मैं वाद-विवाद प्रतियोगिताओं में चमकदार नहीं रहा। पर छात्र दिनों में अपने मित्रों को वाद विवाद में किसी विषय के पक्ष और विपक्ष में मुद्दे जरूर सप्लाई किये हैं। और कई बार तो एक ही डिबेट में पक्ष और विपक्ष दोनो को मसाला दिया है। पर अगर किसी मुद्दे पर अपने को बौद्धिक या नैतिक रूप से प्रतिबद्ध पाता था, तो वहां किनारा कर लेता था। दुर्भाग्य से काजमी छाप लीगल काम में वह किनारा करने की ईमानदारी नजर नहीं आती।
मित्रों, भारत में विधि व्यवस्था में संसाधनों की कमी सबसे बड़ा मुद्दा नहीं है। किस व्यवस्था में संसाधन की कमी नहीं है? मैं किसी भी प्रॉजेक्ट पर काम करना प्रारम्भ करता हूं तो सबसे पहले संसाधनों की कमी मुंह बाये दीखती है। मैं मालगाड़ी परिवहन देखता हूं। उसमें इन्जन/वैगन/चालक/ ट्रैक क्षमता – सब क्षेत्रों में तो कमी ही नजर आती है। तब भी हमें परिणाम देने होते हैं।
पर अगर अपने काम के प्रति अनैतिक होता हूं, तब बण्टाढार होना प्रारम्भ होता है। तब मैं छद्म खेल खेलने लगता हूं और बाकी लोग भी मुझसे वही करने लगते हैं।
यही मुझे भारत के लीगल सिस्टम में नजर आता है। क्लायण्ट और उसके केस के गलत या सही होने की परवाह न करना, तर्क शक्ति का अश्लील या बुलिश प्रयोग, न्यायधीश को अवैध तरीके से प्रभावित करने का यत्न, फर्जी डाक्यूमेण्ट या गवाह से केस में जान डालना, अपने क्लायण्ट को मौके पर चुप रह जाने की कुटिल (या यह कानून सम्मत है?) सलाह देना, गोलबन्दी कर प्रतिपक्ष को किनारे पर धकेलना, मामलों को दशकों तक लटकाये रखने की तकनीकों(?) का प्रयोग करना --- पता नहीं यह सब लीगल एथिक्स का हिस्सा है या उसका दुरुपयोग? जो भी हो, यह सामान्य जीवन की नैतिकता के खिलाफ जरूर जाता है। और आप यह बहुतायत में होता पाते हैं। मेरी तो घ्राण शक्ति या ऑब्जर्वेशन पावर बहुत सशक्त नहीं है – पर मुझे भी यह उत्तरोत्तर बढ़ता नजर आता है।
श्रीमन्, यह लीगल-एथिक्स हीनता असल गणक है जो व्यवस्था के महत्वपूर्ण अंग/खम्भे को खोखला करता है। और इस तथ्य को इस आधार पर अनदेखा/दरकिनार नहीं किया जा सकता कि व्यवस्था के सारे ही खम्भे तो खोखले हो रहे हैं।
और सही समाधान काजमीत्व के स्थानपर व्यापक युधिष्ठिरीकरण की बात करना नहीं है। आप किसी को जबरी एथिकल नहीं बना सकते। पर इलेक्ट्रॉनिफिकेशन में समाधान हैं। नन्दन निलेकनी को किसी अन्य क्षेत्र में इसी प्रकार के समाधान हेतु अथॉरिटी का अध्यक्ष बनाया गया है। कुछ वैसा ही काम लीगल क्षेत्र में भी होना चाहिये।





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न्यायव्यवस्था के साथ जो व्यवस्था शब्द है यह उस पूरे परिदृश्य को व्याख्यायित करता है जिसमें जज, अदालतों के विभिन्न कर्मचारी, नये-पुरानें सभी वकील, उन के कर्मचारी, टाउट्स तथा वादकारी आदि जुड़े हैं। इन सबनें मिलकर न्यायव्यवस्था को नारकीय बना दिया है। इस पर भी भारतीय पुलिस की तरह यह एक नेशसरी इविल तो है ही। विकल्प के अभाव में यह अभी तक सही जारही है। यद्यपि अब अधिकाँश लोग कोर्ट से बाहर विवाद सुलझानें में विश्वास रखते हैं। आपराधिक मामलों में ड़ाइरेक्ट एक्शन तो सर्वत्र दिख रहा है।
मैनें एक वकील की हैसियत से १९७३ में जब कोर्ट जाना शुरू किया तो मेरे एक सीनियर नें अदालत शब्द का अर्थ बताया था। अ+दा+ल+त= आओ लड़ो देओ और तबाह हो जाओ। १९८० मे ऊब कर जब रेगुलर प्रैक्टिस छोड़नें और कंसल्टेंसी करनें का निर्णय लिया उस समय से आज पतन ही हुआ है।
लेकिन यह पतन सभी प्रोफेशन्स में हुआ है। हाँ धर्म का स्थान लेनें वाली न्याय-व्यवस्था जिस पर पूरा समाज टिका हो वह अन्यायी हो जाए, तो? ? ?
