Wednesday, April 15, 2009

सवेरे की हाइपर एक्टिविटी


जिनका सोचना है कि नौकरशाही केवल ऐश करने, हुक्म देने और मलाई चाभने के लिये है; उन्हें हमारे जैसे का एक सामान्य दिन देखना चाहिये।
सवेरे की व्यस्तता बहुत थकाऊ चीज है। वे लोग जो सवेरे तैयार हो कर भागमभाग कर जल्दी काम पर पंहुचते होंगे और फिर काम उन्हें एंगल्फ (engulf – निगल, समाहित) कर लेता होगा; वे मेरी व्यस्तता का अनुमान लगा सकते हैं। मेरे लिये काम पर पंहुचने की भागमभाग इतनी नहीं है, जितनी काम के मुझे ऐज-इज-ह्वेयर-इज बेसिस पर एंगल्फ कर लेने की है। जिनका सोचना है कि नौकरशाही केवल ऐश करने, हुक्म देने और मलाई चाभने के लिये है; उन्हें हमारे जैसे का एक सामान्य दिन देखना चाहिये।

Labourers पर हम ही केवल हाइपर एक्टिविटी (अत्यधिक क्रियाशीलता) के शिकार नहीं हैं। सवेरे की सैर पर मैं एक खण्डहर में रह रहे दिहाड़ी मजदूरों की हाइपर एक्टिविटी देखता हूं। सड़क के किनारे बन रही दुकानों को कभी डिमॉलिश (demolish – ढहाना) कर दिया गया होगा। उन्हीं के खण्डहरों में ये पन्द्रह बीस मजदूर रहते हैं। सवेरे काम पर निकलने के पहले ये नित्यकर्म से निपट रहे होते हैं। दो-तीन सामुहिक चूल्हों पर कुछ मजदूर अपनी रोटियां बना रहे होते हैं। सड़क के उस पार एक सामुहिक नल पर कुछ कुल्ला-मुखारी-स्नान करते देखे जाते हैं। एक दूसरे की दाढ़ी बनाते भी पाया है मैने उन्हें।

Labourers1इन चित्रों में बाहर जितने लोग दीख रहे हैं, उससे ज्यादा इन खण्डहरों के अन्दर हाइपर एक्टिविटी रत रहते हैं।

उनके तसले, फावड़े और अन्य औजार बाहर निकाले दीखते हैं। कहीं कोई सब्जी काटता और कोई आटा गूंथता दीखता है। साधन अत्यन्त सीमित नजर आते हैं उनके पास। पता नहीं उनकी वर्क-साइट कितनी दूर होगी। पैदल ही जाते होंगे – कोई साइकल आदि नहीं देखी उनके पास। अपना सामान वहीं खण्डहर में सीमेण्ट की बोरियों में लपेट-लपाट कर काम पर जाते होंगे।

उन्हें सवेरे पास से गुजरते हुये कुछ क्षणों के लिये देखता हूं मैं। उसके आधार पर मन में बहुत कुछ चलता है। कभी कभी लगता है (और मन भी ललचाता है उनकी मोटी रोटियां सिंकते देख) कि उनके साथ कुछ समय बिताऊं; पर तब मेरा काम कौन करेगा? कौन हांकेगा मालगाड़ियां?

अभी कहां आराम बदा, यह मूक निमंत्रण छलना है।
अभी तो मीलों मुझको, मीलों मुझको चलना है।   


54 comments:

  1. sahi kaha:

