Thursday, July 3, 2008
आपकी इनडिस्पेंसिबिलिटी क्या है मित्र?!
कोई मुश्किल नही है इसका जवाब देना। आज लिखना बन्द कर दूं, या इर्रेगुलर हो जाऊं लिखने में तो लोगों को भूलने में ज्यादा समय नहीं लगेगा। कई लोगों के ब्लॉग के बारे में यह देखा है।
वैसे भी दिख रहा है कि हिन्दी में दूसरे को लिंक करने की प्रथा नहीं है। सब अपना ओरीजनल लिखते हैं और मुग्ध रहते हैं। ज्यादा हुआ तो किसी ऑब्स्क्योर सी साइट को जिसमें कोई जूस वाली चीज छपी हो, को हाइपर लिंकित कर दिया। कुछ घेट्टो वाले ब्लॉग परस्पर लिंकित करते हैं। उनका महन्त सुनिश्चित करता है कि उसके रेवड़ के लोग परस्पर एक दूसरे की मुगली घुट्टी पियें। बाकी इण्डिपेण्डेण्ट ब्लॉगर को तो लोग लिंक भी कम करते हैं, और उसे भुलाने में ज्यादा समय नहीं लगेगा।
हमारी दशा गुट निरपेक्ष वाली है। जैसे नॉन अलाइण्ड मूवमेंण्ट का कोई धरणी-धोरी नहीं, वैसे हम जैसे की भी डिस्पेंसिबिलिटी ज्यादा है।
हमारा सर्वाइवल तो हमारे ब्लॉग कण्टेण्ट और हमारी निरंतरता पर ही है।
चलिये "जरूरत" पर एक क्षेपक लिया जाये।
पर जो बात मैं अण्डर लाइन करना चाहता हूं, वह यह है कि अपने कृतित्व से हमें औरों की नजर में अपनी जरूरत बनाये रखनी चाहिये। इस प्रतिस्पर्धात्मक युग में बचे रहने और आगे बढ़ने का वह एक अच्छा तरीका है।
आपकी इनडिस्पेंसिबिलिटी क्या है मित्र?! या इससे भी मूल सवाल - क्या आप इस बारे में सोचते हैं?
@gyandutt I'm reading: आपकी इनडिस्पेंसिबिलिटी क्या है मित्र?!Tweet this (ट्वीट करें)!
ब्लॉग लेखन - ज्ञानदत्त पाण्डेय Gyandutt Pandey समय (भारत) 5:00 AM
ब्लॉग लेखन - ज्ञानदत्त पाण्डेय Gyandutt Pandey समय (भारत) 5:00 AM
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अच्छा चिन्तन किया है चिन्तित कर देने वाला. और गहन विचार करुँगा. आभार आपका इस ओर विचार उकसाने का.
जमावट का एक और दृष्टिकोण देखने के लिये आपको slate.com और intentblog.com जैसी साईट्स देखनी चाहिए - जहां सारे उस्ताद ही लिखते हैं. वो किसी एक विचारधारा का प्रतिनिधित्व कर रहे हों जरूरी नहीं है लेकिन एक मंच पर अपने विचारों के साथ अपनी अपनी बारी से आते हैं. बल्की वे सभी गुणवत्ता का ध्यान रख रहे होते हैं जो अधिक जिम्मेदारी का काम है - हिट काऊंट का कोई टोटा नहीं होता - हमारे ज्यादातर हिंदी वाले सामूहिक ब्लाग इस मामले में पिछडे हुए हैं और कई बार आपस में लड पडते हैं फ़िर सब की हिट काऊंट प्रभावित होती है.
रही बात ‘एकला चलो रे’ वालों की - मैं ऐसे कई ब्लागर्स को जानता हूं जो रोज़ लिखने के बजाय कभी कभी और अच्छा लिखते हैं और वे हिट काऊंट के चक्कर में नही पडते. ऐसे लिखने वालों मे सुनीलजी, देबू और रमण कौल के नाम ज़हन में आते हैं. अगर कोई रोज़ लिखे और बेकार लिखे तो किस काम का? ठीक वैसे ही कोई थोक के भाव टिप्पणियां बांटता हो तो वो टिप्पणी कम नेटवर्किंग कर्म अधिक लगता है.
जहां तक जरूरत का प्रश्न है - सब अपना अपना बोझ उठाते हैं और अपनी अपनी छवि तो स्वयं ही बनाते हैं. हां शायद तकनीकी गैर-तकनीकी व्यक्ति का फ़र्क रहता है. समूह के तकनीकी लोग सबकी बराबर मदद कर रहे हैं.
