Monday, July 6, 2009

अवसादहारिणी गंगा



Ganga Bath
Ganga Camel
Ganga Flow
Ganga Buffelos
गंगा किनारे जाना अवसाद शमन करता है। उत्फुल्लता लाता है। 

उस दिन मेरे रिश्ते में एक सज्जन श्री प्रवीणचन्द्र दुबे [1] मेरी मेरे घर आये थे और इस जगह पर एक मकान खरीद लेने की इच्छा व्यक्त कर रहे थे। मैं घर पर नहीं था, अत: उनसे मुलाकात नहीं हुई।

टूटी सड़क, ओवरफ्लो करती नालियां और सूअरों से समृद्ध इस जगह में वह क्यों बसना चाहते हैं तो मेरी पत्नीजी ने बताया कि “वह भी तुम्हारी तरह थोड़ा क्रैंकी हैं। पैसा कौड़ी की बजाय गंगा का सामीप्य चाहते हैं”।

अब देखें, पत्नीजी भी हमारी क्रैंकियत को अहमियत नहीं देतीं, तो और लोग क्या देंगे! श्री प्रवीणचन्द्र दुबे की पत्नी से नहीं पता किया – शायद वहां भी यही हाल हो! smile_regular

खैर, शायद यह “बैक ऑफ द माइण्ड” रहा हो - कल सवेरे सवेरे गंगा किनारे चला गया। पांव में हवाई चप्पल डाल रखी थी। गनीमत है कि हल्की बारिश हो चुकी थी, अन्यथा रेती में चलने में कष्ट होता। भिनसारे का अलसाया सूरज बादलों से चुहुल करता हुआ सामने था। कछार में लौकी-नेनुआ-कोंहड़ा के खेत अब खत्म हो चुके थे, लिहाजा गंगामाई की जलधारा दूर से भी नजर आ रही थी। 

गंगा स्नान को आते जाते लोग थे। और मिले दो-चार कुकुर, भैंसें और एक उष्ट्रराज। उष्ट्रराज गंगा किनारे जाने कैसे पंहुच गये। मजे में चर रहे थे – कोई मालिक भी पास नहीं था।

गंगा किनारे इस घाट का पण्डा स्नान कर चुका था। वापस लौट कर चन्दन आदि से अपना मेक-अप कर तख्ते पर बैठने वाला था। एक सज्जन, जो नहा रहे थे, किसी जंगली वेराइटी के कुकुरों का बखान कर रहे है - “अरे ओन्हने जबर जंगली कुकुर होथीं। ओनही के साहेब लोग गरे में पट्टा बांधि क घुमावथीं” (अरे वे जबर जंगली कुत्ते होते हैं। साहेब लोग उन्ही को पालते हैं और गले में पट्टा बांध कर घुमाते हैं)। शरीर के मूल भाग को स्नानोपरान्त गमछा से रगड़ते हुये जो वे श्वान पुराण का प्रवचन कर रहे थे, उसे सुन मेरा अवसाद बेबिन्द (पगहा तुड़ा कर, बगटुट) भागा!   

गंगामाई में थोड़ा और जल आ गया है और थोड़ा बहाव बन गया है। अच्छा लगा। मैं तो ग्रीष्मकाल की मृतप्राय गंगा की छवि मन में ले कर गया था; पर वे जीवन्त, अवसादहारिणी और जीवनदायिनी दिखीं।

जय गंगामाई!   


[1] मुझे बताया गया; श्री प्रवीण चन्द्र दुबे रीवां में चीफ कंजर्वेटर ऑफ फॉरेस्ट हैं। मैं उनसे आमने सामने मिला नहीं हूं (अन्यथा यहां उनका चित्र होता जरूर)। वे अब इन्दौर जायेंगे स्थानान्तरण पर। उनके प्रभाव क्षेत्र में इदौर-झाबुआ-धार के जंगल रहेंगे। और मैं वह मालव क्षेत्र एक बार पुन: देखना चाहूंगा!

प्रवीण, जैसा मुझे बताया गया, एस्ट्रॉलॉजी में गहरी दखल रखते हैं। किसी को प्रभावित करने का ज्योतिष से कोई बढ़िया तरीका नहीं! 


31 Comments so far:

हिमांशु । Himanshu said...

गंगा जी के प्रति आपका आत्मीय भाव बार-बार आपको तट की ओर ले जाता है । गंगा माई को गाहे बगाहे आप ही तो याद करते हैं यहाँ ।

सवेरे-सवेरे गंगा स्मरण । आभार ।

सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी said...

