Thursday, July 16, 2009

कतरासगढ़


यह जानने के बाद कि कतरासगढ़ क्षेत्र की कोयला खदानों से साइकल पर चोरी करने वाले कोयला ले का बोकारो तक चलते हैं, मेरा मन कतरासगढ़ देखने को था। और वह अवसर मिल गया। मैं कतरासगढ़ रेलवे स्टेशन पर पंहुचा तो छोटी सी स्टेशन बिल्डिंग मेरे सामने थी। यह आभास नहीं हो सकता था कि यह स्टेशन दिन के पांच-सात रेक कोयले के लदान कर देश के विभिन्न बिजली संयंत्रों को भेजता होगा। एक रेक में उनसठ बॉक्स-वैगन होते हैं और एक वैगन में लगभग ६२ टन कोयला लदान होता है।Katrasgarh

पर माल लदान के लिये महत्वपूर्ण स्टेशन ऐसे ही होते हैं। कोई टीमटाम नहीं। वे केवल अच्छी कार्यकुशलता से काम करते हैं और उनके कर्मचारी अत्यन्त समर्पित/दक्ष होते हैं।

कतरासगढ़ ८-९ कोयला लदान की साइडिंग को डील करता है। हर साइडिंग औसत आधा-एक रेक रोज लदान करती है। मैं बरोरा स्थित जो साइडिंग देखने गया, वह तीन रेक प्रतिदिन लदान करती है। पिछले वर्ष वहां लगभग ८५० रेक लदान हुआ।Water Tanker

उस साइडिंग में मैं इस्तेमाल किये जाने वाले उपकरण – डम्पर, क्रशर और पे-लोडर्स देखे। डम्पर खदान से कोयला ला कर साइडिंग के सामने डम्प करते हैं। क्रशर उस ढेरी को समतल करता है और बड़े टुकडों को छोटा करता है। पे-लोडर्स उस ढेरी से कोयला उठा कर वैगनों में लदान करते हैं। इस प्रक्रिया में जलते कोयले को ठण्डा करने और आग सुलगने की सम्भावनायें रोकने को कोयले पर वाटर-टैंकर से पानी की धार दो बार छोड़ी जाती है। एक बार खदान में डम्पर में कोयला डालते समय और दूसरी बार साइडिंग में कोयला बिछाने से पहले।

Hundai Dumperएक रेक पर पांच-छ पे-लोडर्स एक साथ काम करते हैं।  एक बारी में एक पे-लोडर ३ टन कोयला वैगन में डालता है। एक रेक पांच घण्टे में लोड हो जाता है।

मैने हुन्दै का एक नया पे-लोडर देखा जिसमें चालक का चेम्बर वातानुकूलित है और जो एक बार में छ टन कोयला उठा कर वैगन में डालता है। इसे देख एकबारगी मन हुआ कि पे-लोडर का चालक बना जाये!

ओह, इससे पहले कि मैं रेलवे के विषय में बहुत कुछ लिख डालूं, मैं अपने पर लगाम लगाता हूं। आप लिखने लगें तो समझ नहीं आता कि कहां रुकें। और कुछ झमेला वाला नहीं लिखा जाना चाहिये!


40 comments:

  1. काफी सूक्ष्म जानकारी दी. आभार इस प्रोसेस ज्ञान का.

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  2. कतरासगढ़ भी आ जुड़ा संस्मरणों में !

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  3. अच्छी जानकारी दी आपने

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  4. विडम्बना!
    जानकारी बढ़िया रही।

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  5. अच्छा किया आपने लगाम लगा ली ,

    ज्यादा हो जाता :)

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  6. ...............इसे देख एकबारगी मन हुआ कि पे-लोडर का चालक बना जाये!
    वातानुकूलित चैंबर देखकर या ६ टन का लोड देखकर,:)
    और वहा रहते फेफडे में जो कोयले की धूल घुष जायेगी, उसका क्या?

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  7. @ विवेक सिंह - मुझे मालुम है कि जिज्ञासा का निवास कतरासगढ़ में नहीं, कतरीना जी में है। पर कतरीना जी के बारे में मुझे ज्यादा मालुम नहीं! :)

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  8. रेल में सफ़र तो खूब किया है ...मगर यह जानकारी नयी है !! आभार !!

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  9. हमारा भी सामान्य ज्ञान बढ़ा!! आभार.

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  10. बड़ा दुःख हुआ ..की कतरासगढ़ में कटरीना से रीलेटेड कुछ नहीं मिला...वैसे ऊ ऐसी वाला लोडार्वा ठीक लगा ...