और हां कोई भी इन्डिस्पेंसिबल नहीं होता - कोई आए कोई जाए नदिया बह रही थी, बह रही है, बहेगी और करोडों बाईट बिना किसी फ़रक के इधर-उधर होते रहेंगे. रही लेखन की बात - फुरसतियाजी का कहना सही है की लेखन या तो देखा-देखी में होता है या कुछ पहचाने जाने के बाद मुरव्वत में!
The more the world changes, the more it remains the same -
You can never please all the people all the time, May be some of the people, some times --
ये सुना है -
-लावण्या
"ओरीजनल,ऑब्स्क्योर सी साइट,हाइपर लिंकित,ब्लॉग,इण्डिपेण्डेण्ट ब्लॉगर,नॉन अलाइण्ड मूवमेंण्ट,डिस्पेंसिबिलिटी, अण्डर लाइन, इनडिस्पेंसिबिलिटी"
ज्ञान जी कुछ अधिक ही अति हो गई है। यह आप की अपिरिहार्यता ही है कि लोग आप तक पहुँच रहे हैं। लेकिन यह अंग्रेजी शब्दों की सहजता धीरे-धीरे अपाच्य होती जा रही है।
नीरज
[आज आपके यहां टिप्पणी नहीं हो रही है। कहता है चूज अ प्रोफ़ाइल। :)]
हिंदी में लिंक करने की प्रथा कम है लेकिन है तो सही। वैसे लिंक करने पर भी लिंकित मसाला कम ही पढ़ा जाता है। लिंकिंग के दूसरे लफ़ड़े भी हैं। आपने किसी को लिंक किया कुछ दिन बाद लिंक का कोई न कोई रूप बदलाव हो जाता है और लिंक बेमानी हो जाती है।
अनूप
-Harshad Jangla
Atlanta, USA
इस बात को तहे दिल से मानिये। लेखन, ब्लागिंग स्वांत सुखाय होती है। किसी को पसंद आ जाये, अलग बात है। स्वांत सुखाय काम ही लंबी इनिंग के लिए प्रेरित करता है। बाकी चाहने वालों का क्या, आज हैं, कल नहीं हैं। कमेंट दिन भंगुर से आइटम हैं। आज हैं, कल नहीं हैं। कमेंट दूसरों के होते हैं, रोज लिखने की बेशर्मी, हिम्मत ब्लागर को खुद अर्जित करनी पडती है। वही आखिर में काम आती है।
गालिब जैसे शायर बरसों पहले लिख गये हैं
-गालिब ए खस्ता के बगैर कौन से काम बंद हैं
रोईये जार जार क्या, कीजिये हाय हाय क्यूं
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ज्ञान जी कुछ अधिक ही अति हो गई है। यह आप की अपिरिहार्यता ही है कि लोग आप तक पहुँच रहे हैं। लेकिन यह अंग्रेजी शब्दों की सहजता धीरे-धीरे अपाच्य होती जा रही है।
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मैं भी दोषी हूँ।
मेरे लेखों में भी अंग्रेज़ी के शब्द कुछ अधिक होते हैं।
लाख कोशिश करने पर भी हमसे शुद्ध हिन्दी लिखी नहीं जाती।
क्या करूँ? कभी मज़बूरी के कारण ऐसा होता है। चालीस साल तक लगातार अंग्रेज़ी में लिखते लिखते, हिन्दी में पहली बार एक साल पहले जब लिखने की कोशिश की, तो मन और उंगलियों को लकवग्रस्त पाया।
आज एक साल के बाद, कुछ ढीलेपन का अनुभाव होने लगा है और हिन्दी में लिखने की क्षमता दिनोदिन सुधरती जा रही है। कभी कभी तो इधर उधर अंग्रेज़ी के शब्द ठूँस देता हूँ, वह इसलिए कि सही हिन्दी शब्द उस क्षण मन में आता नहीं और शब्दकोश पास नहीं होता या उस सन्दर्भ में मूल अंग्रेज़ी शब्द ही अधिक उपयुक्त, सहज या स्वाभाविक लगता है।
जब अंग्रेज़ी शब्द का प्रयोग करता हूँ तो पहले उसे रोमन लिपि में लिखता था यह सोचकर के अंग्रेज़ी शब्द तो अंग्रेज़ी में लिखना उपयुक्त होगा।
मैं देख रहा हूँ की ज्ञानजी अंग्रेज़ी के श्ब्द को देवनगरी में ही लिखते हैं।
अवश्य, हिन्दी चिट्ठों में हिन्दी शब्दों का ही उपयोग हो तो यह सबसे अच्छा होगा। लेकन यदा कदा, अंग्रेज़ी के कुछ शब्द या वाक्य, सही और उपयुक्त सन्दर्भ में यदि हम प्रयोग करना चाहते हैं तो क्या उसे रोमन लिपि में लिखना चाहिए या देवनागरी में?