व्यवस्था ही ऐसी है !
सारे प्रोफेशनों में गिरावट आई है लेकिन तीन P ऐसे हैं जिनमें होनेवाला पतन पूरे समाज को रसातल पर ले जा रहा है. वे हैं police, press, और prosecutors.
मैने कहीं किसी न्यायविद् को पढ़ा था कि न्यायमूर्तियो को कानून को छोड़ कर सब कुछ पढना चाहिये क्योकि कानून के ज्ञान से ज्यादा जरूरी है व्यवहारिक ज्ञान जिसके बल पर सार्थक न्याय दिया जा सकता है। यह व्यवहारिक ज्ञान सिर्फ साहित्य और समान से जुड़े बिना नही मिल सकता है।
लोग अभी भी न्यायालयों के बाहर अपने मुद्दे निपटाने पर विश्वास रखते हैं, चाहे बातचीत से हो या हिंसा करके हो । कसाब का भी केस बाहर ही निपटा देना चाहिये था तब शायद ऐसे लोगों की ’देशभक्ति’ देखने का दुख न मिलता हम देशवासियों को ।
यहीं वह नैतिक प्रश्न उठता है कि मुवक्किल यदि वास्तव में अपराधी है और उसने वकील महोदय को सच बता दिया है, तो वकील क्या करे? पिछ्ली पोस्ट में कहीं गांधी की चर्चा हुई थी। व्यवसायिक और नैतिक द्वन्द्व के दौरान उन्हों ने सामान्य नैतिकता को प्राथमिकता दी थी। चलिए यह मान लेते हैं कि हर वकील नैतिकता को प्राथमिकता देगा और इसलिए कोई भी ऐसा केस नहीं लड़ेगा जहाँ मुवक्किल वास्तव में दोषी होगा यानि कि वकील साहब को यह बताएगा - वह भी पहली भेंट में। ऐसी स्थिति में दो पक्ष बनते हैं:
(1) समाज आदर्श हो जाएगा। दोषी को कोई बचाव नहीं होने से वह बहुत शीघ्र दण्डित होगा।
(2) नं. 1 आदर्श स्थिति है जो कभी नहीं होगी। जैसे ही ऐसा होना शुरू होगा, अपराधी या दोषी वकील से भी वैसे ही झूठ बोलेंगे जैसे कोर्ट में बोलते हैं। जटिलता बढ़ेगी। पहले बेचारे वकील को खुद समझना होगा कि उसका मुवक्किल वाकई दोषी है। समझते समझते जब वह डिफेंस छोड़ने को मन बनाएगा तब तक कोर्ट में केस ऐसे स्टेज में पहुँच चुका होगा कि 'भइ गति साँप छ्छुन्दर केरी'।
इसलिए प्रोफेसनल होना ही बेहतर है। हर व्यक्ति के नैतिकता के अपने मानदण्ड होते हैं। उन मानदण्डों के अनुसार वह निर्णय ले और ऐसे केस हाथ में ले या न ले। इतनी स्वतंत्रता तो हमें वकील को देनी ही होगी। लेकिन यदि केस इतना स्पष्ट है कि आम जन को अपराधी स्वयंसिद्ध सा दिखता है, तो वकील साहब को आलोचना झेलने और उसकी स्वतंत्रता देने के लिए भी तैयार भी रहना होगा।
हाँ, कसाब का केस एकदम अलग है और मैं अपना मत इससे पहले की पोस्ट में दे चुका हूँ।
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इतने देर तक लंठ की टिप्पणी को झेलने के लिए सबको धन्यवाद ;)
आखिर आज सब प्रोफेसनालिज्म के यही मायने तो बच रह गए हैं??????