    जिनका सोचना है कि नौकरशाही केवल ऐश करने, हुक्म देने और मलाई चाभने के लिये है; उन्हें हमारे जैसे का एक सामान्य दिन देखना चाहिये।

    hamare pitaji ki bhi yahi stithi hai

    ReplyDelete
  2. यहां मुंबई में भी कई जगहों पर सुबह सुबह यही नजारा देखने मिलेगा। बंद दुकान के बाहर शटर से सटा कर कार्ड बोर्ड, बिस्किट के बडे बक्सों के टुकडों आदि से घेर-घार कर एक स्टोव जलाये कई लोग दिख जायेंगे। कोई आंटा घूथता है तो कोई सब्जी काट रहा होता है। वही दृश्य जैसा आपने इलाहाबाद में देखा वैसा ही कुछ यहां भी देखने मिल जाता है क्योंकि उनकी बिरादरी एक है - कर्मठ मजदूर वर्ग - जो अक्सर दिहाडी पर कहीं काम करते हैं और जैसे तैसे जीवन चलाते हैं, कुछ बचा कर पैसा घर जो भेजना होता है। लेकिन, शायद सरकार को ये सामुहिक अभाव केंद्र भी पसंद नहीं आते तभी तो अक्सर पुलिस या कोई अधिकारी उन्हें तितर बितर कर जाते हैं और शेष रह जाता है एक गत्ता, एक परात, कुछ सफेद आंटा और एक सफेद झूठ कि- इंडिया बदल रहा है।

    ReplyDelete
  3. सुबह -सुबह दिल से आपको इतना भावपूर्ण लेखन के लिए धन्यवाद कि " उन्हें सवेरे पास से गुजरते हुये कुछ क्षणों के लिये देखता हूं मैं। उसके आधार पर मन में बहुत कुछ चलता है। कभी कभी लगता है (और मन भी ललचाता है उनकी मोटी रोटियां सिंकते देख) कि उनके साथ कुछ समय बिताऊं; पर तब मेरा काम कौन करेगा? कौन हांकेगा मालगाड़ियां? ""
    और राबर्ट फ्रास्ट की रचना का प्रस्तुतिकरण भी पसंद आया .
    अभी कहां आराम बदा, यह मूक निमंत्रण छलना है।
    अभी तो मीलों मुझको, मीलों मुझको चलना है।
    वस्तुतः कर्म ही प्रधान है -बहुत सारे लोग हैं जिनकी पूजा केवल उनके कर्मों के आधार पर ही होती है ,समाज की जो तस्वीर आपने दिखाई है वह सुबह -सबेरे हर महानगर की तस्वीर है .

    ReplyDelete
  4. सब जगह यह नजारा दिखाई देता है। आप फोरलेन बना रही किसी बड़ी निर्माण कंपनी के काम को देखें तो पाएंगे कि सब से पहले स्टोर और मजदूरों के अस्थाई आवास बनते हैं। पता नहीं सब जगह कब ऐसा व्यवस्था बन पाएगी।

    ReplyDelete
  5. काम स्वयं में समाहित कर ले, और निगल ले; इसमें थोड़ा अन्तर देखता हूँ । समाहित कर लेने में एकमेक हो जाने का भाव है शायद ।

    लेखन आपका न तो आक्रामक बनाता है, और न ही निरुत्साहित करता है । यह बैलेन्स कैसे हो पाता है !

    ReplyDelete
  6. आप सुबह सुबह व्यस्त हो जाते हैं।
    हमारे लिए सुबह आराम का समय है।
    ५:३० को उठ जाते हैं, और ई मेल चेक करते हैं, documents/drawings वगैरह download करते हैं और यदि समय मिला तो आपका ब्लॉग पढ़ते हैं, और फ़िर योग / प्राणायम क्लास के लिए चले जाते हैं. क्लास से लौटकर, आराम से अखबार पढ़ते हैं, नहाते हैं, नाशता करते हैं सब बिना घड़ी देखे।
    समय की कोई पाबन्दी नहीं होती। कभी ९ बजे, कभी ९:३० और कभी कभी तो दस बजे निकलते हैं दफ़्तर के लिए।

