Monday, July 13, 2009

घुन्नन


@gyandutt I'm reading: घुन्ननTweet this (ट्वीट करें)!


उस दिन दफ्तर में व्यस्त था। सवेरे का समय। सोमवार। कई फोन और कई मसले। इग्यारह बजे का टार्गेट। इस बीच अधेड़ उम्र का एक अर्ध शहरी व्यक्ति मेरे कमरे में आया। मेरा चपरासी शरीफ छाप है – किसी बाहरी को रोक नहीं पाता।

वह व्यक्ति खड़े खड़े बोला – “पहिचान्यै हमें?”
My Villageside Fields पिछले हफ्ते मेरे गांव के पास के स्टेशन से गुजर रही थी मेरी ट्रेन। मैं देख रहा था कि एक सप्ताह से ज्यादा गुजर गया है जुलाई का। बारिश नहीं हुई। खेतों में फसल दिख ही नहीं रही। क्या सूखा पड़ेगा? मेरे गांव में कैसी बेचैनी होगी इसे ले कर?

मेरे असमंजस को देख खुद ही बोला – “घुन्नन”!

यह ऐसा नाम है जो मुझे तुरन्त बचपन में ले गया। गांव मे स्कूल जाते समय घुन्नन का साथ रहता था। मुझसे एक दर्जा आगे रहा होगा वह। अब जोर देने पर भी तस्वीर नहीं आती दिमाग में। पर नाम ऐसा है जो तुरन्त क्लिक करता है।

हमारे घर के पास उसका घर था। उसके पिताजी थे लुद्धुर। मुझे उनका वास्तविक नाम नहीं याद। घुन्नन का वास्तविक नाम भी नहीं याद। ब्राह्मणों का गांव है तो कोई पांड़े/सुकुल/मिसिर ही होंगे।

कुर्सी में फोन के साथ धंसा न होता तो उठकर “बीयर हग” में लेता बचपन के सखा को। पर मैं उठ न पाया। घुन्नन अपने रिजर्वेशन की डीटेल्स मेरे सहायक को दे कर चला गया। शायद वह जल्दी में था। कोई सम्पर्क नम्बर भी नहीं है मेरे पास कि बात कर सकूं। काम से निपट कर मैने केवल यह किया कि सहेज कर उसके रिजर्वेशन के लिये सम्बन्धित अधिकारी से स्वयं बात की।

पास में ही मेरा गांव है – चालीस किलोमीटर दूर। वहां जाता नहीं – घर का कोई रहता नहीं। घर भी जीर्णावस्था में है। घुन्नन से मिलना होगा, कह नहीं सकता।

Bonsai1 चार, साढ़े चार दशक और हम अजनबीयत के कगार पर पंहुच गये हैं। मैं अपने बचपन के सहपाठियों को न पहचान पाऊंगा। अपने खेत चीन्हना भी कठिन होगा। अपनी बारी (बगीचे) के आम के वृक्षों के नाम और स्वाद भी री-कैप करने में जद्दोजहद करनी पड़ेगी। महुआ के पेंड़ तो याद भी नहीं किस ओर हैं। 

वापस लौटना, अपने गांव-खेत पर लौटना, अपनी जड़ों पर लौटना क्या हो पायेगा?! बौने बोंसाई की तरह जीने को अभिशप्त हो गये हैं हम!

हां, घुन्नन तुम्हें तुम्हारे नाम से चीन्हता हूं।


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प्रतिक्रियायें :
 

33 महत्वपूर्ण टिप्पणियां:

विवेक सिंह said...

हमारा आग्रह है कि घुन्नन जी से मिलें जरूर ,

हो सके तो अपने गाँव भी हो आयें . जाकर तो देखिए .
( पोस्ट पढ़कर अनायास ही प्रेमचन्द की कहानी 'गुल्ली-डण्डा' की याद आ जाती है )

Neeraj Rohilla said...

वाह,
मन खुश हो गया,
एक दिन हम भी बैठे पुराने स्कूल के साथियों को याद कर रहे थे, कुछ याद रहे कुछ भूल गए| काश हमारे स्कूलों में भी अमरीका की तरह १०/२०/३०/४० वार्षिक (पहले साली लिखने वाले थे) री-यूनियन होती| लेकिन कहाँ जा पाते, जब न अपने बी टेक की डिग्री समारोह में जा सके न एम्. ई. वाली में|
नाम भी केवल वही दिमाग में आते हैं जिनके साथ किस्से जुड़े हुए हैं या जिनके विशुद्ध रोचक निक-नेम थे, अनाकोंडा, शेषनाग, मऊ, रोबोट, इत्यादि इत्यादि|
आपका गाँव को ४० किमी पर ही है, कभी भी चले जाइए, बढ़िया यादें जुडेंगी|

Udan Tashtari said...

सभी के घुन्नन गुम हो गये हैं. आप खुशकिस्मत हैं कि कम से कम वो तो जानता है कि आप कहाँ हैं.

