Tuesday, April 28, 2009

बकरी के बच्चे


बड़े प्यारे बकरी के बच्चे (मेमने) दिखे। यूं तो बकरी क्या, सूअर के बच्चे भी प्यारे लगते हैं। पर बकरी में एक निरीहता होती है जो हमें मन और आत्मा से ट्यून करती है।

Lambs बचपन में कहानी सुनते थे – बकरी और उसके तीन बच्चों की। बकरी बच्चों को अपने घर में टटरी (खपच्ची का दरवाजा) लगा बन्द कर चरने जाती थी। तीनों बच्चे चुलबुले थे। नाम था आल-बाल, च्यो-म्यों, गिलोट-मिलोट। शैतानी के चलते उन्होंने लोमड़ी के फुसलाने पर टटरी खोल दी थी। और फिर जाने कैसे जान बची।

भारतीय बाल कहानियां और भारतीय बाल कवितायें यहां का वैल्यू सिस्टम देते हैं बच्चों को। वे मछली का शिकार नहीं सिखाते। बल्कि बताते हैं – मछली जल की रानी है!


Sudesh Kumarश्री सुदेश कुमार: नर्सरी कवितायें और कथायें सामाजिक-आर्थिक असलियत, और प्रबंधन के अनेक सबक सिखाती हैं।

कुछ दिन पहले हमारे महाप्रबन्धक श्री सुदेश कुमार बता रहे थे कि अंग्रेजी नर्सरी राइम “बाबा ब्लैक शीप” असल में सम्पदा के वितरण की असलियत बताती है।

Baa, baa black sheep
Have you any wool?
Yes sir, yes sir.
Three bags full.
One for the master
and one for the dame.
And one for the little boy
who lives down the lane.

इसमें एक हिस्सा मालिक के लिये, एक हिस्सा अपने बीवी (अर्थात खुद) के लिये तय किया गया है। एक तिहाई ही गली में रहने वाले (आम जन) के लिये है। सार्वजनिक सम्पदा का यही वितरण-विधान है!

हमारे भारत में इस छाप की बाल कविता है? शायद नहीं।

खैर, आप बकरी के बच्चों की तस्वीर देखें। और अंग्रेजी बाल साहित्य को आउटराइट कण्डम न करें – एलिस इन वण्डरलैंण्ड नामक पुस्तक प्रबन्धन के कितने महत्वपूर्ण सबक सिखाती है! 


भोलू पांड़े गिरे धड़ाम:

भोलू रेलवे का शुभंकर (मैस्कॉट – mascot) है। उत्तर-मध्य रेलवे के रेल सप्ताह फंक्शन में एक फूले रबर के खिलौने के रूप में वह बड़ा सा लगा था। अपने दम पर  खड़ा। उस दिन गर्म लू के थपेड़े तेज चल रहे थे। भोलू पांडे धड़ाम हो गये हवा की चपेट में। चारों खाने चित! पर तत्काल एक तत्पर रेल कर्मी ने उसे उठाकर खड़ा कर दिया।

घटना से सीख – शुभंकर जो है सो है, रेलगाड़ी तो मुस्तैद रेल कर्मी ही चलाते हैं। रेलवे की मजबूती रेलकर्मियों से है। 

अपडेट: भोलू, एक हाथी को रेलवे का शुभंकर बनाया गया था रेलवे की १५०वीं वर्षगांठ के अवसर पर। यह रेलवे की तरह विशालकाय है, पर हिंसक नहीं वरन मित्रवत है। हाथी रेलवे की तरह लोगों को और सामान को ढोता है। इससे बेहतर शुभंकर क्या होता!

38 comments:

  1. जानकार अच्छा लगा. काश बाल कविताओं में छिपे वितरण/प्रबंधन को हम भी समझ पाते - तब तो शायद बचपन में ही प्रबंधन-गुरु बन जाते.

