Thursday, June 12, 2008

प्रोफेसर गोविंद चन्द्र पाण्डे और ऋग्वेद



हे अग्नि; पिता की तरह अपने पुत्र (हमारे) पास आओ और हमें उत्तम पदार्थ और ज्ञान दो!

यह ऋग्वैदिक अग्नि की प्रार्थना का अनगढ़ अनुवाद है मेरे द्वारा! वह भी शाब्दिक जोड़-तोड़ के साथ। पर मुझे वर्णिका जी ने कल लोकभारती, इलाहाबाद द्वारा प्रकाशित प्रोफेसर गोविन्द चन्द्र पाण्डे की हिन्दी में ऋग्वेद पर चार भागों में छपने वाली पुस्तक के पहले भाग के कवर के चित्र भेजे। इनमें ऋग्वेद के तीसरे-चौथे-पांचवे मण्डल में आने वाली अग्नि को समर्पित ऋचाओं के हिन्दी अनुवाद हैं प्रोफेसर पाण्डे द्वारा। प्रोफेसर जी.सी. पाण्डे इलाहाबाद और जयपुर विश्वविद्यालय के वाइस चांसलर भी रह चुके हैं।


Rig Vedaलोकभारती में प्रदर्शित यह पुस्तक

मैने कहा अनुवाद! यह तो एक अल्पज्ञ का प्रलाप हो गया! मैं दफ्तर से लौटते समय जल्दी में था, पर ४-५ मिनट को लोक भारती होता आया। यह पुस्तक झलक भर देखी। जो मैने पाया - आप इस पुस्तक में हिन्दी में ऋग्वेद का काव्य देखें तो ऋग्वेदीय ऋषियों के प्रति पूरी धारणा बदल जाती है। वे दार्शनिक स्नॉब की बजाय कोमल हृदय कवि प्रतीत होते हैं; पूरी मानवता से अपनी अनुभूति सरल भाषा में बांटने को सहर्ष तैयार। ऋग्वेदीय ऋषियों की यह इमेज मेरे मन में पहले नहीं थी।

प्रोफेसर गोविन्द चंद्र पाण्डे ने तो एक दो पन्ने की ब्राउजिंग में मुझे मैस्मराइज कर दिया! मैं इस पुस्तक के बारे में ब्लॉग पोस्ट की बजाय एक फुटनोट देने जा रहा था, पर अब मुझे लगता है कि मैं स्वयम इतना हर्षातिरेक महसूस कर रहा हूं कि एक फुटनोट में इसे समेटना सही बात नहीं होगी।

आठ वर्ष लगे प्रोफेसर पाण्डे को यह पुस्तक पूरी करने में। और निश्चय ही यह अनूठा ग्रन्थ है। मेरे जैसा काव्य-बकलोल भी इस ग्रंथ से अपनी फ्रीक्वेन्सी मैच कर ले रहा है - इससे आप समझ सकते हैं कि ऋग्वेद जैसी रचना से आम जन की दूरी बहुत पट जायेगी। हां आठ सौ रुपये इस पुस्तक के लिये निकालते एक बार खीस निकलेगी जरूर। शायद कुछ लोग पेपरबैक संस्करण का इन्तजार करें।


वर्णिका जी की मेल पाने के बाद से ही मन ललचा रहा है कि कितनी जल्दी यह पुस्तक मैं खरीद कर हाथ में ले पाऊं। हे अग्निदेव, मेरी यह सात्विक कामना शीघ्र पूर्ण करें!

अच्छा मित्रों, यह क्यों होता है कि एक नयी पुस्तक के बारे में सुनने पर ही उसे पाने की और फिर उलट-पलट कर देखने की, पन्ने सूंघने की, प्रीफेस और बैक कवर की सामग्री पढ़ने की जबरदस्त लालसा मन में जगती है? आपके साथ भी ऐसा होता है?

आप इस विषय में वर्णिका जी के अंग्रेजी के ब्लॉग "
REFLECTIONS" की पोस्ट The Rig Veda in Hindi देख सकते हैं।


23 Comments so far:

Hindi Blogger said...

कामना करता हूँ कि जल्दी से ये पुस्तक आपके हाथ लगे! पूरा भरोसा है कि तब विस्तार से आप इसकी विशेषताओं की चर्चा करेंगे.

दिनेशराय द्विवेदी said...

ऋग्वेद को पढ़ा है बारंबार। वह केवल सरल काव्य रचना है ही। उस के रचनाकाल के ज्ञान और अवधारणाओं का संग्रह भी है। अगर यह अनुवाद उसे हिन्दी भाषियों के नजदीक लाए तो बहुत उत्तम काम होगा। लेकिन उस की कीमत को देख इस की संभावना धूमिल ही है।
हाँ नयी पुस्तकों को दुलारने का काम हमने बहुत किया और करते हैं। पर वे सीधे जेब पर हमला करती हैं।

Lavanyam - Antarman said...