    क्या मैं भाग्यशाली हूँ?
    पता नहीं. आप ही निश्चय कीजिए।
    मेरा काम तो शाम को ही शुरू होता है।
    जब आप सब ५ बजे घर जाने की तैयारी कर रहे हैं मैं व्यस्त हो जाता हूँ।
    तीन बजे से लेकर पाँच बजे तक सभी ई मेल भेजकर तैयार हो जाता हूँ।
    पाँच बजे से लेकर ई मेल आने लगते हैं, और मुझे Skype पर Conference Calls के लिए तैयार रहना पढ़्ता है। दफ़्तर के कर्मचारी तो ६:३० से लेकर ७ बजे तक निकल जाते हैं पर मुझे अकेले कभी कभी रात १० बजे तक इन अमरीकी वालों से निपटना पढ़ता है। उनके लिए सुबह का समय होता है और वे सब fresh रहते हैं जब मैं थका हुआ होता हूँ।
    बस रात के दस के बाद घर के लिए रवाना होता हूँ और कभी कभी तो गाड़ी चलाते चलाते मोबाईल पर उन लोगों का फ़ोन आ जाता है कुछ urgent पूछताछ के लिए।
    हमारे व्यवसाय में किसी एक व्यक्ति को अपना शाम का समय त्यागना पढ़ता है।
    किसी एक को contact person का रोल अदा करना पढ़ता है और मेरे देफ़्तर में वह व्यक्ति मैं ही हूँ।
    बस शनिवार और इतवार को कोई हमें disturb नहीं करता।
    सोमवार भी शान्ति का दिन होता है। मंगलवार और शुक्रवार सप्ताह के सबसे व्यस्त दिन रहते हैं।

    ReplyDelete
  7. "...जिनका सोचना है कि नौकरशाही केवल ऐश करने, हुक्म देने और मलाई चाभने के लिये है; उन्हें हमारे जैसे का एक सामान्य दिन देखना चाहिये।..."आह! आपने तो हमारे पुराने दिनों की याद ताजा कर दी. इसीलिए विभाग में वीआरएस की स्कीम आने पर सबसे पहले आवेदन करने वालों में से एक मैं भी था. बदमिजाज, नाकारा, अज्ञानी मगर बड़े ओहदों पर चल रहे अफसरों - जो टारगेटों को आउट आफ द ब्लू पूरा करने के लिए चौबीसों घंटे छड़ियाँ घुमाते फिरते थे - उनसे छुटकारा पाने का भी ये सबसे बढ़िया जरिया था...

    ReplyDelete
  8. "...जिनका सोचना है कि नौकरशाही केवल ऐश करने, हुक्म देने और मलाई चाभने के लिये है; उन्हें हमारे जैसे का एक सामान्य दिन देखना चाहिये।
    " और ये सामान्य दिन सच में ही ऐसे तथ्य उजागर करेगा जहाँ मेहनत है भाग दौड़ है और तनाव है.."

    Regards

    ReplyDelete
  9. sirji aapko to journalist hona chahie tha. aapke sochne ki shaili ham jaise patrakaro ko bhi naya najariya deti hai. hyperactivity ko naye andaj me jana. bahut khoob.

    ReplyDelete
  10. अन्य लोगों मे अपने को देखना शायद आत्मिक ज्ञान की उन्नति का परिचायक है. शुभकामनाएं.

    रामराम.

    ReplyDelete
  11. Attention Deficit Hyperactivity disorder?

    ReplyDelete
  12. दूर के ढोल सुहाब्ने होते है . जितनी समस्या बिल गेट्स को होगी उतनी ही रामू जो सडको पर रहता है उसको होगी .
    और नौकरी वाले को लिखा ही गया है निक्ख्द चाकरी भीख निदान

    ReplyDelete
  13. कुछ इसी तरह की हाइपर एक्टिविटी कस्‍बाई रेलवे स्‍टेशनों के बाहर मौजूद चाय मठरी वाले ढाबों में देखने को मिलती है। उनके संचालक भोर में आनेवाली ट्रेन के यात्रियों से कमाई की आशा में अंधेरे में ही अंगीठी सुलगाने और झाड़-पोंछ करने की जुगत में लग जाते हैं।

    ReplyDelete
  14. @ Realty Bytes - Attention Deficit Hyperactivity disorder?
    ----------
    आप को क्या लगता है?! वैसे जब मैने हाइपर एक्टिविटी लिखा था तो यह जरूर मन में था कि लेम्पूनिंग (lampooning) के लिये मसाला दे रहा हूं! :)