गंगे तव दर्शनार्थ मुक्तिः।

इलाहाबाद में रहने का यह लाभ तो है ही कि जब चाहें मुक्तिदायिनी भागीरथी का दर्शन कर लें। पतित पावनी गंगा का सानिध्य निश्चित ही सुखकर है।

जय गंगे।

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

भारतीय संस्कृति (और वाराणसी) के मूल में आनंद (परमानंद) ही है. जहां मरण भी एक उत्सव हो वहां सब कुछ अवसादहारी ही होना चाहिए. हमारे एक (गौर) अमेरिकी मित्र जब बहुत खुश होते हैं तो "गंगम्मा, माँ गंगे" का उच्चार करते हैं जो उन्होंने भारत के बारे में किसी वृत्तचित्र में सुना था.

dhiru singh {धीरू सिंह} said...

गंगा मैया की जे . सच है जब मन संतुष्ट नहीं होता तब हरिद्वार या प्रयाग जाने का मन करता है

विवेक सिंह said...

अवसाद को अपने पास पगहे से बाँधकर तो मत रखिए कि उसकी जाने की इच्छा हो तो भी न जा सके !

अब समझ में आया महाभारत में भीष्म पितामह क्यों बार बार गंगा किनारे पहुँच जाते थे !

जय गंगे !

अशोक पाण्डेय said...

पतित पावनी गंगा अवसादहारिणी तो है हीं। हमारे यहां से वाराणसी नजदीक है। जब भी गंगा मैया के घाट पर जाने का सुअवसर मिलता है, हटने का जी नहीं करता।

Arvind Mishra said...

आदरणीया रीता पाण्डेय जी से अनुरोध है की जब भी कभी कभार आप गंगारोहण को निकलें वे भी साथ हो लें -यह वैराग्य के अर्ली सिम्टम लग रहे हैं -कहीं ऐसा न हो की एक दिन कहीं उधर फाफामऊ से उतर ज्ञान जी एवेरेसटाभिमुख न हो जाएँ !
मुझे तो बनारस के घाटों तक ही जाने की जबर्दस्त मनाही है -अब इधर समीर जी की हुक्म पर एक अनुष्ठान के लिए सुबह गंगा स्नान के लिए क्या जा रहा हूँ कुहराम मचा हुआ है ! (संदर्भ साईंस ब्लॉगर असोसियेशन नवीनतम पोस्ट )

डॉ. मनोज मिश्र said...

इलाहाबाद में तो जगह -जगह प्रोफ.दीनानाथ शुक्ल का लिखा हुआ यह नारा दीखता है कि -

गंगा नदी नहीं है
गंगा नहीं हैं पानी ,
गंगा हमारी माँ है
गंगा है जिंदगानी |

ताऊ रामपुरिया said...

अच्छा लगा यह जानकर कि मां गंगा मे अब जीवन प्रवाह (पानी) बढना शुरु होगया है.

आपका और दुबेजी का मालवा धरा पर स्वागत है, कभी भी पधारिये, आपका घर है. शुभकामनाएं.

रामराम.

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

अवसादहारिणी लोगों का अवसाद हर हर कर अब अवसादधारिणी हो चुकी है, उस अवसाद की सांद्रता को वर्षा का जल ही कुछ कम कर पाता है।

बालसुब्रमण्यम said...

बड़ी नदियां मनुष्यों को हमेशा ही आकर्षित करती रही हैं।

प्रवीण पाण्डेय said...

बहता जल मन के अन्दर जीवन्तता उत्पन्न करता है । यदि बहाव गंगा का हो तो पवित्रता और ऐतहासिक तथ्य भी मनस पटल पर उभर आते हैं । भूपेन हजारिका का ’गंगा बहती हो क्यों’ आज भी सुनता हूँ तो शरीर और मन में रोमांच आ जाता है । यही हमारी श्रद्धा का उत्कर्ष है ।

Udan Tashtari said...

भिनसारे का अलसाया
सूरज बादलों से चुहुल करता हुआ
सामने था।
कछार में लौकी-नेनुआ-कोंहड़ा के खेत
अब खत्म हो चुके थे...

और मैं

मैं क्रेंकी!!!


--यह तो काव्य है..कैसे क्रेंकी कवित्त रच गया..हद है!!

Anil Pusadkar said...

हर हर गंगे।ले देकर दो बार ही दर्शन कर पाया हूं गंगा मैया के दोनो ही बार पंडो ने दिमाग खराब कर दिया था।बाल मूंछ और दाढी,तब दढियल हुआ करता था मै,दिखा-दिखा कए सफ़ाई देते-देते थक गया कि मेरे घर मे सब ठीक है भैया,मेरा पिछा छोड़।वैसे गंगा मैया के दर्शन की और इच्छा है।

sanjay vyas said...

