यह न केवल गलत है, बल्कि विनाश का मार्ग है...
वास्तव में सही तरीका यही है किसी पिछड़े समूह को प्रोत्साहन देने का, कि हम उसे अच्छी शिक्षा के अवसर उपलब्ध करायें। और अच्छी शिक्षा में तकनीकी शिक्षा भी आती है, जो कि उत्तरोत्तर अधिक महत्वपूर्ण होती जा रही है। इसके अलावा अन्य सभी सहायता किसी न किसी मायने में बैसाखी है जो शरीर के स्वास्थ्य के लिये कोई मदद नहीं करती। हमने हाल ही में दो बड़े महत्वपूर्ण निर्णय लिये हैं: पहला, सब को मुफ्त प्रारम्भिक शिक्षा उपलब्ध कराने का है, जो आधार है; और दूसरा, सभी स्तरों पर प्रतिभाशाली लड़कों-लड़कियों को शिक्षा के लिये वजीफा देने का1; और यह न केवल सामान्य क्षेत्रों के लिये है वरन, कहीं अधिक महत्वपूर्ण रूप में, तकनीकी, वैज्ञानिक और चिकित्सा के क्षेत्रों में ट्रेनिंग के लिये भी है। मुझे पूरा यकीन है कि इस देश में प्रतिभा का विशाल भण्डार है, जरूरत है कि हम उसे सुअवसर प्रदान कर सकें।
पर अगर हम जाति और वर्ग के आधार पर आरक्षण करते हैं तो हम प्रतिभाशाली और योग्य लोगों को दलदल में डाल देंगे और दोयम या तीसरे दर्जे के बने रहेंगे। मुझे इस बात से गहन निराशा है, जिस प्रकार यह वर्ग आर्धारित आरक्षण का काम आगे बढ़ा है। मुझे यह जान कर आश्चर्य होता है कि कई बार पदोन्नतियां भी जाति और वर्ग के आधार पर हो रही हैं। यह न केवल गलत है, वरन विनाश का मार्ग है।
हम पिछड़े समूहों की सब प्रकार से सहायता करें, पर कभी भी कार्यकुशलता की कीमत पर नहीं। हम किस प्रकार से पब्लिक सेक्टर या, कोई भी सेक्टर दोयम दर्जे के लोगों से कैसे बना सकते हैं?
(पण्डित जवाहरलाल नेहरू जी, भारत के प्रधानमंत्री, का २७ जून १९६१ को मुख्यमन्त्रियों को लिखा पत्र, जो अरुण शौरी की पुस्तक - FALLING OVER BACKWARDS में उद्धृत है।)
1. मुझे यह कहना है कि इस निर्णय का ही परिणाम था कि मैं इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर पाया। अगर मुझे राष्ट्रीय छात्रवृत्ति न मिली होती, तो मैं नहीं जानता कि आज मैं किस स्तर पर होता। नेशनल साइंस टेलेण्ट सर्च वाली छात्रवृत्ति भी शायद इसी निर्णय का परिणाम रही हो; पर प्योर साइंस में भविष्य नजर न आने की सोच ने उस विकल्प को नहीं अपनाने दिया। आज लगता है कि वह शायद बेहतर विकल्प होता।
» कल घोस्ट बस्टर जी ने मेरी पोस्ट पर टिप्पणी नहीं की। शायद नाराज हो गये। मेरा उन्हे नाराज करने या उनके विचारों से टकराने का कोई इरादा न था, न है। मैं तो एक सम्भावना पर सोच व्यक्त कर रहा था। पर उन्हें यह बुरा लगा हो तो क्षमा याचना करता हूं। उनके जैसा अच्छा मित्र और टिप्पणीकार खोना नहीं चाहता मैं। » कल मैने सोचा कि समय आ गया है जब बिजनेस पेपर बन्द कर सामान्य अंग्रेजी का अखबार चालू किया जाय। और मैने इण्डियन एक्सप्रेस खरीदा। उसमें मुज़ामिल जलील की श्रीनगर डेटलाइन से खबर पढ़ कर लगा कि पैसे वसूल हो गये। उस खबर में था कि तंगबाग के श्री मुहम्मद अब्दुल्ला ने फंसे ३००० अमरनाथ यात्रियों को एक नागरिक कमेटी बना कर न केवल भोजन कराया वरन उनका लोगों के घरों में रात गुजारने का इन्तजाम किया। यह इन्सानियत सियासी चिरकुटई के चलते विरल हो गयी है। सलाम करता हूं तंगबाग के श्री मोहम्मद अब्दुल्ला को! |





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घोस्ट बस्टर जी की आपसे नाराजगी की कोई वजह न होगी. सुलझा हुआ व्यक्तित्व है उनका. निश्चित ही किन्हीं अन्य कार्यों में व्यस्त होंगे. काफी टहल कर आ रहा हूँ, कहीं भी नहीं दिखे वो. :)
मेरी तरह आप भी निश्चिंत हो जायें. हमारी कॉफी विथ कुश तक पर वह अनुपस्थित ही हैं. हा हा!!
कल का दिन काफ़ी व्यस्त भी रहा और कष्टपूर्ण भी. कल हमारे कॉलेज (MITS GWALIOR) का गोल्डन जुबली फंक्शन था. प्रेसीडेंट महोदया भी पधारी थीं. कम से कम महीने भर से बेसब्री से इंतजार था. काफ़ी सारे पुराने दोस्तों से मिलने का अवसर था. पूरी तैयारी थी मगर दो दिन पहले ही तगडे फीवर ने जकड लिया. शानदार मौका हाथ से निकल गया.