प्रोफेसर गोविन्द चंद्र पाण्डे जी ने उत्तम और महत्त्वपूर्ण कार्य सम्पन्न किया है इसकी जानकारी तो आपसे मिल गयी पुस्तक / ग्रँथ भी देखने का मन है -

Udan Tashtari said...

शायद सबके साथ ही यह होता है. एक किताब की ऐसी ही इच्छा मुझमें थी बहुत समय से. अभी वही हाथ लगी है तो किसी और चीज में मन ही नहीं लगता वो ही पढ़ रहा हूँ. आपकी बताई पुस्तक भी पढ़ेंगे-भारत पहुँच कर. यहाँ इसे प्राप्त करना तो लगभग नामुमकिन है निकट भविष्य में.

arvind mishra said...

पुस्तक से परिचय कराने के लिए धन्यवाद ,भारत के प्राचीन वांग्मयों के प्रति मैं भी सहसा आकर्षण महसूस करता हूँ -मेरे अपने 'ऋग्वेद संग्रह ' में मैकडोनाल्ड की 'ए वेदिक वेदिक रीडर फॉर स्टूडेंट्स ' भी है जो बहुत ही पठनीय है और मुझे लगता है कि ऋग्वेद पर अध्ययन की शरुआत इसी से की जानी चाहिए .यह ऋग्वेद की एक आदर्श परिचायिका है .
मेरी एक 'गट फीलिंग 'और भी है कि ऋग्वेद को पढ़ते समय अपने 'कामन सेंस' को परे नही रख देना चाहिए .
आप ने जी सी पण्डे जी की किताब लेने का निर्णय ले लिया है यह महंगी तो है मगर लेखक के श्रम को देखते हुए इतना खर्च किया जा सकता है अगर बजट बन जाय तो .....

कुश एक खूबसूरत ख्याल said...

जानकारी बढ़िया लगी.. मौका मिला तो ज़रूर पढ़ना पसंद करेंगे..

ALOK PURANIK said...

प्रोफेसर पांडेजी को बधाई च शुभकामनाएं
हे अग्निदेव
सारी अच्छी पुस्तकों को सस्ता कर
सारी घटिया पुस्तकों को अपनी शरण में ले
ताकि हम उनसे वैसे ही बच सकें
जैसे हम सतत उधार खाऊ से बीच चौराहे पर बचते हैं
नमामि
वेद पढ़ने का मन है,पर मनी से ज्यादा टाइम का टोटा है। आप तो इस के खास खास अंश अपने ब्लाग पर छाप लो जी।

बाल किशन said...

उत्तम जानकारी.
फिलहाल तो अलोक जी की बात से सहमत होते हुए यही कहना चाहेंगे की हो सके तो आपही इसे पढ़वाने की व्यवस्था करे तो कृपा होगी.और ये सिर्फ़ मेरे लिए ही नहीं वरन कई ओर ब्लागरों के लिए बिल्कुल नया और अनूठा अनुभव होगा.

धन्यवाद.

Varnika said...

An excellent write up Pandeyji. You have done full justice. Read some ideas expressed here. We can always lobby for a paperback edition, though!
Although... Would Indian readers have spent an equal or greater amount for an English hardbound Classic of the same caliber? Do we be have different benchmarks for the Hindi and English Publishing markets? No cord of discontent... just a thought passing through my mind.

mamta said...

जानकारी के लिए धन्यवाद। और इंतजार रहेगा इसके अंशों का जो आप अपने ब्लॉग पर लगायेंगे ।

अभिषेक ओझा said...

शुक्रिया इस जानकारी के लिए... ऋग वेद की कुछ ऋचायें स्कूल के संस्कृत की पुस्तक में पढी थी.. पढने का मन है लेकिन अभी लाइन में थोडी पीछे है.

और पुस्तकों में रूचि का तो हाल आपने लिख ही दिया है... मेरे साथ तो लोग पुस्तक की दूकान में जाने से डरते हैं... और पुस्तक मेला हो तो फिर अकेले ही जाना पड़ता है.

mahendra mishra said...

जानकारी के लिए धन्यवाद ..

नीरज गोस्वामी said...

भईया
ऋग्वेद पढने का मन तो बहुत है लेकिन अपनी बुद्धि पर भरोसा नहीं की क्या वो इसे समझ पायेगी ? पहले आप पढ़ लें फ़िर मेरी बुद्धि को ध्यान में रखते हुए बताएं की इसे समझा जा सकता है? पांडे जी के बरे में बहुत सुना है. वे विद्वान तो हैं ही साथ ही बहुत मृदु स्वाभाव के इंसान हैं.
नीरज

DR.ANURAG said...