    ReplyDelete
  2. रेलवे ने शुभंकर को नया नया मस्कट बनाया है क्या? इसके बारे में तो कोई जानकारी ही नहीं थी।

    बकरी के बच्चे तो बडे मासूम लगते हैं, इसलिये सीधे बच्चों को भी तो कभी कभी बकरी कह देते हैं। हम तो खैर बचपन में भी दुष्ट ही बने रहे।

    हिन्दुस्तानी बच्चों को अंग्रेजी Poem/Rhymes गाते देखना हो तो इस लिंक पर गौर फ़रमायें। :-)

    हम तो RSS के स्कूल में पढे कम्यूनिस्टी हैं तो कवितायें भी हिन्दी वाली ही याद हैं।

    वीर तुम बढे चलो, धीर तुम चले चलो...

    हम नन्हें मुन्ने हो चाहें पर नहीं किसी से कम,
    आकाश तले जो फ़ूल खिले वो फ़ूल बनेंगे हम।

    ReplyDelete
  3. अरे लिंक देना तो भूल ही गये:

    http://www.youtube.coम/watch?v=43IbG8N1Rtc

    ReplyDelete
  4. पिताजी खुद अध्यापक थे, दूर एक छोटे कस्बे के विद्यालय में(तब दूर था) अब रोज आया जाया जा सकता है)सप्ताह में एक दिन आते थे। बाबा के पास मंदिर में रहना वही स्कूल था। तो नर्सरी गीतों के स्थान पर आरतियाँ और भजन पहले याद हुए। मैया कबहुँ बढ़ेगी चोटी, जय जगदीश हरे, और श्री रामचंद्र कृपालु भज मन। प्रारंभिक स्कूल मंदिर ही था। स्कूल में भर्ती हुए तीसरी क्लास में तब सिर्फ दूसरी की हिन्दी पुस्तक का एक गीत याद था, जो एक पोस्ट में लिख चुके हैं- आया वसंत आया वसंत, वन उपवन में छाया वसंत, गैंदा और गुलाब चमेली.....

    आप कभी कभी अतीत में खींच ले जाते हैं। वह साधन हीन था लेकिन अब भी सुंदर स्वर्णिम लगता है।

    ReplyDelete
  5. आप का ये लेख तो किसी ट्रेनी शिक्षक के लिए आदर्श लेसन प्लान है, बकरी के बच्चे से शुरू होकर लन्दन स्कूल ऑफ़ इकोनोमिक्स तक.
    वैसे नीरज जी का दिया हुआ लिंक भी देखा बढ़िया है, अगर वक़्त हो तो youtube पर ये लिंक देखे (http://www.youtube.com/watch?v=DssSpNqbc64&feature=related), आशा है कि राईम का ये रूप आप को पसंद आएगा. पोस्ट का रुख दूसरी तरफ मोड़ने के लिए अग्रिम क्षमा सहित.

    ReplyDelete
  6. मेमने और गोलू दोनों रोचक रहे !

    ReplyDelete
  7. अरे यह तो गोलू नहीं भोलू हैं जरा इनके जन्म की कथा तो बता दें !

    ReplyDelete
  8. बकरी के मेमने सच में बहुत प्यारे हैं ।
    छुटपन की कविताओं में प्रबन्धन के गुर तो बाद में समझ में आते हैं, पहले तो सम्मुख होता है उन कविताओं का मोहक दृश्य विधान और अछूती कल्पना ।

    ReplyDelete
  9. Some Children's Nursery Rhymes do tell strange stories ...
    Jack & Jill went up the hill ...
    &
    Hickory Dickory Dok ...
    My Fav is
    " Twinkle Twinkle little star " :)
    which I'm singing often.
    In company of Noah ..the Kid Goat r really cute.