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

इत्ती सी जिन्दगी और इत्ते सारे नाम, कैसे याद रखेंगे भला! जभी तो संतजन एक ही नाम की आसान कुंजी बना गए हैं - भज मन राम नाम...इत्यादि.

नितिन | Nitin Vyas said...

सच सबके घुन्नन गुम हो गये हैं, आप भाग्यशाली हैं कि वह तो आपको जानता है!

वाणी गीत said...

गाँव छूट जाता है ...बचपन भी ...मगर यादें कभी नहीं !!

सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी said...

आपने गाँव से जुड़ा रहना इतना आसान नहीं है। बहुत समय, धैर्य और प्रबन्धन कौशल की आवश्यकता है। सबके साथ रुचि का होना भी आवश्यक है। यह सब जुगाड़ हो जाने पर जब गाँव पहुँच जाता हूँ तो बहुत कुछ सहेजने का मन करता है। पर लाख कोशिश के बावजूद सहेज नहीं पाता।

लेकिन अब गाँव भी तेजी से बदल रहे हैं। अब बाग-बग‍इचा कम हो रहे हैं, व्यापार अधिक बढ़ गया है।

बालसुब्रमण्यम said...

बेहतरीन पोस्ट। यह सबकी कहानी है। शहरीकरण का एक यह भी पहलू है।

लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्` said...

उसके पिताजी थे लुद्धुर। और आपके बाल सखा घुन्नन ! इन नामोँ की कथा का रहस्य भी बता देँ ...

- लावण्या

श्यामल सुमन said...

सीमाब अकबराबादी का एक शेर है-

कहानी मेरी रूदादे जहाँ मालूम होती है।
जो भी सुनता है उसीकी दास्तां मालूम होती है।।

सादर
श्यामल सुमन
09955373288
www.manoramsuman.blogspot.com
shyamalsuman@gmail.com

रंजन said...

अच्छा है आपको बाल सखा मिले... हम तो बहुतोंको याद करतें है.. शायद कभी मिले...

संजय बेंगाणी said...

आपको बचपन का कोई मिला तो सही....अब तो कोई मिल भी जाए तो पहचानना मुश्किल हो जाए.


गाँव जाएं मगर उसे वैसा नहीं पाएंगे जैसा यादों में है. निजी अनुभव है भई...

cmpershad said...

"पांड़े/सुकुल/मिसिर ही होंगे। ..." क्या ये सभी घुन्नन है:-)

P.N. Subramanian said...

बेहतरीन पोस्ट. आप तो अपने ही इलाके में हैं. फिर जड़ों की सिंचित करते रहने में क्या दिक्कत है.

डॉ. मनोज मिश्र said...

मुझे खुशी है की आप अभी भी अपनी जडों से जुड़े है वर्ना घुन्नन कभी आप से मिलने न आता .

राज भाटिय़ा said...

बहुत सुंदर यादे, मै अगर जिन्दा रहा तो जरुर लोटूगां अपने देश मै जहां मेने चलना सीखा, बोलना सीखा...धुन्न्न सब पता नही कहां खो गये यह सब,आंखे तो बहुत ढुढती है...

नीरज गोस्वामी said...

पुराने दोस्तों की जगह और कोई नहीं ले सकता...आपने उनसे ढंग से न मिल कर ठीक नहीं किया...
नीरज

सिद्धार्थ जोशी Sidharth Joshi said...

कहना अच्‍छा नहीं लग रहा लेकिन... मित्रता के नाते आपके साथ कुछ शेयर करना चाहता हूं।


फोन के साथ कुर्सी में धंसने की आपकी अदा ने उस निर्मल ग्रामीण को संकेत दिया होगा 'तो.. क्‍या' का। मै खुद भी कई बार ऐसी गलतियां कर चुका हूं। प्रेमचंद की ही एक कहानी है। उसमें बेटे की टीबी की बीमारी का ईलाज कराने की बजाय एक बाप अपने दूसरे बेटे को इंग्‍लैण्‍ड भेजने में पैसा निवेश करता है। बड़े बेटे की मौत के बाद धूम-धाम से उसका क्रियाकर्म किया और ब्राह्मणों को जिमाया।

कुर्सी पर इग्‍नौर करने के बाद आपको अपने व्‍यवहार पर ग्‍लानि हुई और अब तक के सबसे एडवांस माध्‍यम पर आपने अपने मित्र घुन्‍नन को याद कर उसकी पूर्ति करने की कोशिश की। इसे मैं पुराने दिनों की याद नहीं वर्तमान का प्रायश्चित कहूं तो शायद गलत नहीं हो।

कुछ कड़वा कहा है लेकिन उम्‍मीद करता हूं कि आप इसे इस पोस्‍ट के संदर्भ में ही लेंगे।

आपका फैन
सिद्धार्थ जोशी
बीकानेर

कुश said...

बियर हग कर ही लेना था...

काजल कुमार Kajal Kumar said...