    ReplyDelete
  15. कभी कभी लगता है (और मन भी ललचाता है उनकी मोटी रोटियां सिंकते देख) कि उनके साथ कुछ समय बिताऊं; पर तब मेरा काम कौन करेगा? कौन हांकेगा मालगाड़ियां?
    इलाहाबाद के दिनों में मैंने सड़क कूटनेवालों के साथ कई बार रोटियाँ खाई हैं....हथपोई रोटियाँ। कभी बैठ लीजिए। आनन्द आएगा।

    ReplyDelete
  16. वास्‍तव में संपूर्ण विश्‍व कर्मप्रधान ही है ... सुबह अधिकांश लोग व्‍यस्‍त होते हैं ... इसमें अपने अपने स्‍तर के अनुसार लोग काम करते हैं ... इन सबका अलग अलग महत्‍व है ... बहुत अच्‍छी पोस्‍ट है।

    ReplyDelete
  17. खाली बैठ कर मख्खियाँ मारना कितना मुश्किल काम है ये आप उन से पूछिए जिनके पास काम नहीं है...ज़िन्दगी में हाईपर एक्टिविटी होनी ही चाहिए...उसके बिना सब कुछ नीरस है...सब की अपनी समस्याएं और उनसे झूझने के तरीके हैं...ज़िन्दगी यदि आसान हो जाये तो फिर ज़िन्दगी ही क्या...रोचक पोस्ट.
    नीरज

    ReplyDelete
  18. किसी दिन कोई आप से फोटू खीचने के पैसे मांग लेगा...हरेक की सुबह सक्रिय है .पहले बेडमिन्टन ,उसके बाद छोटू को स्कुल छोड़ना ,फिर पत्नी को कॉलेज .घर आकर स्नान ,ओर कभी कभी नाश्ता भी बनाना ...पहले कुछ रेफरेंस ...फिर काम पे...तभी तो हम कहते है सन्डे सुबह का सबसे शानदार दिन है....अलबत्ता इन मजदूरों का कोई सन्डे नहीं होता ..सबसे ज्यादा शारीरिक काम के बावजूद शायद अस्सी रुपये दिहाडी .

    ReplyDelete
  19. आपने उनकी व्‍यस्‍तता का काफी बारीक नजर से देखा है।

    ReplyDelete
  20. नौकरशाही के पास ताकत है, मगर सही अर्थों में वे ही देश को चलाते है. यह ऐसी जंजीर है जिससे देश जकड़ा हुआ है, अन्यथा अब तो टूट जाता.

    तो मै तो नहीं मानता नौकरशाही में ऐश ही ऐश है.

    ReplyDelete
  21. चलिए मान लिया 'केवल' ऐश करने, हुक्म देने और मलाई चाभने के लिये नहीं है. पर इन सब के लिए भी तो है ही :-)

    ReplyDelete
  22. हमारे लिए तो सुबह की कोई हाईपर एक्टिविटी नहीं है। रात भर काम करने के बाद सुबह पांच बजे तो सोने जाते हैं।

    ReplyDelete
  23. जीवन की विद्रूपताओं का इतना सूक्ष्म अवलोकन अपनी अनुभूति की तीव्रता को दर्शाता है।
    ----------
    तस्‍लीम
    साइंस ब्‍लॉगर्स असोसिएशन

    ReplyDelete
  24. 5:30 बजे उठना फिर जिम जाना..
    7:30 बजे तक आना.. और नाश्ते की तैयारी में लगना.. नहाना नाश्ता करना 9 :45 होते ही जूते पहनना और ऑफिस के लिए निकलना अगर 10 बजे के बाद जितने मिनट लेट जाए उसका डबल काम करना पड़ता है ऑफिस में.. सोफ्टवेयर हाजरी लेते है तो एक एक सेकेण्ड का हिसाब रखते है.. सुबह की इन हाइपर एक्टिविटीस में तीन अखबार और हनुमान चालीसा पढना भी शामिल है..