दुसरा आपका system वो कैसा है... मान लो कि बईमानी है और रहेगी.. पर system इतना मजबुत हो कि वो सही गलत का फैसला कम समय में कर पाये.. लेकिन बात वो ही है system कौन बनायेगा..
--- और इस तथ्य को इस आधार पर अनदेखा/दरकिनार नहीं किया जा सकता कि व्यवस्था के सारे ही खम्भे तो खोखले हो रहे हैं।
मरने वालो मे अगर काजमी साहब आप का जबान बेटा होता तो भी क्या आप इतनी मेहनत करते ......
इसी विषय पर कुछ लोगों से बात हुई कि हमारा कानून ऐसा है कि अगर कोई वकील कसाब की पैरवी नही करेगा तो उसको यहां के कानून के हिसाब से बरी करना पडॆगा???
मुझे नही पता कि कोई ऐसा कानून है भी या नही..या इस बात मे कितनी सच्चाई है? अगर यहां कोई जानकार हों तो अवश्य बतायें..इसी उद्देश्य से मैने यह यहां लिखा है.
रामराम.
सच बात कह कर झकझोर कर रख दिया आपने. पर अर्थतंत्र में अर्थ की ही महत्ता है...........
आज की दुनिया में सच्चाई के साथ रहकर कितने लोग पैसा कमा पा रहे हैं?
सर्वत्र भ्रष्टाचार ही फैला नज़र आ रहा है..........इसे ही आज शिष्टाचार का नाम दिया जा रहा है....
गाडी से उतर कर आने वाले का तहे दिल से स्वागत-सम्मान तो सभी करते हैं, पर फटेहाल नाते रिश्तेदारों या पढ़े लिखों का कोई नहीं..........
लोगों की नज़रों में सम्मानित रहने के लिए गिरना शायद आज के युग में अपरिहार्य सा हो गया है..............
सम्मानितों के पतन का और भी कैसा -कैसा रूप भविष्य दिखायेगा, हमें तो उसी का इंतजार है......
चन्द्र मोहन गुप्त
राजा बिके टका में भइया ऐसो देश हमारो
सत के पालन हारो सुत पे शीश चलावे आरो ......
मुझे लग रहा है कि जब हम नैतिकता की बात कर रहे हैं तो उन नैतिक दायित्वों की बात कर रहे हैं जो एक भारतीय के हैं. वकील के नैतिक दायित्व की बात करें तो उसके लिए अपने क्लांईट को बचाना ही उसका नैतिक दायित्व है जिस बात के वो पैसे ले रहा है.
॒राज भाटिया जी,
वकील का काम होता है सच को सामने लाना, सच्चे को इन्साफ़ दिलाना, ओर झुठे को पकडवाना,उसे बचाना नही... आप शायद वकील और न्यायाधिश के बीच क्न्फ्यूज हो गये हैं.
किन्तु एक वकील होने से ज्यादा और पहले वो एक भारतीय नागरिक है तो प्रेसिडेन्स थ्योरी के हिसाब से देशद्रोही/ आतंकवादी का साथ देना तो गलत ही है.
सवाल बहुत सही हैं मगर हमेशा की तरह (सही) जवाब मिलना कठिन है क्योंकि हमारी आदत सतही खोजबीन करने की ही रहती है. मेरी बात काफी लम्बी हो जायेगी जिसके लिए अभी न तो समय है और न ही मैं उस बात को टिप्पणियों के ढेर में दबते देखना चाहता हूँ इसलिए कभी तसल्ली से बैठकर एक पोस्ट लिखूंगा मगर अभी के लिए सिर्फ रामजेठमलानी के एक (पूर्णतया कानून-सम्मत) वक्तव्य की बानगी:
"आप जानते हैं कि आपके मुवक्किल ने हत्या की है वो अपराधी है लेकिन आपको तो उसे बचाना ही पड़ेगा.
