बाई-द-वे, सभी इण्टेलेक्चुअल ऐसे नहीं होते। कुछ की वेवलेंथ को आपका एण्टीना पकड़ता भी है। यह जरूर है कि आपकी समझ का सिगनल-टू-न्वॉयज रेशो (signal to noise ratio) कम होता है; कि कई बातें आपके ऊपर से निकल जाती हैं। अब कोई दास केपीटल या प्रस्थान-त्रयी में ही सदैव घुसा रहे, और उसे आलू-टमाटर की चर्चा डी-मीनिंग (de-meaning – घटिया) लगे तो आप चाह कर भी अपनी पोस्टें सुधार नहीं पाते।
असल में, आप जितना अपने में परिवर्तन का प्रयास करते हैं, बुद्धिमानों की आशानुसार; उतना आप वैसा का वैसा ही रह जाते हैं। मन में कोई न कोई विद्रोही है जो मनमौजी बना रहना चाहता है!
खैर, विषय को जरा यू-टर्न दे दिया जाये। सुमन्त मिश्र “कात्यायन” एक बड़े ही बड़े महत्व के पाठक मिले हैं। उनके प्रोफाइल में लिखे उनके इण्टरेस्ट – धर्म/दर्शन/संस्कृति/सभ्यता/सम्प्रदायों का उद्भव… बड़े प्रभावी हैं। समस्या हमारे साथ है, हम यदा-कदा ही उनके मोड में आ कर कुछ लिख सकते हैं। अपनी नियमित मानसिक हलचल तो टमाटर/आलू/टाई/बकरी पर टिक जाती है।
यह अवश्य है कि अपना नित्य लेखन पूर्णत: उथला नहीं हो सकता। क्रौंच पक्षी की टांगें पूरी तरह डूब जायें, इतना गहरा तो होता है। पर उसमें पर्याप्त (?) गहराई होने की भी कोई गारण्टी नहीं दे सकता मैं। लिहाजा ऐसे पाठक केवल तीन कदम साथ चलेंगे, या मैत्री की ट्रॉसंण्डेण्टल (transcendental – उत्तमोत्तम) रिलेशनशिप निभायेंगे; अभी कहना कठिन है।
अजीब है कि ५०० से अधिक पोस्टों के बाद भी आप अपने ब्लॉग और पाठकों की प्रकृति पर ही निश्चयात्मक न हो पायें।
सुमन्त जी का स्वागत है!
चिठ्ठाजगत हर रोज ई-मेल से दर्जन भर नये चिठ्ठों की सूची प्रदान करता है शाम सात बजे। अगर उन्हें आप क्लिक करें और टिप्पणी करने का यत्न करें तो पाते हैं कि लगभग सभी ब्लॉग्स में वर्ड वैरीफिकेशन ऑन होता है। वर्ड-वैरीफिकेशन आपको कोहनिया कर बताता है कि आपकी टिप्पणी की दरकार नहीं है। इस दशा में तो जुझारू टिप्पणीकार (पढ़ें – समीर लाल) ही जोश दिलाऊ टिप्पणी ठेल सकते हैं।
(
अमित जी की देखा देखी इंक ब्लॉग ठेलाई, एमएस पेण्ट से:





29Comments so far:
Post a Comment
क्या बात कही है....जय हो
रही नये ब्लॉगर को टिप्पणी में:
डैशबोर्ड में Settings>Comments>Show word verification for comments?>No का विकल्प सेट कर दें वर्ड-वेरीफिकेशन हटाने को।
---का समाधान देने की तो वो न तो अपका ब्लॉग जानते हैं और न हमारा. उनको तो उनके पास जाकर ही बताना पडेगा. यहाँ तो आप आलरेडी जानकारों के लिए लिख बैठे जिन्हें तरीका मालूम है मगर हटाना नहीं चाहते. नये ब्लॉगर के लिये क्या ज्ञान दत्त, क्या समीर लाला और क्या फुरसतिया...सब चमेली का तेल हैं, जो नजदीक आ जाये, महक जाये वरना अपने आप में चमकते रहो, महकते रहो..हमें क्या!!!