कुछ और प्रश्न पूछना चाहता हूँ।
क्या उर्दू के शब्दों का प्रयोग करना उपयुक्त होगा?
यदि अंग्रेज़ी "नमक" है, क्या उर्दू को "मि़र्च" माना जाएगा?
क्या संस्कृत के शब्दों को "शक्कर" माना जाए?
इस टिप्पणी में एक भी अंग्रेज़ी शब्द नहीं है!
आशा करता हूँ कि दिनेशरायजी इसे पचनीय टिप्पणी मानेंगे।
शुभकामनाएं
गोपालकृष्ण विश्वनाथ
दादा ,अभी तक तो नहीं सोचा था पर आपने याद दिला ही दिया तो सोचना ही पडेगा।
शुभम।
और अभी बहुत कम ब्लॉग ऐसे हैं (आप निःसंदेह उनमें से एक हैं) जो अपने कंटेंट की वजह से पढ़े जाते हैं. ज्यादातर ब्लॉग तो लोग सिर्फ़ इसलिए पढ़ते हैं ताकि उनपर एक चलताऊ सी टिप्पणी छोड़ सकें, जो एक रिटर्न टिप्पणी का इंतजाम कर दे. ९०% तो कचरा ही है.
मेरी राय में किसी भी स्थिति में अपरिहार्यता हो सकती है लेकिन वह अस्थायी होती है। कॉंग्रेस के लिए सामयवादी अपरिहार्य थे अब तक। लेकिन अब नही।
पिछले चार साल में मुझे लगा दफ़्तर में एक अमुक व्यक्ति अपरिहार्य बनने लगा है। अगर वह सफ़ल हुआ तो वह मेरी कमजोरी होगी। सही समय पर कदम उठाया और अपने को और कंपनी को खतरे से बचा लिया। (दिनेशरायजी से "कंपनी" शब्द का प्र्योग के लिए क्षमा चाहता हूँ। क्या है इसके लिए हिन्दी शब्द?)
मैं स्वयं मेरी अपनी ही कंपनी के लिए अपरिहार्य नहीं हूँ।
अगर मुझे अचानक कुछ हो जाता है तो कुछ समय के लिए परिवार को और मेरे कर्मचारियों को असुविधा होगी लेकिन अगर सबने साथ दिया तो मेरी पत्ने की सहयोग से कंपनी फ़िर भी चल सकती है।
चिट्ठाजगत में तो कोई भी, किसी भी समय अपरिहार्य नहीं होता और हो भी नही सकता।
यदि चिट्ठाकारों की यह स्तिथी है तो हम जैसे टिप्पणीकारों की द़शा के बारे में सोचिए! दो दिनों से कोई टिप्पणी नहीं की थी। क्या हुआ? आपकी मानसिक हलचल में कोई सुधार नज़र नहीं आइ।
चलिए टिप्पनी जारी रखते हैं।
शुभकामनाएँ
पर मै चाहता हूँ की चिटठा जगत को जुड़ने की प्रक्रिया ओर सरल कर देनी चाहिये......
लेव टॉलस्टॉय की लघुकथा अच्छी लगी, अत्यंत शिक्षाप्रद है।
Yah to kuchh kuchh "I am the devine flame" aur "Aham Bramhashmi" vala hal ho gaya.
Jab Smt Gandhi ka dehavsan huaa tha 1984 mein, aamtar par akhbaron mein labbe-labab yahi saval hota tha, "ab desh ka kya hoga?". "Desh kaun chalayega?" ityadi ityadi. Smt Gandhi, Shri sanjay gandhi gaye, rajiv jee gaye, na jate tab bhi desh chalata, aur abhi bhi chal hi raha hai.
Aisa hi kuchh udaharan Shri Murthi aur Infosys ke liye de sakate hain. Aur to aur Mr Gates bhi dispensible hain Microsoft ke liye.
Ab yah to alag baat hai ki "Job security" ke liye bandon ko apna mahatva dikhana padhata hai.
सुबह तो अच्छा भला छोड़ कर गया था, अभी आया तो ' हलचल ' पर इतनी हलचल मची दिख रही है । अब बड़े लोगों के बीच मैं क्या बोलूँ, किंतु कुछ विरोधाभास दिख रहा है.., सो कहूँ ?