फ़र्ज़ करो कि मुझे मालूम है कि मेरे मुवक्किल ने अपराध किया है. मैं अदालत से कहूँगा कि साहब मेरे मुवक्किल को सज़ा देने के लिए ये सबूत काफ़ी नहीं हैं. मैं ऐसा नहीं कहूँगा कि मेरा मुवक्किल कहता है कि उसने ऐसा नहीं किया इसलिए वो निर्दोष है.
ये हमारे पेशे की पाबंदी है. अगर मैं ऐसा करूँगा तो बार काउंसिल मेरे ख़िलाफ़ अनुशासनात्मक कार्रवाई कर सकता है. मुझे मालूम है कि मेरे मुवक्किल ने ऐसा किया है तो तो उसे बचाने के लिए मैं ऐसा नहीं कहूँगा कि किसी दूसरे ने अपराध किया है. आप झूठ नहीं बोल सकते बल्कि न्यायाधीश के सामने ये सिद्ध करने की कोशिश करेंगे कि सबूत पर्याप्त नहीं हैं. "
पूरा साक्षात्कार यहाँ है: http://www.bbc.co.uk/hindi/regionalnews/story/2007/04/070411_ekmulakat_ramjethmalani.shtml
ज़रा देखिये तो भारत के इस वरिष्ठतम और प्रतिष्ठित वकील की मासूम मजबूरी ... च, च, च!
गलती मेरी है, ज्ञानजी की नहीं।
उसे यहाँ फ़िर लिख रहा हूँ।
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अब्बास काज़्मी से यह दो सवाल पूछना चाहता हूँ:
१)आपका फ़ीस कसाब तो नहीं दे पाएगा? तो फ़िर कौन दे रहा है? किस देश से? क्या रकम है?
२)क्या भविष्य में आप किसी गैर मुसलमान नक्सलवादी का भी केस इसी dedication और committment के साथ लडेंगे?
राम जेठमालानी को चाहिए के वे यह कोशिश में रहे कि अपने मुवक्किल को को कम से कम सज़ा मिले। सबूत की कमी का फ़ायदा उठाना वैध हो सकता है लेकिन नैतिक तो बिल्कुल नहीं।
एक और बात।
कसाब का हमला को हम अपराध मानकर अदालत में क्यों निपटा रहे हैं?
यह तो जंग थी।
जंग में अदालत कहाँ से आ टपकी?
कसाब को दुशमन समझ कर कार्रवाई करनी चाहिए।
क्या सीमा पर पकड़े जाने वाले पाकिस्तानी सैनिकों को हम अदालत में ले जाते हैं?
क्या उनके लिए सरकार वकील ढूँढती है?
-Zakir Ali ‘Rajnish’
{ Secretary-TSALIIM & SBAI }
लोग अपने निजी सरोकार से ऊपर नहीं उठते है...उनके लिए कोई भी मुद्दे तभी महत्वपूर्ण होते है जब तक उनका उनका वास्ता उन मुद्दों से जुदा रहता है....किसी ने कहा है गांधी जी ने वकालत में नैतिकता के लिए केस छोडा था...हो सकता है पर नैतिकता के कई पैमाने है .एक पैमाने पर आप खरा सोना है पर दुसरे पे.....फर्ज कीजिये एक वैजानिक है देश को महत्वपूर्ण आविष्कार दे रहा है पर अपनी पत्नी को मारता पीटता है .नेगलेक्ट करता है ....तो उस पैमाने पे क्या कहेंगे ?समय सबकी अलग अलग सूरत दिखाता है ......
कुछ पेशो में जमीर से जद्दो जेहद ज्यादा है ... वकालत के पेशे में शायद सबसे ज्यादा ....कौन कहाँ कितना अपने जमीर को खींचता है यही अब महत्वपूर्ण है .मैंने मन्नू भंडारी का एक वक्तव्य पढ़ा था ....
"आप अपने सीमित दायरे में रहकर भी अगर अपना काम इमानदारी से करेगे तो सच मानिये इस देश ओर समाज को कुछ दे जायेगे ....."
दूसरा गुरुमंत्र हमारा एक सीनियर दिया करता था ".आजकल के जमाने में नोर्मल होना ही असधारहण होना है "
कभी मौका मिले तो " we the people " पढिये
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