    ReplyDelete
  10. नव शिशु पक्षी-पशुओं के भी,,
    सबको लगते अच्छे।
    मुन्नी हो या मुन्ना, सबको-
    प्यारे लगते बच्चे ।।

    ReplyDelete
  11. बड़ा ही रोचक और हृदयस्पर्शी विषय उठाया है आपने । बकरी के बचपन से आपने सबको अपने अपने बचपन में सुखद डुबकी लगाने के लिये बाध्य कर दिया ।
    मुझे जितने भी सुभाषित आज भी जीवन में प्रेरणा देते हैं और समस्याओं के समय मार्गदर्शक बन खड़े मिलते हैं, सारे के सारे बचपन में ही सीखे और बड़ी सुगमता से सीखे । भाषा ज्ञान सिखाने के अतिरिक्त भविष्य की वैचारिक नींव भरने का भी काम करते हैं ये सुभाषित । आजकल की कुछ राईम्स बच्चों के मुख से सुनता हूँ तो लेखकों पर दया और क्रोध दोनो आता है । कदाचित मर्म नहीं समझे आधुनिक राईमकार । संस्कृति, समाज, दर्शन और काल का ज्ञान सरल भाषा में पिरोते हुये सुभाषित व राईम होने चाहिये ।
    भोलू प्रतीक नहीं, विचारधारा है गिर गिर कर पुनः उठ खड़े होने की ।

    ReplyDelete
  12. ज्ञानजी,
    शिव कुमार मिश्रजी और आपको को बधाई।
    आप लोगों का ब्लॉग "सर्टिफिकेटधारी शिक्षित" (shiv-gyan.blogspot.com) का एक अंश कल बेंगळूरु से छपने वाला समाचार पत्र "दक्षिण भारत राष्ट्रमत" में छपा है। (see page 6, under "ब्लॉग बाइट्स")

    उसी ब्लॉग पर टिप्पणी के माध्यम से आपको बताना चाहा लेकिन किसी कारण यह टिप्प्णी छप न सकी।

    ReplyDelete
  13. बकरी के ये बच्चे तो बडे ही प्यारे और मासूम लग रहे हैं.....बकरी और तीन बच्चो की कहानी पढ़ कर हमे भी बचपन याद आ गया.... और दो बकरियों वाली कहानी भी हुआ करती थी जो एक दुसरे को पुल पार करने में मदद करती है......ये बाल कविताये और कहानिया जीवन में प्रेरणा स्रोत है....आभार फिर उन्ही नन्ही नन्ही प्यारी यादो में ले जाने के लिए..

    regards

    ReplyDelete
  14. रोचक रही यह पोस्ट ,धन्यवाद .

    ReplyDelete
  15. बच्चे मन के सच्चे . एक कविता मे प्रवंधन का गुण कमाल है इस और कभी ध्यान ही नहीं दिया .

    ReplyDelete
  16. bakari ke bachchey bahut pyare hain...

    Bholu...railway ke shubhankar ke bare mein nahin maluum tha...bahut pyara mascot hai ..tirchhi nazaren kiye hue!
    aur Bholu maharaaj ki yah clip subah subah muskurahaten bikher gayee..:) :)

    ReplyDelete
  17. बात तो सही कही आपने ....तसवीरें बहुत अच्छी हैं

    मेरी कलम - मेरी अभिव्यक्ति

    ReplyDelete
  18. पहले गोलू पांडे, फिर भोलू पांडे, कौनो दिन पप्पू पांडे भी भेंटा जहिएं. सब नगद-नगद गदेला पांड़े हो जयहीं त हमरे बदे का बचे. रेलवे सप्ताह बाबा ब्लैकशिप वाली समाजवादी कविता से शुरू हुआ और भोलू के 'पांडेवाद' से खत्म हुआ . वाह!

    ReplyDelete
  19. मासूमियत और ज्ञान, दोनो से भरी पोस्ट...।
    अहा...!

    ReplyDelete
  20. रेल्वे का शुभंकर एकदम उपयुक्त है, उसी की तरह विशाल भारी भरकम.

    हमारे यहाँ कविताएं न सही पंचतंत्र की कहानियाँ जरूर है.

