हम लोग जो आकलन लगाये रहते हैं कि इतनी ट्रेनें पार होंगी या इतने एसेट्स (इंजन, डिब्बे, चालक आदि) से हम काम चला लेंगे, अचानक पाते हैं कि आवश्यकता से पच्चीस तीस प्रतिशत अधिक संसाधन से भी वह परिणाम नहीं ला पा रहे हैं। सारा आकलन – सारी प्लानिंग ठस हो जाती है।
सारी ब्लॉगिंग बन्द। सारा पठन – सारी टिप्पणियां बन्द। फायर फाइटिंग (या सही कहें तो कुहासा फाइटिंग) चालू। जब तक मौसम नहीं सुधरता, तब तक यह खिंचाव बना रहेगा।
मेरा कमरा, मेरे फोन, मेरा इण्ट्रानेट (जो मालगाड़ी परिचालन बताता है ऑनलाइन) और मेरे कागज – यही साथी हैं। खुद तो बाहर निकल कुहासा देख भी नहीं पा रहा।
चार घण्टे हो गये पहले के दिये निर्देशों को। चलें, देखें, कितनी बढ़ी गाड़ियां। कितना सुधरा या खराब हुआ ट्रेन परिचालन। (कल शाम को लिखा गया| यह रुटीन पिछले कई दिनों से चल रहा है। और शायद कई दिनों तक चलेगा।)
इसके अतिरिक्त पड़ोस के देशों में भी यह अड्डे हैं जिनका सीधा सम्बन्ध भारत में आतंक फैलाना है। उन्हें ध्वत करने की संकल्प शक्ति देश में चाहिये। जनता का अगला मेण्डेट शायद इस फैक्टर को ध्यान दे। पर इसके लिये जनमत का व्यापक मोबलाइजेशन युवाशक्ति को करना होगा! पर युवा कौन है? डा. कलाम युवा हैं!





32Comments so far:
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और हाँ भारत को डॉ कलाम जैसे वैचारिक युवाओं की आवश्यकता है |
ध्यान रखना जरुरी है -
कलाम साहब पर भी शायद कोई फतवा जारी हो जायेगा ऐसे स्टेटमेन्ट से
क्या पता !
- लावण्या
काम में व्यस्त रहने का भी अपना ही मजा है । हम कल से इसका आनन्द उठायेंगे, थक गये पिछले कुछ दिनों में कुछ काम न करके ।
भारत में तार/बेतार के इलेक्ट्रोनिक यंत्रों की क्रान्ति के बावजूद अभी भी सिग्नल आंखो से साक्षात देखने की आवश्यकता क्यों है ? क्या रेलवे के इंजनों में ऐसे पैनल नहीं लगाये जा सकते जिससे पता चल सके कि आगे १ किमी पर सिग्नल अप है अथवा डाउन ? रेलवे की तकनीकि क्षमता पर तो संदेह नहीं है, फ़िर क्या कारण है अभी तक पुराने हिसाब से रेलवे यातायात संचालित करने का ?
Analogy के रूप में देखें तो ये वैसा ही लगता है जैसा पुराने जमाने में ट्रैफ़िक हवलदार अपने हाथों के इशारे से चौराहे पर यातायात संभालता था । अब तो हर बडे शहर में आटोमैटिक सिग्नल लग गये हैं, वैसा ही कुछ हो रेलवे में हो जाये तो राजस्व की हानि भी बचेगी और सब कुछ चकाचक दम मस्त हो जायेगा, :-)
करिए आप ही करिए कुछ. जाडों में तो ये कह देते हैं कि कोहरे की वजह से गाडियां देर से चल रही हैं. अजी, ये तो गर्मियों में भी टाइम से नहीं चलती.
देश के अंदर रहने वाले आतंकवादियो को बचाने के लिए देश के अंदर रहने वाले ही दूसरे लोग आ जाते है..
उनके अंदर के आतंकवादी मार जाए तो फिर कुछ भी ख़त्म करने को बाकी नही रहेगा..
सिर्फ़ अपने अंदर का आतंकवादी मारा जाना चाहिए... बस
रही बात "व्यापक मोबलाइजेशन" की, तो वो तो एक देश भक्त को करना होगा.. फिर चाहे वो युवा हो, किशोर हो, या वृद्ध हो.. संकल्प आयु देखकर नही लिया जाता.. मन की भावना देखकर लिया जाता है
रामराम.
देश को विचारों से जवान लोगो की जरूरत है.
जिस प्रकार दिनेशजी द्विवेदी, न्यायालयीन और विधिक विषयों पर 'लोक शिक्षण' कर रहे हैं, उसी प्रकार आप भी रेल संचालन पर लेख श्रृंखला शुरु करें-यह अनुरोध भी है और अपेक्षा भी।
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भारत को डॉ. कलाम जैसे युवाओं 'नेताओं'की आवश्यकता है.
जनता का अगला मेण्डेट? मुझे तो नहीं लगता जनता आतंकवाद से लड़ने वाले के लिए वोट देगी, जाति से ऊपर उठ पाना हमले के तुरत बाद शायद हो पाता अब तो नहीं लगता.
नीरज
धन्यवाद सुंदर लेख के लिये
मुझे भी विज्ञान कथा लेखन कार्यशाला में भाग लेने 14 जनवरी को बुलंदशहर जाना है, सोच रहा हूं, क्या पहुंप सकूंगा।
आतंकी अड्डे तो खुद ही खत्म करने होंगे। उन की सामरिक तैयारी के साथ देश में ही नहीं दुनिया में भी वातावरण बनाना होगा। गुंड़ों की भी अपनी इज्जत होती है। जब तक वह पूरी तरह बदनाम नहीं होता उस पर हमला नहीं किया जाता। कंस को कृष्ण ने बुलाए जाने पर मारा। रावण से तो अंतिम समय तक सीता को लौटाने का अनुरोध किया जाता रहा।
लगता है हम सब भूल गए हैं।
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