जब कुछ नार्मल-नार्मल सा होने लगता है तब जोनाथन लिविंग्स्टन बकरी आ जाती है या विशुद्ध भूतकाल की चीज सोंइस। निश्चय ही कई पाठक भिन्ना जाते हैं। बेनामी कमेण्ट मना कर रखा है; सो एक दन्न से ब्लॉगर आई-डी बना कर हमें आस्था चैनल चलाने को प्रेरित करते हैं – सब मिथ्या है। यह ब्लॉगिंग तो सुपर मिथ्या है। वैसे भी पण्डित ज्ञानदत्त तुम्हारी ट्यूब खाली हो गयी है। ब्लॉग करो बन्द। घर जाओ। कुछ काम का काम करो। फुल-स्टॉप।
– क्या पीते हो; ठसक से बता दो। पर काम करने वाली बाई के कैंसर से पीडित पति का विस्तृत विवरण दे कर पढ़ने वाले के आंसू ज्यादा दिमाग पर जोर न देने का मन हो तो गुलशन नन्दा और कुशवाहा कान्त की आत्मा का आवाहन कर लो! “झील के उस पार” छाप लेखन तो बहुत ही “माई डियर” पोस्टों की वेराइटी में आता है। मसाला ठेलो! सतत ठेलो। और ये गारण्टी है कि इस तरह की ट्यूब कभी खाली न होगी। हर पीढ़ी का हर बन्दा/बन्दी उम्र के एक पड़ाव पर झील के उस पार जाना चाहता है। कौन पंहुचायेगा?!
मन हो रहा है कि “भीगी पलकें” नाम से एक नई आई.ड़ी. से नया ब्लॉग बना लूं। और “देवदास” पेन नेम से नये स्टाइल से ठेलना प्रारम्भ करूं। वैसे इस मन की परमानेंसी पर ज्यादा यकीन न करें। मैं भी नहीं करता!
| आलोक पुराणिक जी ने मेरी उम्र जबरी तिरपन से बढ़ा कर अठ्ठावन कर दी है। कहीं सरकारी रिकार्ड में हेर फेर न करवा रहे हों! बड़े रसूख वाले आदमी हैं। पर किसी महिला की इस तरह उम्र बढ़ा कर देखें! ----- |





32Comments so far:
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ठहाका लगाने का मन कर रहा है, पर डर रहा हूँ कि दिन में पड़ोसी, मेरी ओर देखते हुए, अपनी तर्जनी, अपने ही सिर के पास ले जाकर क्लॉकवाइस घुमाना न शुरू कर दें:-)
थोडा कुछ भूल गये आप;
संस्कृति की दुहाई, महानगरों की संस्कृति, मेरा बचपन का गाँव और इस निर्दयी शहर की जिन्दगी, युवाओं के भटकते कदम, आदि टाईटल ब्लाग हिट करने की गारन्टी है ।
लिव इन रिलेशन पर अधिकार लेकिन बिना अनुभव के लिखने वाले भी थोडे हिट पा गये लेकिन उससे भी लोग अब बोर हो गये हैं :-)
भले ही इसे कोई हमारी निगेटिव मानसिकता कह ले लेकिन ब्लागिंग के Gaussian Distribution की पीक अभी भी सोच रही है कि केवल ब्लाग लिखने से गन्भीर विमर्श होगा अथवा एक क्रान्ति आयेगी । असल में अगर कोई क्रान्ति आयी भी तो वो Gaussian distribution की टेल से आयेगी ।
मुझे ब्लाग पढने से नये विचार मिलते हैं लेकिन क्रान्ति की संभावना कम है । ३-४ बार जब कुछ मुद्दों ने मन की शान्ति हिलायी तो पोस्ट बनायी, उसके बाद छापने से पहले पढा तो लगा कि इसमें ऐसा कुछ भी नहीं लिखा है जिसे हिन्दी ब्लाग पढने वाले न जानते हों, आपकी भाषा में भक्क से रियलाईजेशन हुआ तो पोस्ट ड्राफ़्ट में ही रखी रहने दी ।
आपके ब्लाग का भी चर्चा तभी तक है जब आप इन विविधता वाली ३-४ पैराग्राफ़ वाली पोस्ट लिखें । यही आपके ब्लाग की USP (Unique selling proposition) है । जरा लिख कर देखिये संस्कृति विमर्श वाली पोस्ट, स्टैट काउंटर अमेरिका का स्टाक मार्केट जैसा दिख सकता है :-)
सुबुक सुबुक वाली पोस्ट पढना और टिपियाना एक तरह का गिल्टी प्लेजर है । उसके बारे में फ़िर कभी, वैसे भी जोश जोश में ज्यादा लिख गये हैं, भूल चूक लेनी देनी :-)
हम भी आपके पद चिह्नों पर चल रहे हैं ! अन्ट्शन्टात्मक लेखन में बड़ा दम लगता है ! क्योंकि कापी पेस्ट करने के लिए मैटर नही मिलता !
"वह है सुबुक सुबुकवादी साहित्त (साहित्य)। गरीबी के सेण्टीमेण्ट पर ठेलो।
इस पर कापी पेस्ट मैटर खूब है इसलिए सुविधा है और दाद भी अच्छी बटोरी जा सकने के चांस है !