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  11. वाह ए सी लोडर.. तकनीक धीरे धीरे आ रही है

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  12. अच्‍छी जानकारी

    महत्वपूर्ण स्टेशन ऐसे ही होते हैं। कोई टीमटाम नहीं। वे केवल अच्छी कार्यकुशलता से काम करते हैं और उनके कर्मचारी अत्यन्त समर्पित/दक्ष होते हैं

    प्रोफेशनल्‍स इंडियन स्‍टाइल में। संतुष्‍ट और अच्‍छे कामगार। :)

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  13. कोटा को अच्छी किस्म का बहुत कोयला चाहिए अपने थर्मल की सात इकाइयों के लिए। कहते हैं आज कल बहुत घटिया आ रहा है जिस से बिजलीघर जल्दी खराब हो जाएगा।
    और कोयला बीत गया तब इन थर्मलों का क्या करेंगे।

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  14. आप मेरे शहर के इतने पास से गुजरे जान कर खुसी हुई ..यह समस्या (साइकल वाले कोयला चोरो की )सिर्फ कतरास की नही है. धनबाद में भी यहाँ से कोलकाता जाने वाली गाड़ियों जैसे ब्लेक डायमंड और कोल फिल्ड में यात्रियों की जगह कोयले भरे जाने हैं बड़ी कोफ्त होती है ..पर कोई कुछ नही कर सकता क्योंकि रेल पुलिस पैसे लेती है इस गैर कानूनी काम के.

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  15. आदरणीय ज्ञानदत्त जी,

    ब्लॉग पोस्ट से गुजरते हुये कतरसगढ़ और आस-पास जीवन-यापन और जीवन शैली के बारे में विस्तार से जानकारी मिली।

    प्रोफेशनल की पेशागत सीमाओं के बीच की घुटन को महसूस करना; शायद ऐसा है कि बिना मरे स्वर्ग नही दिखता है, और दूसरा कोई महसूस नही कर सकता।

    १५-मई-२००९ की पोस्ट को लिंक कर जानकारी को कतरसगढ़ से और आगे ले जाती है कोयले की तरह। आज कोयले के जीवन पर असर को मह्सूस किया वरन अपनी समझ या तो विज्ञान में पढी कोयले की उत्पत्ति या फिर फिल्मकार श्री यश चौपड़ा साहब / श्री राकेश रोशन साहब की दया से जो भी सीख पाया था उतनी ही थी।

    सबसे अहम श्री डॉ. मनोज मिश्र जी आभार कि चच्चा बनारसी के बारे में खोज और उस दौर के चिंतन / साहित्य से रूह-ब-रूह होना लुभा गया।


    सादर,


    मुकेश कुमार तिवारी

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  16. @ ज्ञान जी,

    जिज्ञासा का निवास कतरीना जी में है तो बोलते काहे नहीं हैं हम यथासंभव जिज्ञासा शान्त करने का प्रयत्न करने की कोशिश करने का प्रयास करेंगे .

    वैसे कहना पड़ेगा कि यह जिज्ञासा मौजूँ है क्योंकि आज कतरीना जी का हैप्पी बड्डे जो है .आप बचपन से ही होनहार थीं और आपका जन्म १६ जुलाई, १९८४ को हुआ .

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  17. नेट का नियम है आप जिस क्षेत्र के हैं उसका ज्ञान दुसरों को बाँटते चलो....


    झमेला वाला नहीं लिखा जाना चाहिये!....सावधानी में बूराई नहीं है :)

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  18. कतरासगढ़ में चुपके से काम होता है तो चर्चा नहीं होता और कतरीना दांत भी दिखा दे तो हो जाती है बदनाम:)

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  19. कोयला लदान संबंधी रेल्वे की प्रणालीके बारे मे जानकर अच्छा लगा. यह भी इतना साधारण नही है जितना अमूमन हम लोग समझते थे. अब शायद आधुनिकिकरण हो गया है.

    रामराम.

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  20. acha to ye hai....gudri ka lal station. rochak jankari..

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  21. वाह, बढ़िया जानकारी, इसके लिए आभार। :)

    तो फिर आपका वातानूकूलित पे-लोडर में बैठना हुआ कि नहीं? :) वहाँ गर्मी तो होती होगी, तो चालक कक्ष वातानूकूलित होने के कारण चालक काम करने को और अधिक तत्पर रहेंगे! :)

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  22. काफी रोचक व उम्दा जानकारी आभार !

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  23. @ अमित जी - मैने तो अपनी वातानुकूलित कार से ही फोटो लिया। पर साथ में जो भारत कोकिंग कोल लिमिटेड के अधिकारी थे, उन्होने बताया कि इस पे-लोडर पर सीनियर-मोस्ट चालक को ही मौका मिल रहा है! होड़ लगती है चलाने के लिये!