गंगा का आरंभ से अंत तक प्रवाह चंचलता से लेकर स्थैर्य औए गंभीरता को समेटे है....
आपका गागा तट का चिंतन भी अवसाद हरने वाला है.

Parul said...

pehla chitr sundar hai..baaki sameer ji se ittefaq mujhey bhi :)poori kavita ban sakti hai

काजल कुमार Kajal Kumar said...

नदी किनारे वास्तव में ही अच्छा लगता है.

cmpershad said...

"प्रवीण, जैसा मुझे बताया गया, एस्ट्रॉलॉजी में गहरी दखल रखते हैं। "
जब प्रवीण जी आए तो बता देना, हम गंगा में हाथ धो कर आएंगे ताकि वे हाथ धोकर पढे़:)

महामंत्री - तस्लीम said...

ये लीजिए, अरविंद जी अपना अवसाद मिटाने के लिए यहां चले आए।
-Zakir Ali ‘Rajnish’
{ Secretary-TSALIIM & SBAI }

ALOK PURANIK said...

मेरी भी जीवन की तमाम अभिलाषाओं में से एक यह है कि गंगा किनारे एक आश्रम टाइप कुछ हो, उसमें ब्लागिंग हो, ध्यान हो, मस्ती हो।
गंगा का दर्शन भर टेंशन फ्री करता है.
आप सच्ची में सौभाग्यशाली हैं कि गंगा के करीब हैं।

नीरज गोस्वामी said...

मेरे मन में गंगा की छवि देव प्रयाग से हरिद्वार वाली ही है...उसके आगे की गंगा को गंगा कहना अखरता है...पता नहीं क्यूँ...इलाहबाद कभी गया नहीं लेकिन इतना जानता हूँ जिसने गंगा को हरिद्वार या उस से पहले देखा है उसे निराशा ही होगी...
नीरज

डॉ .अनुराग said...

गंगा तेरा पानी अमृत जैसा गीत अब नहीं गा सकते ...गंगा का दोहन तो हमने कर ही दिया है ..कुछ फोटू बाकी असल कहानी कह रहे है

जितेन्द़ भगत said...

मनमोहक चि‍त्रांकन।

अभिषेक ओझा said...

कल कल करती गंगा तो अब शायद ऋषिकेश और हरिद्वार तक ही सिमट गयीं हैं. पर गंगा मैया तो गंगा मैया हैं.

Amit said...

गंगा किनारे जाना अवसाद शमन करता है। उत्फुल्लता लाता है।
यह मैंने गंगा किनारे ही नहीं वरन्‌ अन्य नदियों के किनारे भी महसूस किया है। बहते पानी को देख मन में एक अलग ही शांति का आभास होता है, मन हल्का सा हो जाता है - like a person lays down his burdens - जैसे व्यक्ति अपने हर प्रकार के बोझ से हल्का हो गया हो। :)

venus kesari said...

गंगा वर्णन ही गंगा स्नान है
मन चंगा तो कठौती में गंगा

जे गंगे

वीनस केसरी

creativekona said...

आदरणीय पांडेय जी ,
मैं तो बरसों से गंगा मैया से दूर गोमती किनारे पडा हूँ ...आपका लेख पढ़ कर अपने उन दिनों की यIद् करने लगा जब ममफोर्ड गंज से पैदल रसूलाबाद नहाने जाता था .बहुत खुशनसीब हैं आप जो गंगा माता के दर्शन रोज करते हैं .शुभकामनाएं .
हेमंत कुमार

संजय बेंगाणी said...

गंगा के प्रति अपार श्रद्धा देख बहुत बार लगता है, गंगा में डुबकी लगानी है, देखें कब यह होता है.

anil said...

जे गंगा मैया की | वाकई में गंगा किनारे मन को अजीब सी शांति मिलती है .

kmmishra said...

ज्ञान काका वो उष्ट्रराज हमारे पड़ोस के यादवजी के यहां गुलामी करते हैं । कभी वो बेचारा मिट्टी, बालू ढोता है तो कभी कछार से साग-तरकारी । सवेरे सवेरे चला गया होगा वो भी मां गंगा से अपनी मुक्ति की गुहार लगाने ।

हम तो अपनी छत से ही रोज सवेरे मां गंगा के दर्शन कर लेते हैं । कहते हैं न गंगा दर्शन से भी नहाने का पुण्य मिल जाता है । गंगे तव दर्शनार्थ मुक्तिः।

रंजना said...

माता गंगा का सामीप्य इतना अद्भुद आनंददायी हुआ करता है की मानना ही पड़ता है की इसमें ऐसा कुछ विशेष अवश्य है जिसे मन तो जान ही लेता है भले मस्तिष्क देख गुण पाए या नहीं....