यह चित्र मेरी पत्नी श्रीमती रीता पाण्डेय और मेरे भृत्य भरतलाल के गुझिया बनाने के दौरान कल शाम के समय लिया गया है। सामन्यत: रेलवे की अफसरायें इस प्रकार के चिर्कुट(?!) काम में लिप्त नहीं पायी जातीं। पर कुछ करना हो तो काम ऐसे ही होते हैं - दत्तचित्त और वातावरण से अस्तव्यस्त! यह उद्यम करने का कारण - मेरा विचार; कि हम लोग तो जन्मजात अफसर केटेगरी के नहीं हैं। (रीताजी को इस वाक्य पर कुनमुनाहट है! यद्यपि साफ तौर पर उन्होने नहीं कहा कि मैं यह कथन हटा दूं!)।
और इस चित्र के साथ ही आप सब को होली की अनेक शुभकामनायें।





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होली की शुभकामनाएँ - आनंद
अभी रंग बन्द नहीं हुआ है,
आप इतनी साफ़ सुथरी हालत में
भाभी के दर्शन करा रहे हैं, इस बेला ?
आख़िर क्या चाहते हैं, आपको छोड़ कर
भाभी को रगड़ा जाये ?
होली मुबारक आप लोगों को
नहीं दस बीस गुजिया
बचाकर रखियेगा, जमशेदपुर से आते जाते ले लेंगे।
होली की शुभकामनाएं।
Mummy ki banaai ghar ke pakavaan bahut yaad aa rahe hain.. subah se ghar ko bahut miss kar raha hun.. :(
भाई भारत लाल को आशिष !
होली मुबारक हो।
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