    मजदुर भी इंसान ही है और शायद हमारी तरह ही जीते है.. जैसा मैंने अपनी पिछली पोस्ट में भी लिखा "ज़िन्दगी में अपनी डेन सबको खुद ही लानी पड़ती है "आपकी अंतिम दो लाईनों को देखकर मुझे अंग्रेजी कविता की याद आ गयी..
    'miles to go before i sleep...'

    ReplyDelete
  25. चाहकर भी सुबह हाइपरएक्टिव नहीं हो पा रहा। लेकिन, कभी-कभी जब सुबह की शिफ्ट में हाइपरएक्टिविटी का कुछ अंश रहता है तो,लगता है अभी तो हाइपरएक्टिविटी का ह भी नहीं हो पाया है।

    ReplyDelete
  26. समय की दौड़ भी सापेक्षवाद को सच साबित करती है.किसी सुदूर रेगिस्तानी गाँव की सुबह दिन चढ़ने तक अलसाई रहती है, वहीं शहर की सुबह ऐसे जगती है जैसे किसी बिच्छू ने काट खाया हो.

    ReplyDelete
  27. बेहद अफ़सोस है की आज भी हिंदुस्तान में गरीबों का कोई हिमायती नहीं इतने साल की आजादी के बाद भी...खंडरों में रहकर गुजरा करने वाले इन का कहीं ठिकाना नहीं -दिहाडी पर जीने वाले लोगों कि स्थिति दयनीय है.
    हाल ही में 'गरीब 'राज्य के कुछ नेताओं की घोषित जमापूंजी [३८ करोर-१२० करोर!....]की खबर सुन कर यही लगता है कि दुनिया के सब से अमीर नेता भारत में ही हैं जिन्हें इन गरीबों कि नहीं सिर्फ अपने बैंक बैलेंस को सँभालने की फिकर रहती है.क्यों यह लोग कुछ पैसा इन के उत्थान में लगा देते..क़र्ज़ में डूबे किसानो की आत्महत्या रोक पाते?

    ReplyDelete
  28. कवन ससूर का नाती कहत हव कि सरकारी नौकरी मलाई चाभने का जरिया है। इस भारत में तो ऐसे-ऐसे उदाहरण मिल जाएंगे कि देखने के बाद सुबह का जोर से लगा पाखाना भी सरकारी नौकरी के नाम से सटक जाएगा। बकचोथी करने के लिए कुछुओ का दरकार नहीं पडता। जिस पर पडता है वहीं जानता है। अगर सब सरकारी नौकरी वाले बेइमान हो जाएं या रहते तो इंडिया ससुर का नाती अब तक तिब्‍बत बन गया होता। क्‍यों गलत कह रहे हों तो बताइये-----

    ReplyDelete
  29. ऊपर नीरज गोस्वामी जी की बात से इत्तेफ़ाक है। व्यस्त रहना अपने को तो बहुत भाता है, यही प्रयास रहता है कि कभी खाली न बैठूँ!! :)

    ReplyDelete
  30. हमारे शहर में सुबह की बेला में हाइपर एक्टिविटी न के बराबर है. केवल स्कूल जाते बच्चों में दिखाई देती है. हमलोग बड़े आलसी टाइप होते हैं. मैं खुद सुबह साढ़े आठ बजे आफिस पहुँचता हूँ लेकिन जल्दी करनी पडी ऐसा नहीं होता.

    रही बात अफसरों के बारे में धारणा बनाने की तो धारणा बनाने में कितना समय लगता है. दुनिया के सबसे आसान कामों में है धारणा बनाना.

