाई! आपके जैसी नियमितता से लिखने वाले ब्लॉगर अभी भी गिने-चुने ही हैं. कहने की ज़रूरत नहीं कि आपके ब्लॉग को बहुतों ने बुकमार्क करके रखा होगा.

नौकरी में नए कार्यभार के लिए हमारी शुभकामनाएँ!

anitakumar said...

ज्ञान जी ब्लोग के जन्मदिन पर बधाई।
आशा है पहले जैसे रेल्वे के आंतरिक प्रबंधन की जानकारी मिलती रहेगी,इस बार माल गाड़ियों के बारे में।

झकाझक टाइम्स said...

ब्लागिंग के दूसरे साल का पहला दिन भी मुबारक हो. यह नये बरस की पहली शुरूआत है. नई नई.