कल व्यस्तता के कारण ब्लॉग पर नही आ पाया ..आज आपकी दोनों पोस्ट एक साथ पढी...आर्यासामाजी पृष्टभूमि से हूँ इसलिए चारो वेद आज भी घर मे पड़े है .. पिता जी ने गर आपका ये चित्र देख लिया तो समझ ले ..हमारी खैर नही....हमे ढूंढ कर कही से ये पुस्तक लानी ही पड़ेगी.....

पंकज अवधिया Pankaj Oudhia said...

आपको जब भी समय मिले तो लोकभारती का फोन नम्बर उपलब्ध करवाइयेगा। क्या उनके पास जडी-बूटियो की किताबे मिलती है? यहाँ रायपुर मे बडी मुश्किल से मिलती है। यदि उनकी कोई व्यवस्था के तहत किताबो की सूची वे डाक से भेज सके तो और अच्छा हो जायेगा।

siddharth said...

इलाहाबाद विश्वविद्यालय में कला संकाय का छात्र जरूर रहा लेकिन प्रोफेसर जी.सी.पांडे के विषय (प्राचीन इतिहास) का विद्यार्थी नहीं था। फिरभी अपने छात्रावास से लेकर इलाहाबाद की प्रायः सभी बौद्धिक गोष्ठियों में इनको सम्मान और श्रद्धा पूर्वक सुनने वालों की भीड़ में कई बार शामिल होने का अवसर मिला। हमारे दर्शनशास्त्र, राजनीति-विज्ञान और मनोविज्ञान के विभागों में प्रो. पाण्डेय समान उत्सुकता से विविध विषयों पर सुने जाते थे।
अब उनकी लेखनी द्वारा निसृत ऋग्वेद के हिन्दी भावानुवाद का आस्वादन निश्चित ही मन को तृप्त करेगा। ज्ञानजी को साधुवाद।

anitakumar said...

इस किताब के बारे में जानकारी देने के लिए धन्यवाद, यहां मिलनी तो मु्शकिल है आशा है आप इसके अंश प्रस्तुत करेगें

विजयशंकर चतुर्वेदी said...

ज्ञानदत्तजी, ऋगवैदिक ऋषि दार्शनिक स्नॉब कहीं से नहीं थे. वे परमकवि थे, और कवि भी ऐसे कि जिनमें कंटेंट तो था ही फ़न भी कमाल का था. सामवेद की ऋचाएं पढ़िये, बिना मतलब समझे भी उनमें जो लय है वह विश्व के किसी अन्य काव्य में नहीं मिलती. उस युग में तो मन्त्रपाठ का भी एक विधान था. आज भी दक्षिण का वेदोच्चार सुनिए, आपके रोंगटे खड़े हो जायेंगे.

शास्त्रीयता और लोक जैसा वेदों में साधा गया है वह दुर्लभ है.

प्रोफेसर गोविन्दचंद्र पाण्डेजी का यह प्रयास स्तुत्य है. मैं भी यह पुस्तक पढ़ना चाहूंगा.

स्वामी दयानंद सरस्वती ने चारो वेदों को संपादित और सरल भाषा में प्रस्तुत किया था. वह सब आर्य समाज की किसी भी प्रमुख शाखा से प्राप्त किया जा सकता है.

रही कीमत की बात, अब वेद कोई लक्स साबुन तो है नहीं कि आकर्षक पैक में वजन घटाकर कम कीमत में बेचा जाए. वैसे भी पाठक को वेद के पास आना चाहिए, वेद तो पाठक के पास जाने से रहा

डा० अमर कुमार said...

पढ़ा तो है, पर इस युग से इसकी प्रा्संगिता नहीं जोड़ पाया ।
दोस्तों ने सनकी होने में कोई शक न समझा । कोई सुझाव ?

Neeraj Rohilla said...

ऋगवेद पढने की बडी इच्छा है और उसे इतिहास के दृष्टिकोण से पढने की इच्छा है, देखिये कब पूरी होती है । दाम तो ठीक लग रहे हैं लेकिन यहाँ मंगाने में डाकखर्च पुस्तक के मूल्य से भी अधिक लग जायेगा इसलिये सम्भवत: भारत आने पर अपने साथ ही ले जाऊँगा ।

महेन said...

कुछ रौशनी इस ओर भी डालते कि यह किताब दक्षिण भारत में रहते हुए मेरे जैसे लोग कहां से और कैसे मंगा सकते हैं? कबसे लालसा है चारों वेद इकठ्ठा करने की मगर हो ही नहीं पाता कभी।
शुभम।

Manu said...

Hi to all,

I am very gald to know that Mr. G.C. Pandy had done a great job and add one stair in the way to improve Hinduism. I also want to read Rig Veda, but as usual lack of time.

Arvind k said...

Hats off to you G.C.Pandeyji for unfolding the great work by our Rishis in times marred by commercialism !!