    ReplyDelete
  21. अक्सर सभी बाल कहानियों और कविताओं मे जीवन के बहुत गूढ रहस्य और सीख छुपी होती है. अपना अपना नजरिया है देखने का.

    रामराम.

    ReplyDelete
  22. बच्चे, चाहे वे आदमी के हों या अन्य जानवरों के, इसलिये अच्छे लगते हैं क्योंकि उनमें किसी प्रकार का कलुष नहीं होता।

    ReplyDelete
  23. भाई ज्ञान जी,

    "अंग्रेजी बाल साहित्य को आउटराइट कण्डम न करें"

    आपको शायद ऐसा कहने की जरूरत नहीं थी, क्योंकि आपने प्रारंभ में ही लिख दिया था कि....

    "यूं तो बकरी क्या, सूअर के बच्चे भी प्यारे लगते हैं। पर बकरी में एक निरीहता होती है जो हमें मन और आत्मा से ट्यून करती है। "

    अब ये बात बहस का विषय हो सकती है कि बकरी का बच्चा कौन और सूअर का बच्चा कौन...............खैर......यहाँ मैं इस सम्बन्ध में उलझना और किसी को आहात करना मेरा मकसद नहीं, कुओंकी भाषाई विवाद से आज तक किसी का भला नहीं हुआ है.

    वैसे भी अपने यहाँ कहा गया है कि ज्ञान कहीं से भी मिले ले लेना चाहिए. और जिसको चाहत होती है वह कहीं से भी निकाल लेता है, जो अंग्रेजी पसंद वह अंग्रेजी की पोएम से और जो हिन्दी पसंद वह हिंदी कविताओं से.......कुछ तो ऐसे जो कहीं से भी ......निकाल ही लेते हैं..........

    जैसे आपने रेलवे कर्मी से भी शुभंकर मामले में कुछ ज्ञान की बात निकाल ही ली..........


    चन्द्र मोहन गुप्त

    ReplyDelete
  24. "हमारे भारत में इस छाप की बाल कविता है? शायद नहीं।"
    शायद हो भी नही सकती। क्युँकि हमे बकरी की निरीहता पंसद है। वही छाप भारत मे नजर आ रही है। लेकिन सबक लेना चाहे तो कही से् भी अच्छी सीख ली जा सकती है।

    ReplyDelete
  25. As far as moral values are concerned, thats what Hinduism (I hope friends wont find this word communal in this time of elections)is all about. "Mil Baant Khaana' is taught at the very day when a kid is told to share his temple 'Prashaad' with others.

    Rest about our education system, it is well cared by Mr. Macaulay. Got nothing to say about it. I am not condemning English literature but surely wanna stand with 'poor' Hindi.

    ReplyDelete
  26. हमारे नेता जो खुदे अपने मालिक भी हैं, कम से कम इससे कुछ सीखें..लोकसभा और विधान सभा में तो इसे सुबह की प्रार्थना बना देना चाहिये.:

    Baa, baa black sheep
    Have you any wool?
    Yes sir, yes sir.
    Three bags full.
    One for the master
    and one for the dame.
    And one for the little boy
    who lives down the lane.


    इसमें एक हिस्सा मालिक के लिये, एक हिस्सा अपने बीवी (अर्थात खुद) के लिये तय किया गया है। एक तिहाई ही गली में रहने वाले (आम जन) के लिये है।

    कम से कम एक तिहाई तो आम जन तक पहुँचे.

    ReplyDelete
  27. चलिए इसी बहाने बाल साहित्य चर्चा तो हुई।

    ----------
    S.B.A.
    TSALIIM.