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  24. ज्ञान जी, अब यह तो होता ही है कि पहले किसको मौका दें, तो अमूमन सबसे वरिष्ठ और अनुभवी का ही मौका लगता है, अन्यथा लॉटरी निकालनी पड़ेगी। पर आशा है कि ऐसे पे-लोडरों की संख्या बढ़ने के साथ-२ सभी को मौका मिलेगा। :)

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  25. घणी ज्ञानदायक पोस्ट है जी।

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  26. हमें तो बड़ी दिलचस्प लगी ये पोस्ट.ठेठ ब्लोगिंग के दरअसल यही नियम है .....बहुत सारी चीजो को अपनी आँखों से देखना ..जो महसूस किया .लिखना....इससे ज्ञान की एक खिड़की भी खुलती है

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  27. कतरासगढ़ और पे लोडर के बारे में जानकारी के लिए आपको धन्यवाद. पे लोडर अपने चलाया की नहीं यह नहीं बताया परन्तु मुझे लगता है की आपने टेस्ट ड्राइव जरुर की होगी हा हा ..

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  28. आप ने अच्छी जानकारी दी, घर बेठे ही पता चल गया इस हुन्दै जी का भी.
    धन्यवाद

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  29. क्या कतरास गढ़ में भी कोयला माफिया दिखे आपको . कहते है हर रेक से एक लाख तक कमाते है यह माफिया

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  30. कुछ झमेला वाला नहीं लिखा जाना चाहिये!,
    सही कह रहें हैं सच बहुत कड़वा होता है.

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  31. आप की वजह से रेलवे की कार्य प्रणाली के बारे में काफ़ी जानकारी हासिल हुई है और अब उसकी खामियों के बदले हमने उसकी खूबियां देखनी शुरु कर दी हैं , आज की भी पोस्ट हमारे लिए बहुत सारी नयी जानकारी ले कर आयी , धन्यवाद

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  32. देश की अर्थव्यवस्था में रेल का बड़ा भारी योगदान है । ये पोस्ट कर्मठ भारतीय रेल की एक छोटी सी झांकी है ।

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  33. इतने से काम नहीं चलेगा. कतरासगढ़ के बारे में पूरी जानकारी दें और वह भी यात्रा वृत्तांत शैली में.

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  34. जलते कोयले को ठण्डा करने और आग सुलगने की सम्भावनायें रोकने को कोयले पर वाटर-टैंकर से पानी की धार दो बार छोड़ी जाती है।
    ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
    कतरासगढ भी यहीँ से देख लिया ये ब्लोगीँग की बलिहारी है जी !
    कोयले मेँ आग लग ना जाये उसकी सावधानी के लिये पानी छिडका जाता होगा क्यूँ ?
    - लावण्या

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  35. @ ज्ञान जी,

    जिज्ञासा का निवास कतरीना जी में है तो बोलते काहे नहीं हैं हम यथासंभव जिज्ञासा शान्त करने का प्रयत्न करने की कोशिश करने का प्रयास करेंगे .

    वैसे कहना पड़ेगा कि यह जिज्ञासा मौजूँ है क्योंकि आज कतरीना जी का हैप्पी बड्डे जो है .आप बचपन से ही होनहार थीं और आपका जन्म १६ जुलाई, १९८४ को हुआ .

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  36. आदरणीय ज्ञानदत्त जी,

    ब्लॉग पोस्ट से गुजरते हुये कतरसगढ़ और आस-पास जीवन-यापन और जीवन शैली के बारे में विस्तार से जानकारी मिली।

    प्रोफेशनल की पेशागत सीमाओं के बीच की घुटन को महसूस करना; शायद ऐसा है कि बिना मरे स्वर्ग नही दिखता है, और दूसरा कोई महसूस नही कर सकता।

    १५-मई-२००९ की पोस्ट को लिंक कर जानकारी को कतरसगढ़ से और आगे ले जाती है कोयले की तरह। आज कोयले के जीवन पर असर को मह्सूस किया वरन अपनी समझ या तो विज्ञान में पढी कोयले की उत्पत्ति या फिर फिल्मकार श्री यश चौपड़ा साहब / श्री राकेश रोशन साहब की दया से जो भी सीख पाया था उतनी ही थी।

    सबसे अहम श्री डॉ. मनोज मिश्र जी आभार कि चच्चा बनारसी के बारे में खोज और उस दौर के चिंतन / साहित्य से रूह-ब-रूह होना लुभा गया।


    सादर,


    मुकेश कुमार तिवारी

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  37. अच्‍छी जानकारी

    महत्वपूर्ण स्टेशन ऐसे ही होते हैं। कोई टीमटाम नहीं। वे केवल अच्छी कार्यकुशलता से काम करते हैं और उनके कर्मचारी अत्यन्त समर्पित/दक्ष होते हैं

    प्रोफेशनल्‍स इंडियन स्‍टाइल में। संतुष्‍ट और अच्‍छे कामगार। :)

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  38. अच्छा किया आपने लगाम लगा ली ,

    ज्यादा हो जाता :)

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  39. KATRAS KA AP KO KUCH ACHHA NAHI LAGA KA , JAKAR LILORI MATA KA DARSHAN KARE , SARA JIGASA PURN HO JAYGA. SHYAM SINGH

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--- सादर, ज्ञानदत्त पाण्डेय