इसलिए जाकर बताना पड़ता है. ऎक सा मैसेज..आराम से कट पेस्ट कर सकत हैं. कोई बुराई नहीं ऐसे प्रोत्साहन में..नार्मल से कम समय लगता है. एक बार कट पेस्ट ट्राई तो करिये इस क्षेत्र में. आपका जो गया सो गया मगर उन्हें बहुत प्रओत्साहन मिल जायेगा. विश्वास मानिये, कई नये लोग जुडेंगे यह देख.
यही तो आप हम सब चाहते हैं इन्क्लूडिंग फुरसतिया!! (जी) ल्गा लिजिये जहाँ बुरा लगे. ";)"
असल में, आप जितना अपने में परिवर्तन का प्रयास करते हैं, बुद्धिमानों की आशानुसार; उतना आप वैसा का वैसा ही रह जाते हैं। मन में कोई न कोई विद्रोही है जो मनमौजी बना रहना चाहता है! "
आ.ज्ञानजी आज तो आपने पूरी त्रिवेणी पोस्ट लिखी है ! दास केपिटल में घुसे रहने वालो को भी लौटना तो आलू टमाटर की तरफ़ ही है ! आख़िर आलू टमाटर भी कहीं ना कहीं उसी का अंग हैं !
पर आपकी आज की पोस्ट ने वाकई में मेरी "मानसिक हलचल" तो अवश्य बढ़ा दी है ! सोचना पडेगा ! पर आपका ये कथन बड़ा सटीक लग रहा है " मन में कोई न कोई विद्रोही है जो मनमौजी बना रहना चाहता है! "
इस पोस्ट के लिए बहुत धन्यवाद !
२.फ़ुरसतिया की सतत मौज की सप्लाई की नाब का रेग्युलेटर कहां है?
३. दूसरे सवाल का जबाब पहले में छिपा है। मन की मौज पर कोई रेग्युलेटर मत लगाइये। सप्लाई जारी रहेगी।
सर जी, ग़र ज़ाँ की सलामती का भरोसा मिले ( न मिले तो भी क्या.. )
तो हज़ूर की शान में चंद लफ़्ज़ अर्ज़ करने की ग़ुस्ताख़ी करूँ ?
आज के तफ़सरे के शुरुआती 814 अल्फ़ाज़ मेरे पास मौज़ूद एक रिसाले में पहले ही फ़रमाये जा चुके हैं । क्या शक्ल ओ सूरतें इस क़दर भी मिला करती हैं ? ओह्हः ज़िन्दगी में कैसे हसीं इत्तफ़ाकों से सामना हुआ करता है ? यह कोई मौज़ लेने का मसला नहीं.., मेरे ओरिज़िनल नुक़्तायत हैं !
अपनी विशिष्टता को अपनी पहचान के लिए बनाए रखना अच्छा भी है, और जरूरी भी है। …दूसरों को देखकर हमारा मन बदल जाय यह सम्भव भी नहीं है, और जरूरी भी नहीं है। आप तो बस ऐसे ही जमाए रहिए जी…।
येसी नासमझी आप छोड़ दीजिये, सिर्फ ठेलिये। विद्वान ज्ञान बांटते है, बेवकू पढ़ते हैं।
नहीं ना समझे।
और रही आलू टमाटर की बात तो टमाटर मुझे बहुत प्रिय है, स्वादिष्ट होता है और ऑयरन से भरपूर होता है!! :)
और माइक्रोसॉफ़्ट पेन्ट से काफ़ी अच्छा लिख लिया आपने, यह अपने से नहीं लिखा जाता, आढ़ी तिरछी रेखाएँ ही खिंचती हैं बस!! :)
http://www.marxists.org/archive/marx/works/download/Engels_Synopsis_of_Capital.pdf
बिल्कुल 4-5 डायमेंशन में रेण्डम वाक। और मुझे खुद को अन्दाज नहीं होता कि अन्तत: क्या निकलेगा पोस्ट के रूप में।
हाईली अन-इण्टेलिजेण्ट रेण्डम वाक! :)
जैसे ही यह आप जैसे गंभीर लोगों के अथक परिश्रम से स्थायित्व पायेगा...इसका लाभ सभी को मिलेगा. फ़िर भी कुछ अवश्यम्भावी परिवर्तन तो सदैव चलते रहेंगे...!