गुरुजी, यदि कंटेंट की छलनी उठा ली जाये , तो संदर्भित करने योग्य मात्र दो प्रतिशत ब्लाग भी छन के नहीं निकल पायेगा । मेरा निट्ठल्ला और आपका हलचल तो शायद सबसे पहले ही बीन-फटक में ही अलग हो जाये ! इसलिये मुझ जैसे मूढ़मति छलनी को बोलना चाहिये भी कि नहीं ? इस पर भले बाद में एक ब्लाग बना लीजियेगा, पर मुझे तो यह एक निर्मम तथ्य दिखता रहा है कि जो स्त्री अपने पति से महीने में दस बार जतलाती है कि वह उस पुरुष के बिना जी नहीं पायेगी, वह उसी के म्रूत्यु के बाद बीस वर्षों से भी अधिक तक जी कैसे लेती है ? ठीक है, स्वेच्छा से मृत्यु का वरण उसके बस में नहीं । किंतु नेहरू के बाद कौन-या अटल बिहारी के बाद कौन ..सरीखे प्रश्नों के तो आप सब साक्षी रहे होंगे ! फिर ? यह मुग़ालता ( उर्दू है, श्री विश्वना्थ जी ! ) कोई क्यों पाले कि वह ब्लाग पर अमरत्व पा लेगा ? भले ही वह दिन में दस पोस्ट ठोके ।
ऎसा उतावलापन ( अधैय..श्री विश्वनाथजी ! ) और आत्ममुग्धता मुझे केवल इसी नवोदित हिंदी ब्लागजगत में ही दिखता है । मैं अंग्रेज़ी ( अंग्रेज़ी की हिंदी..आँग्ल चलेगा ? ) ब्लाग्स ( इसकी हिंदी क्या है..श्रीमान ! ) कुछ न कुछ पढ़ता ही रहा हूँ, साथ में बाँग्ला पर भी निग़ाह ( ? हिंदी ) डाल लेता हूँ, थर्ड क्लास ( eng.) के अनारक्षित डिब्बे में घुसने जैसी गुत्थमगुत्था..घुसते ही अगले को घुसने से रोकने की तत्परता एवं अपना स्थान सुनिश्चित करने जैसी काकदृष्टि कहीं और नहीं देखी ।
जो आज टिप्पणी पर कुछ और कह रहे हैं, वही कल किन्हीं व्यक्ति विशेष से टिप्पणी न आने की गुहार लगाते देखे गये थे । यह कैसा विरोधाभास है, और कैसी हलचल ( उर्दू शब्द है जी ! ) है, यहाँ ?
अनुराग की बात से मैं सहमत हूँ, हिंदी व आँग्ल भाषा के स्वनामित साहित्यकार चेतन भगत के लेखन को पल्प-फिक्शन ( अंग़्रेज़ी शब्द है, भाई ) कह कर ख़ारिज़ ( उर्दू ) कर देते हैं, भगत के स्वास्थ्य पर कोई अंतर नहीं पड़ता, उनका लेखन चालू आहे ( चलिये उर्दू न सही मराठी तो भारतीय है, ना ! ) ।
कुल मिला कर यह अपने अपने कुँये से टर्राने जैसी बात है, टर्राते रहोगे तो सुने जाओगे । बस इतना ही करो..शाश्वत होने की चिंता में क्यों मरे जा रहे हैं, हम लोग ?
किया जाये, तो अड़ियल घोड़ा ही मेरा हीरो ( अंऽग्रेज़ीऽऽ ! ) होगा । जिस मालिक ने बनाया
है..उसके आगे अड़ी की न ले । बंदे की इच्छा अपने पर क्यों लदने दे ?
ब्लागर पर मेरा मालिक मेरी सोच और मेरा मन है...लेकिन हलचल वाला मन नहीं ?
कहीं मैं, ज़्यादा ( यानि कि अधिक ) तो नहीं बोल गया, इतने मूर्धन्यों के बीच ( मध्य ) ?
ब्लागिंग तो ईश्वर की माया है कहीं धूप कहीं छाया है :-)
बाकी बड़े बड़े ब्लागरों ने बहुत कुछ कह दिया है हम तो पढ़कर ही समझने का प्रयास कर रहे हैं |
NAMAN
इन्डिस्पेन्सेबेल jesa topic uthakar aur uski itni shaandaar vivechna
subhhan-allah
Mubarkbaad kubool karen
(Aafaque Ahmed)
आह! मैंने बहुत पहले 80 प्रतिशत को कचरा कहा था (मेरी अपनी पोस्टें सम्मिलित,)तो लोगों ने मुझे घोर गालियाँ दीं. आप अभी तक कैसे बचे हुए हैं घोस्ट बस्टर जी?
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