    ReplyDelete
  31. नौकरशाही केवल ऐश करने, हुक्म देने और मलाई चाभने के लिये है , मेरे पिता जी का कहना भी यही होता है . कहते है बैंक की नौकरी अच्छी होती है . पिछले २ वर्षो से एक बैंक मनेजर के साथ रह रहा हूँ और मेरे बॉस ( वि आर एस ले चुके ) भी पहले मनेजर रह चुके है , उनका कहना है की बैंक की नौकरी कुत्ते की नौकरी है कभी मत करना और किसी को भी सलाह मत देना . इन बातों से अब जान गया हूँ की "दूर से सब हरा-हरा दिखता है" , पास जाने पर असलियत पता चलती है .

    ReplyDelete
  32. कितना भिन्न है ये नज़ार उस गांव के दृष्य से जहां सुबह-सवेरे किसान कांधे पर अपना हल लिए बैलों की जोडी की रस्स्सी हाथ में थामे किसी लोकगीत की तान साधे खेत की ओर निकल पडता है!

    ReplyDelete
  33. बहुत सही बात. रेलवे में आप जिस पोस्ट पर हैं उसपर काम के दबाव का मुझे खूब पता है. मैं स्वयं एक महकमे में अनुवादक हूँ और बहुतों को यह लगता है कि हिंदी से जुड़े पदों पर कुछ काम नहीं होता... सही है, लेकिन मुझ जैसे कुछ लोगों को उसके एवज में इतनी तरह के ढेर सारे काम करने पड़ जाते हैं कि बस! यहाँ दिल्ली में मैंने ऐसे दफ्तर भी देखे हैं जहाँ लोग आराम से १२ बजे तक आते हैं और ४:३० बजे चले जाते हैं.

    और सब मुझसे उम्मीद करते हैं कि मैं extra mile चलूँ... ऐसे ही सबको खुश करने के चक्कर में extra mile चलते-चलते मैंने खुद का कितना नुक्सान कर डाला.

    ReplyDelete
  34. नौकरशाही ऐश करने के लिए तो कतई नहीं है, हाँ नाजायज सुविधाओं का लाभ नौकरशाही जरूर ले लेती है - जैसे मातहत कर्मचारी से घरेलू काम करवा लेना.या सरकारी गाड़ी निजी उपयोग में लाना आदि.जितना बड़ा अफसर है उसे उतनी ही उलझन है. ऊपर का दबाव भी झेलना है और मातहतों को भी साथ ले कर चलना है. वैसे ऐश करना या अति व्यस्तता हो जाना बहुत कुछ कार्य के स्वरूप पर भी निर्भर करता है. कुछ लोग ऐसे पदों पर भी हैं जहां कोई काम नहीं.वे ऐश कर रहे हैं.
    सुबह की व्यस्तता जिम्मेदार अफसर की ज्यादा रहती है. आप गौर से देखें मजदूर की व्यस्तता कम नहीं है, लेकिन वह तनाव में नहीं दिखता, उस व्यस्तता के बेच भी वह आनंद के क्षण चुरा लेता है, जबकि सफ़ेदपोश ऐसा नहीं कर पाता.

    ReplyDelete
  35. हम कुछ नही कर सकते.सिवाय पुराने फुर्सत के दिनों को याद करने के ...
    हरिवंश जी का अनुवाद और रॉबर्ट फ्रोस्ट की मूल कविता दोनों ही बहुत पसंद है मुझे.

    ReplyDelete
  36. अच्छा उदबोधन !

    ReplyDelete
  37. हमारी हायपर एक्टिविटी तो शिफ्टों के हिसाब से बदलते रहती है। ज़्यादातर यह शिफ़्ट खतम होने के समय नज़र आती है।

    ये मालगाड़ियाँ हाँकने वाला ज़ुमला खासा पसंद आया।

    ReplyDelete
  38. हमारी सुबह ही सभी की तरह व्यस्तता भरी होती है....लेकिन सारे दिन की व्यस्तता के बाद कई बार बल्कि अक्सर रात भी हायपर एक्टिव हो जाती है! जो दूर बैठे सोचते हैं की ऐश की जिंदगी है वे नज़दीक आयेंगे तो धारणा बदल जायेगी!