- लावण्या
----------------------------------
आलू, टमाटर, बैंगन, सूरन, टिड्डा और हम जैसे नगण्य पाठकों वगैरह पर लिखना कभी मत छोड़ना। हम साधारण लोगों को यही सब आकर्षित करते हैं।
आपके "बुद्धिजीवी" पाठकों को प्रसन्न करने के लिए भले ही आप इनके botanical/zoological नामों का प्रयोग करें। या इनके लिए एक अलग ब्लॉग आरंभ कीजिए और हमें लिंक भी बता दीजिए ताकि हम गलती से भी वहाँ कभी न जाएं!
--------------------------------------------
२)
moderation से हमें कोई परेशानी तो नहीं होती। हम जैसे अधीर टिप्पणीकारों को सब्र सिखाता है। पर जब किसी ब्लॉग्गर के यहाँ टिप्पणी करने से पहले word verification की भी औपचारिकता पूरी करनी होती है, तो टिप्पणी करता ही नहीं हूँ।
मेरे प्रिय चिट्टे वही हैं जहाँ मेरी टिप्प्णियाँ, बिना moderation के, उसी क्षन छपते हैं और बाद के सभी टिप्पणियों की notice मुझे भेजी जाती है।
spam से बचने के लिए शायद आप जैसे सफ़ल और नामी ब्लॉग्गरों को moderation का सहारा लेना पढ़ता होगा। काश कोई ऐसी सुविधा होती जिससे आप कुछ चुने हुए विश्वसनीय मित्रों को "Free pass" दे सकें।
Application Number 1 मेरे लिए आरक्षित कीजिए।
----------------
३)
----------------------------
सुमन्त मिश्राजी की तरफ़ मेरा भी ध्यान आकर्षित हुआ था।
२० October को टॉल्सटॉय और हिन्दी ब्लॉगरी का वातावरण विषय पर उनकी टिप्प्णी पढ़कर मैने लिखा था:
सुमन्त मिश्राजी,
आप से विनम्र अनुरोध है कि आप बार बार यहाँ आकर टिप्पणी करें।
यह आपका "दुस्साह्स" नहीं होगा। उल्टा, हम सब अपने आप को धन्य समझेंगे।
शुभकामनाएं
----------------------------
४)
----------------------------------
कभी कभी तो ब्लॉग से ज्यादा टिप्पणी पढ़ने में हमें मज़ा आता है।
एक प्रश्न पर आज भी बार बार सोचता हूँ।
क्या टिप्पणी सबसे पहले करना अच्छा होगा या अंत मे ?
अंग्रेज़ी में कहावत है He laughs best who laughs last.
क्या टिप्प्णी करने की कला पर भी यह कहावत लागू होता है?
---------------------------------------
५)
-----------------------
आपका इंक ब्लॉग देखा। यदि hand writing आपको पसन्द है तो इसके लिए अलग उपकरण मिल जाएंगे। Electronic note pad और Stylus / pen का प्रयोग कर सकते हैं । बिना scan किए आपका handwriting सीधा pdf format में बदल जाएगा। एक डाक्टर विशेषज्ञ के पास देखा था। उनका एक विशेष pad पर हाथ का लिखा हुआ prescription उसी क्षण अपने आप कंप्यूटर के स्क्रीन पर दिखने लगा और hard disk पर सहेज लिया गया था।
-----------------------------
Post a Comment