    ReplyDelete
  28. यूं तो बकरी क्या, सूअर के बच्चे भी प्यारे लगते हैं। पर बकरी में एक निरीहता होती है जो हमें मन और आत्मा से ट्यून करती है।निरीह और लल्लू सूअर (घरेलू, जंगली नहीं) के बच्चे भी होते हैं। और मेमनों की ही भांति क्यूट भी होते हैं! :)

    रेलवे का मैसकॉट वाकई उपयुक्त है, विशाल लेकिन मित्रवत! :)

    ReplyDelete
  29. ये शुभंकर जिसने बनाया है रेलवे के लिए, वो तो घणा व्यंग्यकार रहा होगा और इसे रेलवे के लिए मंजूर करने वाले भी कम नहीं रहे होंगे।
    सफेद हाथी को बताइए, रेलवे का प्रतीक बनाया गया। मोटू, तोंदू हाथी लगता है किसी नोटखाऊ टीटीई का प्रतीक है। कुछ स्मार्ट सा प्रतीक बनाया जाये, उछलता हुआ चीता टाइप।
    वैसे बढ़िया बात बनायी है शिरिमानजी ने।

    ReplyDelete
  30. भारतीय बाल कहानियां और भारतीय बाल कवितायें यहां का वैल्यू सिस्टम देते हैं बच्चों को। वे मछली का शिकार नहीं सिखाते। बल्कि बताते हैं – मछली जल की रानी है!

    क्या बात कही है आपने. संस्कार कोई सीखने सीखाने की चीज नहीं है. वो तो रिसते है बच्चों के मन के अन्दर इन्ही छोटी छोटी कहानी कविताओं के माध्यम से. वहीँ ये हमारी सांस्कृतिक पहचान भी हैं.
    बहुत अच्छा लिखा है शुभकामनाये.

    ReplyDelete
  31. बहुत अच्छी प्रस्तुति.. पोस्ट पढ़कर एक बार तो बचपन में ही पहुंच गए.. आभार

    ReplyDelete
  32. विवेक सिंह - >
    बकरी के बच्चे अभी तक बचे हुए थे क्या आपकी कलम से ? आश्चर्यम आश्चर्यम :)

    ReplyDelete
  33. आपने हमारे छोटू की कविता यहाँ छाप दी सर जी .पर मन आज प्रफुल्लित हो गया आपकी पोस्ट पढ़ के ...धिचक धिक्चक..

    ReplyDelete
  34. जानवरों को सही कोण से देखा जाये तो मनुष्य को एकदम उनसे "प्रेम" हो जायगा. इसी कारण तो बच्चों की कहानियों और कार्टूनों में जानवरों को (यहां तक की चीटियों को और मेंढकों को) इतना स्थान दिया जाता है.

    सस्नेह -- शास्त्री

    ReplyDelete
  35. शुभंकर (हाथी) को रेलवेवाले उठाकर सहारा देकर खड़ा कर रहे हैं। क्या धुरविरोधी गठबंधन है।

    ReplyDelete
  36. भोलुजी कई केला खाया
    उसका छिलका वहीँ गिराया
    भोलू पांड़े गिरे धड़ाम
    मुंह से निकला हाय राम :-)

    (लालाजी की जगह भोलू पांडे)

    ReplyDelete
  37. अंग्रेजी बाल गीतों में सचमुच वास्तविक घटनाओं के संकेत छिपे हुए हैं। कहा जाता है कि रिंगा-रिंगा-रोसेस... वाला बाल गीत यूरोप में प्लेग महामारी से संबंधित है। इसमें प्लेग की छूत लगने पर जो लक्षण प्रकट होते हैं, उनका बड़ा ही सटीक वर्णन है। इस बाल गीत का अंत इस पंक्ति से होता है ... एंड ओल फोल डाउन, अर्थात सब गिर जाते हैं (यानी मर जाते हैं)। उन दिनों प्लेग लाइलाज था। उस महामारी में यूरोप की एक-तिहाई आबादी खेत रही थी।

    ReplyDelete

आपको टिप्पणी करने के लिये अग्रिम धन्यवाद|

हिन्दी या अंग्रेजी में टिप्पणियों का स्वागत है|
--- सादर, ज्ञानदत्त पाण्डेय