    ReplyDelete
  39. अत्‍यधिक विलम्‍ब से टिप्‍पणी करने का सुख - बहुत सुख हुआ यह देख/जान कर कि हर कोई दुखी है।

    मेरी तरह खुदा का भी खाना खराब हे।

    ReplyDelete
  40. सहमत = सह + मत हूँ, जी !
    >

    ReplyDelete
  41. ज्ञान भैया मैने दोनो ही पक्ष को बहुत करीब से देखा है,यंहा राजधानी मे अफ़सरो की भी ज़िंदगी के तनाव को महसूस किया है तो450 किमी दूर ननिहाल मे राहत काम मे जुते छतीसगढ के मज़दूरो को भी करीब से देखा है।एक बात ज़रूर है पता नही क्या बात होती है उनके खाने मे जो पकते समय उठने वाली खूशबू मुंह मे पानी ला देती है।मैने गांव के मज़दूरो के साथ खेतो मे खाना खाकर देखा है ,उसका आनंद ही कुछ और है। आपके लिखे की क्या तारीफ़ करू कुछ कह्ते हुये भी दिल डरता है कहीं भूल से तू न समझ बैठे कि मै चम्मच्गिरी करता हूं। हा हा हा हा

    ReplyDelete
  42. अपने आस पास के माहौल का सूक्ष्‍म निरीक्षण किय है आपने।

    -----------
    तस्‍लीम
    साइंस ब्‍लॉगर्स असोसिएशन

    ReplyDelete
  43. नौकरशाही वाले परिवार में पला बड़ा हुआ हूं-ऐश है इस बात को तो कतई नहीं मानता,

    आपकी पोस्ट विचारणीय है एवं कविताई का अंदाज सराहनीय. :)

    ReplyDelete
  44. सच्ची में भौत कष्टों वाली है नौकरी अफसरी की।
    मालगाड़ी हांकना घणा महत्वपूर्ण काम है। मालगाड़ियों का देश के आर्थिक सामाजिक च सांस्कृतिक जीवन में महत्वपूर्ण योगदान है।याद करें, शोले पिच्चर में डाकू जिस गाड़ी को लूटने आते हैं, वह कोई राजधानी, शताब्दी टाइप नहीं थी। खालिस मालगाडी़ को लूटने आते हैं। मालगाड़ी ना होती, तो शोले ना होती, शोले ना होती तो हाय हाय इस मुल्क में कितना कुछ ना होता। चलाये रहिये मालगाड़ी।

    ReplyDelete
  45. हमको तो लगता है कि अब हम लोग इतने कामी हो चुके हैं कि भविष्य में अगर कभी मौक़ा मिले भी आराम करने का तो नहीं कर सकेंगे. मेरे एक मित्र हैं, वह कहते हैं कि अब आराम इकट्ठे ही होगा. पर मुझे उनकी बात पर भी भरोसा नहीं है. आख़िर ख़ाली हम लोग कैसे बैठ सकेंगे. आराम कर सकें इसके लिए ज़रूरी है कि पहले भरपूर काम कर लें और काम कर सकें इसके लिए ज़रूरी है कि थोड़ी देर भरपूर आराम कर लें. तो यह आराम भी काम ही जैसा हो कर रह जाता है. और बड़ी अच्छी बात है कि ऐसे ही कामी बने रहें.

    ReplyDelete
  46. पेट के लिए...
    बस इतना ही कहूँगा इस बारे में.

    ReplyDelete
  47. sabkuchh achcha laga aapki is post me....balki yah kahun ki bhavuk ho gayi to yah jyada sahi hoga.

    ReplyDelete
  48. मुझे आपका ब्लोग बहुत अच्छा लगा ! आप बहुत ही सुन्दर लिखते है ! मेरे ब्लोग मे आपका स्वागत है !