फ़िर भी कम से कम तीन बार प्रयास किया कमेन्ट लिखने का मगर हर बार कोई न कोई अड़ंगा लग गया. आख़िरी बार तो पूरा का पूरा कमेन्ट ही डिलीट हो गया इनवर्टर की बैट्री चुक जाने से. चुनावी वर्ष में भी बिजली की किल्लत है.
समीर जी को उनके शब्दों के लिए हार्दिक धन्यवाद.
मैं भी आरक्षण को एक जघन्य अपराध मानता हूँ .लेकिन इसे किस मुंह से कहूं -सवर्ण जो ठहरा और ऊपर से सरकारी कर्मीं .यानी कोढ़ में खाज !
नीरज
शेयर बाजार में फिलोसोफिकल होकर सोचना चाहिए। बचपन में मेरे स्कूल में संगमरमर की पट्टियों पर कुछ सुवचन खुदवाये गये थे, मतलब सुवचन तो अब भी होंगे, स्कूल में। पर वो दिमाग में खुद गये हैं. शेयर बाजार के इस दौर में एक सुवचन याद करता हूं
सुख यदि रहता नहीं, तो दुख का भी अंत है
यही जानकर कभी विचलित ना होता संत है
शेयर बाजार में संतई वाणी ना समझ में आ रही हो, तो गब्बर सिंह को समझ लें-
जो डर गया, समझो मर गया।
दृढ़ता से पालन करवाना भी नेता का काम होता है.
http://timesofindia.indiatimes.com/HRD_orders_faculty_quota_IIT_directors_livid/articleshow/3173620.cms
जहाँ भी थोडी प्रतिभा बची है अच्छाई बची है उसको अपने बचे हुए कार्यकाल में ही ख़त्म करने का संकल्प ले लिया लगता है अर्जुन सिंह ने. और आज आपका ये पोस्ट दिखा... इस पत्र का क्या फायदा हुआ? आज ६० साल बाद स्थिति बिगड़ी ही है.
आज सुबह ही ख़बर पढ़ के दिमाग ख़राब हो रहा था ये पत्र पढ़कर झुंझलाहट ही हो रही है की क्या बकवास है? क्षमा चाहता हूँ.
अरुण शौरी जी को खूब सुना है... कई व्याख्यान... विद्वान् आदमी हैं... हमारे संस्थान से बहुत गहरा लगाव रखते हैं.
ऐसा नही है कि जो गिने चुने लोग(आरक्षण की यह सुविधा भी कहाँ उन सभी आम लोगों को मिल पाती है जो सचमुच ही यह डिजर्व करते हैं.) आज इसका लाभ उठा भी रहें हैं वे इस बात को नकार सकें कि आरक्षण का आधार केवल और केवल आर्थिक ही होना चाहिए,पर खुलकर मानेगा बोलेगा कौन?
यह जान कर प्रसन्नता हुई कि आप मेरे शहर इलाहबाद से हैं. मैंने इलाहबाद से MLNR से १९८३ में इलेक्ट्रिकल से इंजीनियरिंग उत्तीर्ण की थी. सम्प्रति जयपुर में हूँ.
पंडित नेहरू जी का पत्र शोरी जी की पुस्तक से उध्रत कर पढ़वानें के लिए धन्यवाद.
सच को जानते हुए भी राजनीतिक स्वार्थ के चलते की गई एक गलती से आज देश को क्या कुछ देखना पड़ रहा है, यह किसी से छुपा नही है, वैसे भी इस लोकतंत्र में सच सुनता ही कौन है? यंहा तो जिससे वोट मिले वही नीति चलानी पड़ती है. इस विषय में ज्यादा लिखना या बोलना किसी कम का नही अतः चुप्पी साध रहा हूँ .
आप मेरे ब्लॉग में पदार्पण WWW.cmgupta.blogspot.com के मार्फ़त कर सकते हैं.
एक बार पुनः पंडित नेहरू जी का पत्र शोरी जी की पुस्तक से उध्रत कर पढ़वानें के लिए धन्यवाद.
आपका
चन्द्र मोहन गुप्ता
आरक्षण की बात पे बहस चल रहीँ हैँ -
नेहरु विलक्षण व्यक्तित्त्व के धनि
एवम स्वतँत्र भारत के प्रथम प्रधान्मँत्री थे - इतिहास मेँ उनका दिया योगदान अविस्मरणीय रहेगा
- लावण्या
पिछड़ों की क्रीमी लेयर की सीमा आठ लाख तय किए जाने की बात हो रही है . इस तर्क से तो आठ लाख से कम सालाना आमदनी वाले सभी लोग आरक्षण के हकदार होने चाहिए . पिछड़ेपन की यह आठ लाख की सीमा तय करने वालों के दिमाग में क्या भारत में प्रति व्यक्ति आय के आंकड़े कोई असर नहीं डालते ? अगर भारत में आठ लाख तक की सालाना आमदनी वाले पिछड़ों में गिने जाते हैं तब तो भारत सचमुच एक अग्रणी देश होना चाहिए .
जातियों के दबाव-समूह को वोटों की थैली समझकर फैसले लेने का नेताओं का समूचा कार्य-व्यापार अश्लीलता की हदें पार कर रहा है . ऐसे में नेहरू के पत्र और आरक्षण की मूल मंशा की फ़िक्र किसे है . स्वयं डॉ.अम्बेडकर आजादी के पचास साल बाद आरक्षण को समाप्त कर देने के पक्षधर थे .
आरक्षण की कहानी समता की कहानी कम और समाज में नव-ब्राह्मणों के उदय की दास्तान ज्यादा है .
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