कितने सारे लोग कविता ठेलते हैं।
ब्लॉग के सफे पर सरका देते हैं
असम्बद्ध पंक्तियां।
मेरा भी मन होता है;
जमा दूं पंक्तियां - वैसे ही
जैसे जमाती हैं मेरी पत्नी दही।
जामन के रूप में ले कर प्रियंकर जी के ब्लॉग से कुछ शब्द
और अपने कुछ असंबद्ध शब्द/वाक्य का दूध।
क्या ऐसे ही लिखते हैं लोग कविता?
और कहते हैं यह रिक्शेवाले के लिये नहीं लिखी हैं।
मेरा लिखा भी रिक्शा-ठेलावाला नहीं पढ़ता;
पर रिक्शे-ठेले वाला पढ़ कर तारीफ में कुछ कह दे
तो खुशी होगी बेइन्तहा।
काश कोई मित्र ही बना लें;
रिक्शेवाले की आईडी
और कर दें एक टिप्पणी!
इस पोस्ट के लिये फोटो तलाशने गोवेन्दपुरी तिराहे पर गया तो स्ट्रीट लाइट चली गयी। किसी रिक्शे वाले की फोटो न आ पायी मोबाइल कैमरे में। यह ठेले वाला अपनी पंचलैट जलाये था - सो आ गया कैमरे में। पास ही एक रिक्शे वाला तन्मयता से सुन रहा था -
"मैं रात भर न सोई रे/खम्भा पकड़ के रोई/बेइमान बालमा; अरे नादान बालमा..."।
मुझे लगा कि इतना मधुर गीत काश मैं लिख पाता!





34Comments so far:
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आपने जो लिखा, हमें अच्छा लगा इतना क्या कम है?
कविता के नाम पर ,रहेगी ये बकबक
आप समझे न समझे यह तो है आपकी कमी
कवियों से भरी पडी है यह धरा यह सरजमीं
अब यह कीडा चिट्ठाजगत में भी कुलबुला रहा है
हद है कविता सुनने रिक्शेवालों को भी बुला रहा है
यह तो है चिठाजगत के कवियों की पूरी तौहीन
काश वे भी हो पाते रिक्शेवालों सरीखे शौकीन !
हेरत रहा जा सार अस दुल्हा न पईब् ,जाडा के रतीया सुते न पउब्, हेरत रहा जा सार.....
उस समय लगा ये ऐक प्रसिध्द गीत के बोल को अपने दुख में मिला कर गीत गढ रहा है......लेकिन बहुत अच्छा लगा था वब गीत। आज आप के पोस्ट में रिक्शेवाले की चर्चा आते ही वह जाडे की यात्रा अचानक याद आ गई। यहां मुम्बई में तो आटो रिक्शे में गाना सुनने मिलता है...ससुरा चान्स मारे रे.....वाईट वाईट फेस देखे...।
अच्छी पोस्ट रही।
जैसे मोहल्ले मे जलेबी बना रहा कोई हलवाई
जैसे भाभी जी ने दूध गरम,फ़िर ठंडा कर दही जमाई
कविता मे भी आईस्क्रीम की तरह जम दी ज्ञानाई
:)
बहुत खुब कविता की है, आप भी कविओं में शामिल हो गए. अब घबराते हुए आपके ब्लॉग पर आएंगे :) बधाई स्वीकारें.
वर्ना ब्लागर आप भी थे बड़े काम के। शिवकुटी से गोविन्दनगर फोटू खींचने जाने का काम किया है, यह है एक ब्लागर का समर्पण!
वो भी अपनी नादानी छिपायेगा
बतलायेगा सब समझ गया हूं
कविता की यही खासियत है
कविता में यही रूमानियत है
थोड़ी तुक मिला दो फिर
उसमें विचार और कल्पनायें
संजो दो और कविता के
भरपूर मजे लो, मजे दो
बधाई एवं शुभकामनाएं ! कन्हैया इस साल में आपकी
समस्त मनोकामनाएं पूर्ण करे ! आज की यही प्रार्थना
कृष्ण-कन्हैया से है !
आज कविता लिखने का अच्छा आइडिया मिला !
हम भी सोच ही रहे थे पर आज समझ आगया !
बहुत जल्दी हम भी कविता लिखना शुरू कर रहे हैं !
दही का जिक्र .. कन्हैया का मन पसंद व्यंजन ..!