    ReplyDelete
  49. बेहद अफ़सोस है की आज भी हिंदुस्तान में गरीबों का कोई हिमायती नहीं इतने साल की आजादी के बाद भी...खंडरों में रहकर गुजरा करने वाले इन का कहीं ठिकाना नहीं -दिहाडी पर जीने वाले लोगों कि स्थिति दयनीय है.
    हाल ही में 'गरीब 'राज्य के कुछ नेताओं की घोषित जमापूंजी [३८ करोर-१२० करोर!....]की खबर सुन कर यही लगता है कि दुनिया के सब से अमीर नेता भारत में ही हैं जिन्हें इन गरीबों कि नहीं सिर्फ अपने बैंक बैलेंस को सँभालने की फिकर रहती है.क्यों यह लोग कुछ पैसा इन के उत्थान में लगा देते..क़र्ज़ में डूबे किसानो की आत्महत्या रोक पाते?

    ReplyDelete
  50. 5:30 बजे उठना फिर जिम जाना..
    7:30 बजे तक आना.. और नाश्ते की तैयारी में लगना.. नहाना नाश्ता करना 9 :45 होते ही जूते पहनना और ऑफिस के लिए निकलना अगर 10 बजे के बाद जितने मिनट लेट जाए उसका डबल काम करना पड़ता है ऑफिस में.. सोफ्टवेयर हाजरी लेते है तो एक एक सेकेण्ड का हिसाब रखते है.. सुबह की इन हाइपर एक्टिविटीस में तीन अखबार और हनुमान चालीसा पढना भी शामिल है..

    मजदुर भी इंसान ही है और शायद हमारी तरह ही जीते है.. जैसा मैंने अपनी पिछली पोस्ट में भी लिखा "ज़िन्दगी में अपनी डेन सबको खुद ही लानी पड़ती है "आपकी अंतिम दो लाईनों को देखकर मुझे अंग्रेजी कविता की याद आ गयी..
    'miles to go before i sleep...'

    ReplyDelete
  51. किसी दिन कोई आप से फोटू खीचने के पैसे मांग लेगा...हरेक की सुबह सक्रिय है .पहले बेडमिन्टन ,उसके बाद छोटू को स्कुल छोड़ना ,फिर पत्नी को कॉलेज .घर आकर स्नान ,ओर कभी कभी नाश्ता भी बनाना ...पहले कुछ रेफरेंस ...फिर काम पे...तभी तो हम कहते है सन्डे सुबह का सबसे शानदार दिन है....अलबत्ता इन मजदूरों का कोई सन्डे नहीं होता ..सबसे ज्यादा शारीरिक काम के बावजूद शायद अस्सी रुपये दिहाडी .

    ReplyDelete
  52. खाली बैठ कर मख्खियाँ मारना कितना मुश्किल काम है ये आप उन से पूछिए जिनके पास काम नहीं है...ज़िन्दगी में हाईपर एक्टिविटी होनी ही चाहिए...उसके बिना सब कुछ नीरस है...सब की अपनी समस्याएं और उनसे झूझने के तरीके हैं...ज़िन्दगी यदि आसान हो जाये तो फिर ज़िन्दगी ही क्या...रोचक पोस्ट.
    नीरज

    ReplyDelete
  53. "...जिनका सोचना है कि नौकरशाही केवल ऐश करने, हुक्म देने और मलाई चाभने के लिये है; उन्हें हमारे जैसे का एक सामान्य दिन देखना चाहिये।..."आह! आपने तो हमारे पुराने दिनों की याद ताजा कर दी. इसीलिए विभाग में वीआरएस की स्कीम आने पर सबसे पहले आवेदन करने वालों में से एक मैं भी था. बदमिजाज, नाकारा, अज्ञानी मगर बड़े ओहदों पर चल रहे अफसरों - जो टारगेटों को आउट आफ द ब्लू पूरा करने के लिए चौबीसों घंटे छड़ियाँ घुमाते फिरते थे - उनसे छुटकारा पाने का भी ये सबसे बढ़िया जरिया था...

    ReplyDelete

आपको टिप्पणी करने के लिये अग्रिम धन्यवाद|

हिन्दी या अंग्रेजी में टिप्पणियों का स्वागत है|
--- सादर, ज्ञानदत्त पाण्डेय