मेरी पत्नी होली विषयक अनिवार्य खरीददारी करने कटरा गई थीं। आ कर बताया कि इस समय बाजार जाने में ठीक नहीं है। बेतहाशा भीड़ है। मैने यह पूछा कि क्या मन्दी का कुछ असर देखने को नहीं मिलता? उत्तर नकारात्मक था।
मेरा संस्थान (रेलवे) बाजार से इन्सुलर नहीं है और मन्दी के तनाव किसी न किसी प्रकार अनुभूत हो ही रहे हैं।
सरकारी कर्मचारी होने के नाते मुझे नौकरी जाने की असुरक्षा नहीं है। उल्टे कई सालों बाद सरकारी नौकरी होना सुकूनदायक लग रहा है। पर मेरा संस्थान (रेलवे) बाजार से इन्सुलर नहीं है और मन्दी के तनाव किसी न किसी प्रकार अनुभूत हो ही रहे हैं।
यह मालुम नहीं कितनी लम्बी चलेगी या कितनी गहरी होगी यह मन्दी। पर हिन्दी ब्लॉगजगत में न तो इसकी खास चर्चा देखने में आती है और (सिवाय सेन्सेक्स की चाल की बात के) न ही प्रभाव दिखाई पड़ते हैं। शायद हम ब्लॉगर लोग संतुष्ट और अघाये लोग हैं।
इस दशा में बीबीसी हिन्दी का धारावाहिक मुझे बहुत अपनी ओर खींचता है।
भरतलाल से मैने पूछा – कहीं मन्दी देखी? वह अचकचाया खड़ा रहा। बारबार पूछने पर बोला – का पूछत हयें? मन्दी कि मण्डी? हमके नाहीं मालुम! (क्या पूछ रहे हैं? मन्दी कि मण्डी? हमें नहीं मालुम!) |
आपको होली मुबारक।
पिछली पोस्ट - एक गृहणी की कलम से देखें।





34Comments so far:
Post a Comment
जॉइन्ट वेंचर की मीठाई सहित "होली की ढेरो शुभकामनाऐं.."
बहरहाल ...... होली मुबारक़ हो .... आप को और आप के परिवार को !!
इस मंदी और मेरे व्यवसाय पर असर के बारे में लिखना आरंभ किया था
पर व्यस्तता के कारण रुक गया। इस विषय पर अवश्य लिखना चाहता हूँ। थोड़ा और समय चाहता हूँ।
आप सब को होली की शुभकामाएं
आपको और आपके परिवार को होली की रंग-बिरंगी ओर बहुत बधाई।
regards
bahut wazan hai is baat mein..shayad yahi wajah hai is vishay par jyada likha hua dekha nahin.
Amma ji ko papad banatey dekh kar laga ,main bhi pahunch jaun..paapad khane..khud se to aaj kal ghar mein papad etc.banana kahan hota hai..
Holi ki dher sari shubhkamnayen ghar mein sabhi ko dijeeyega.
होली पर आप सबको मुबारकबाद..
जै जै
प्राइवेट नौकरी पेशाओं के लिए तो निश्चित रूप से होली मंदी पड़ गई है....पर कोई बात नहीं,होली तो कीचड पानी से भी उतनी ही मस्ती से खेली जा सकती...खुश होने के लिए बाज़ार के रंग की जरूरत नहीं पड़ती....मन ख़ुशी के रंग से भिंगोकर होली मनाई जा सकती है.
शुक्र है भरतलाल ने यह नहीं पूछा कि
मंडी
शबाना नसीर वाली फिल्म।
उसने सब्जी वाली मंडी ही पूछी।
होली पर तो देहमंडी भी पूछी जा सकती है।
वैसे मंदी का असर देह पर ही पड़ता है।
आलू के पापड़? क्या अब भी बनते हैं? प्लीईईईईईइज हमें रेसिपी दिला दिजीए न, बहुत साल हो गये खाये। और क्या क्या याद दिलायेगा ये ब्लोगजगत मुझे?………:)
आप ने बहुत अच्छा मुद्दा उठाया, इस बारे में बात होनी चाहिए, अब तो विश्व बैंक ने भी कह दिया है कि ग्रेट डिप्रेशन के बाद ये मंदी का सबसे खतरनाक दौर है, और ग्रेट डिप्रेशन एक बार फ़िर से हमारे द्वार खड़ा है।
हां हम सरकारी नौकर कुछ हद तक बचे हुए तो है पर डरे हुए भी हैं। दूसरों के घर के मनहूसी छायी हो तो अपने घर मस्ती कैसे छा सकती है।
खैर , आप को सपरिवार होली की शुभकामनाएं।
आलू के पापड़? अब भी बनते हैं? प्लीईईईईइज मुझे रेसीपी दिला देगें क्या? बहुत साल हो गये खाये हुए? ये ब्लोगजगत और क्या क्या याद दिलवायेगा हमें?…।:)
Roman hindi me likh rahee hun, isliye, dono shabon ke hijje ekhee honge...!
Aapko aur aapke sabhee blog ke doston ko tyohaar kee hardik shubhkaamnayen..!
लोगों से सरकारी नौकरी के रोने सुनते मुझे २० साल
हो गये। लेकिन ऐसे लोग बीस भी नहीं मिले जो नौकरी छो़ड़कर गये हों कहीं।
होली मुबारक। गुझिया बनवाने के किस्से लिखे जायें!
निस्सन्देह, मन्दी का प्रभाव है तो अवश्य किन्तु उतना नहीं, जितना चर्चाओं में, अखबारों में है। यह हमारे परम्परावादी (और कुछ सीमा तक रूढीवादी) होने का प्रतिफल भी है।
ब्लागर अघाए हुए लोग हैं या नहीं किन्तु मन्दी से प्रत्यक्षत: प्रभावित तो नहीं ही हैं।
बुरा न मानो होली है। होली है जी होली है
होली की शुभकामनाओं सहित!!!
प्राइमरी का मास्टर
फतेहपुर
आपको परिवार सहित होली की हार्दिक बधाई और शुभकामनाएं.
मंदी के बारे में लेख ब्लॉग जगत में नहीं आते, ऐसा नहीं है, मेरे ब्लॉग के निम्न लेख पर गौर फरमायें......
"Monday, 13 October, 2008
करें तो क्या करे ?????????????
करें तो क्या करें??????????????
मित्रो,
अक्सर हमें हिदायतों भरे ऐसे लेख पात्र- पत्रिकाओं में पढने को मिल जातें हैं, जो देखने-सुनने में तो काफी लुभावने, और मार्गदर्शक से लागतें हैं, पर यदि अमल में लेते हैं तो " लौट के बुद्धू घर को आए" सरीखा हाल होता है।
ऐसा ही एक लेख हमें इकोनोमिक्स टाइम्स में मिला जो हु-ब-हु प्रस्तुत है.......
नौकरी कर रहे हैं, तो जानिए अपने अधिकारों
3 Oct, 2008, 1510 hrs IST, इकनॉमिक टाइम्स
टेक्स्ट:
वॉल स्ट्रीट के डरावने सपने ने कई भारतीयों को पहली बार आर्थिक अनिश्चितताओं के रूबरू लाकर खड़ा कर दिया है। खास तौर से उन लोगों को जिन्होंने अपने करियर के दौरान मंदी का दौर नहीं देखा था। ................."
इस पर आपने टिप्पणी भी दी थी. खैर बात ५ माह पुरानी सो ............
होली पर आपको सपरिवार हार्दिक बधाई.
Post a Comment