आलोक पुराणिक जी ने मेरी उम्र जबरी तिरपन से बढ़ा कर अठ्ठावन कर दी है। कहीं सरकारी रिकार्ड में हेर फेर न करवा रहे हों! बड़े रसूख वाले आदमी हैं !
ये बताना जरुरी था क्या ? खामखा आप ख़ुद जवान हो गए और हमको बुड्ढा कह दिया ! आपकी बुढ्ढौउ कहने की इच्छा थी तो यूँ ही कह लेते ! हम क्या मना कर रहे थे आपको ? :)
Sir, aap ka sense of humour bhi jabardast hai.
क्योकि सत्य सारे अंट शंट हो लिये हैं।
अनूपजी की बात को दिल पे ना लिया कीजिये। उन्हे सीरियसली ना लिया कीजिये, वो खुद भी अपने आप को सीरियसली नहीं लेते।
आप तिरपन के हैं, ये जानकर बहुत खुश हुई।
हम तो आपके ज्ञान की उम्र के हिसाब से
आपको दो सौ सालों का मानने को तैयार हैं।
"read your artical many times.... kitna sach or bindaas likhtyn hain aap... so true... amezing.."
Regards
सुबुक सुबुकवादी या अण्टशण्टात्मक ???
वैसे हिन्दी ब्लॉग जगत में ब्लॉग को नही ब्लॉगर को पढ़ा जाता है.. फिर उसकी पोस्ट चाहे किसी भी विषय में हो.. आप स्वयं देख लीजिए विवेक भाई ने कहा की उन्हे आपकी पोस्ट समझ नही आती और देखिए फिर भी टीपिया रहे है.. मतलब की वो आपको पढ़ रहे है.. ना की आपके ब्लॉग को..
बाकि अब प्रतिदिन आपकी पोस्ट पढ़ने की लत पड़ गई है.
आप पर भी अज़दकी उपमाओं की लपेट में आ गए लगता है...
मेरा अनुरोध है कि इसे आलोक की अंटशंटात्मक कार्ये के रूप में लिया जाये. वैसे एक खबर दे दूँ कि अब आपकी उमर 58 ही मानी जा रही है. अब क्या होगा ??
जब इतना अगड़म-बगड़म हो गया तो एक और सही.
और हाँ क्रेडिट्स में हमारा नाम निःसंकोच डाल दीजियेगा पूछने की तकल्लुफ में रह मत जाने दीजियेगा
"देख रहा हूँ कि तेल लगाने वालों की संख्या ज्यादा है फिर भी कहूँगा कि बेशक स्टिंग ऑपरेशन करा के देख लो . इनकी रचना को नए ब्लॉग पर डाल दो . दो धेले में नहीं बिकेगी."
मेरा मानना है कि;
'दो धेले' तो आज की पोस्ट में मिल गए....:-)
संयोग से आज शास्त्रीजी का विषय है "शीर्षक और पाठकों की संख्या में संबंध!"
उनके ब्लॉग पर मैंने निम्नलिखित टिप्पणी की है जो आपके चिट्ठे पर भी लागू होते हैं
=============
हम न शीर्षक देखते हैं न सामग्री।
हम ने कुछ लोगों को चुन लिया।
उनके ब्लॉग पढ़ता हूँ और कभी कभी टिप्पणी कर लेता हूँ।
मैं जानता हूँ कि मेरे चुने हुए चिट्ठाकार सर्वश्रेष्ठ नहीं हैं।
हर समय अच्छा नहीं लिख पाते।
फ़िर भी उनको पढ़ने निकलता हूँ।
फ़िल्में देखने के लिए भी यही नीति अपनाता हूँ।
मेरे कुछ चुने हुए निर्देशक/अभिनेता/अभिनेत्री हैं।
केवल उनकी फ़िल्में देखता हूँ।
मैं जानता हूँ कि मेरे चुने हुए सितारे सर्वश्रेष्ठ नहीं हैं और मुझे इसकी पर्वाह नहीं है।
उनकी फ़िल्में कभी अच्छी लगती हैं, और कभी नहीं।
टीवी के लिए भी यही नीति है मेरी।
लिखते रहिए, आपका नाम मैंने चुन लिया।
शुभकामानाएं
==========
ज्ञानजी, लिखते रहिए, चाहे अंट शंट चाहे सुबुक वादी या किसी गंभीर विषय पर, हमें पर्वाह नहीं।
आपका नाम भी मैंने चुन लिया है।
'पाथेर पाँचाली "बनाकर
शीर्ष फिल्म निर्माता कहलाये हैँ -
और पाँचाली का नव अवतार "महाभारत " मेँ भी खूब चला ...
आप, खाँमखाँ
परेशान हो रहे हैँ ..
अभी बहुत कुछ है
जिसे आप
हिन्दी साहित्य को
छुक़ छुक़ गाडी से देँग़ेँ
- लावण्या
ग्याण जी अब दिमाग की क्या जरुरत बस हम ने तो पोस्ट पढी ओर टिपण्णी फ़ेंक दी... बहुत सुन्दर, क्याबात है; अच्छी लगी...:)
धन्यवाद
नीरज
’भीगी पलकें, मुस्कराते लब ’
तब बात बन पायेगी देवदास इन ब्लॉगिंग मोड की.
:)
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