पुन: बहुत बहुत बधाईयाँ जन्माष्टमी पर्व की
दर्द जो हमे रिक्शा चलाने मे होता है।
यथार्थ ऐसा जो रिक्शे के पहियों जितना सच है।
मेहनत, जो पसीना बहाने मे होती है।
पुरुषार्थ इस तरह, किसी महिला को रिक्शा चलाते देखा है कभी?
अब पुरस्कार स्वरुप टिप्पणी भी झेली जाए।
एक रिक्शेवाला ही आपकी कविता को सही तरह से समझ सकता है।
-कानपुरी रिक्शेवाला
(भैया, कविता करते करते, हमारे किराए के पैसे देना मत भूल जाना। इत्ता वजनी शरीर हम चार किलोमीटर ढो कर लाए है।)
मुझे तो लगा कि आप के गद्य में कविता अधिक होती है। इस रचना में गद्य भरपूर है।
आप को बधाई।
कविता लिखने के लिए कविता न लिखें। अपनी बात कहने को कविता लिखें। बस कविता जानदार होने लगेगी।
सबने सब कहा , हमने आनंद लिया।
महेन की टिप्पणी में अपनी बात नज़र आती है और
सतीश पंचम की टिप्पणी अच्छी लगी।
दीपक भारतदीप
बिल्कुल जम जाती है
निराला और बच्चन की
याद बहुत आती है
कविता की सरिता
बढ़िया बहाई है
पढ़े चाहे रिक्शेवाला
या हलवाई है
कागज़ पर जो उभरे है
कवि की पीड़ा है
पढ़कर तो ऐसा लगे
कविता लिखना क्रीडा है
हमपर न सही
रिक्शे पर ही लिख जाए
कभी कवि की कलम से
हमरी चर्चा दिख जाए
ठीक ही कविता लिखिए।
और यदि इससे भी दिल नहीं भरता तो "पेंटिंग" आजमाइए।
अगर पेंटिंग नहीं कर सकते तो कार्टून आजमाइए।
क्या आप गा सकते हैं? पॉडकास्ट तैयार कीजिए।
हम सुनने के लिए तैयार है।
ब्लॉग में यह सब सम्भव है।
मेरा सबसे प्रिय ब्लॉग वह होगा जिसमें यह सब एक जगह मिलेंगे।
है कोइ ऐसा ब्लॉग्गर?
सब कलकत्ते और कलकतिया भाइयों की संगति का प्रताप है :) पहले लाल रंग में रंगे, अब कविताई भी करने लगे :)
निराला की 'इलाहाबाद के पथ पर' और 'भिक्षुक' जैसी कविता कई गद्यों के बराबर होती है... पर दही के जैसी जमी हुई की क्या जरुरत है, आप वैसे ही बहुत अच्छा लिखते हैं. क्यों नए मोह-माया में फंसना चाहते हैं !
:)
आह से, उपजा है क्या ज्ञान ? "
"कविता" भी ऐसे ही आती है
जैसे बचपन से जवानी और जवानी के बाद बुढापा !और कोई कह देता है,
"लगता नही है जी मेरा
उजडे दयार मेँ
२ आरज़ू मेँ कट गए,
२ इँतज़ार मेँ "
- लावण्या
गाल से गाल मिलाकर, आप लौट के क्या आये
किस का असर हैं बोलें, जो ये कविता सरकाये
कल इत्ते जतन से लिखी थी । खैर । हम कह रहे थे कि ई कविता का रोग ससुर आपको कैसे लग गया । सच्ची कहें तो आप फोटू ज्यादा अचछे खींचते हैं । कविताई अविताई छोडिये । जो आप कर रहे हैं वो जादा अच्छा है । हम थोड़े दिन अस्त व्यस्त त्रस्त मस्त रहे । अब वापस आ गये हैं ।
हाथी घोड़ा पालकी । जय कन्हैया लाल की ।
ब्लॉग के सफे पर सरका देते हैं
असम्बद्ध पंक्तियां।
मेरा भी मन होता है;
जमा दूं पंक्तियां - वैसे ही
जैसे जमाती हैं मेरी पत्नी दही।
aapka kahna kitna jayaj hai ise parakhane k liye aap se ise follow karne ka aagrah hai roj yah aasan kaam kiya karen
लिखते रहें ..... हमारी शुभकामनायें ।
(हा हा हा बहुत जरूरी पोस्ट है यह मजा आ गया)
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