आपकी साफगोइ पढ़ कर अच्छा लगा...
आदमी नहीं तो न सही, जड़ें खुद खोद निकालती ही हैं हमें.

ताऊ रामपुरिया said...

हां जिनके भी घर गाम छुट गये उन सभी के घुन्नन लुप्त हो गये हैं. आज तो लगता है आपने हमारे दिल की बात को भी शब्द दे दिये हैं.और भी मेरे जैसे कितने ही होंगे और पोस्ट के अंत का यह वाक्य झकझोर गया : "बौने बोंसाई की तरह जीने को अभिशप्त हो गये हैं हम"

लगता है हम सचमुच ही बौनसाई हो गये हैं.

रामराम.

जितेन्द़ भगत said...

इस बार गॉंवों में सूखे की नौबत बुरी खबर है।
मन में बात आ गई है तो 40 कि‍.मी. की दूरी भी कोई दूरी है।

प्रवीण पाण्डेय said...

मुझे अभी भी अपने हिस्से के ’घुन्नन’ मिल जाते हैं । कुछ ही हैं जिनमें अभी भी बचपन की पुरानी यादें रस घुलकर भरी हुयी हैं, साथ बैठकर सस्वाद हो बाहर आती हैं । कई लोग बहुत ही संकोची होते हैं और आवरण उतारने में बहुत समय लेते हैं । किन्तु एक बार खुलने के बाद पुराने किस्सों का जो दौर चालू होता है तो समाप्त नहीं होता । अविस्मरणीय होता है अपने बचपन का इतिहास ।

नरेश सिह राठौङ said...

जडो से कटने का दर्द यहाँ भी है । लगता है शुऊआत हुई है । समीर जी को तो यह बिमारी बहुत पहले से ही थी ।

रंजना said...

आपकी यह कसक असंख्यों उन हृदयों की कसक है जो रोटी पानी की जुगाड़ में अपनी जमीन से बिछुडे हुए हैं.....

Arvind Mishra said...

हाँ सचमुच बचपन कितना पीछे हो चला है !

dhiru singh {धीरू सिंह} said...

बचपन के ऐसे कई साथी जो सिर्फ नाम से याद रहते है हमेशा

सतीश पंचम said...

चालीस किलोमीटर की दूरी चंद मिनटों में नापी जा सकती है पर शायद आपने ही अपनी ओर से कोई रूचि न ली हो तभी आप वहां एक हद से ज्यादा अपने को नहीं पा रहे हैं।
मुझे तो ये मौका मिले कि पैतृक घऱ से चालीस किलोमीटर दूरी पर काम करूँ तो मैं उस खुशी को लफ्जों में नहीं बयां कर सकता.....शायद लफ्ज रजाई ओढे चुक्की मुक्की हो बैठ जांय :)

गिरीश बिल्लोरे 'मुकुल' said...

सच्ची भौतई उम्दा

Priyankar said...

जूनियर बेसिक पाठशाला,ग्राम पंचायत - ढिकियापुर,जिला इटावा में एक हमाए’उ संगै हते सोबरन (श्योबरन).दुबरे-पतरे एकदम्मै मरियल से . एक दांय उन्नै क्लास के सबसे जबर लड़का के टीन की स्लेट फेंक कै मार दई हती . वाके बाद माथे में गड़ी स्लेट और बहत भए खून कै देख कै जित्ती जोर सै वो जबरा रोओ, वासै जादा जोर सै सोबरन रोए कि अरे जू का हुय गओ .

पच्चीसेक साल पहलै एक दांय कंचौसी गए हते तौ वे बज़ार में टाट बिछाएं सब्जी बेच रए हते . हमैं बिना पैसा लैहैं कोई सब्जी दैबे की चेष्टा’उ करी हती उन्नै . अब पता नइयैं कहां हैं कैसे हैं .

आप तो पुन्न वाले हैं कि गांव नगीचै है और घुन्नन खुदै आय कै दर्शन दै गए . यो कुरसी में धंसबो और फोन में फ़ंसबो’उ बौहत जालिम चीज़ है . पर ईमानदारी को ’रिग्रेट’ सबइ चीजन पै भारी है . ईमानदारी और करुणा मनुष्यता को पहलो और आखरी आसरो है सो बनाऐं रखियो दद्दा.

Amit said...

समीर जी की बात स्टीक है, वाकई।

स्कूल कॉलेज के सहपाठी मित्रों से संपर्क न के ही बराबर है। अभी कुछ दिन पहले फेसबुक पर स्कूल के कुछ सहपाठी मिले तो उनको मित्र के रूप में अपने खाते में जोड़ लिया, मानो जीवन के बीते अध्याय का एक भाग जो किताब से अलग हट गया था पुनः जुड़ गया!

ऊपर नीरज रोहिल्ला की बात सही लगी, हमारे यहाँ स्कूलों में अमेरिकी स्कूलों की भांति रीयूनियन का कन्सेप्ट नहीं है, होना चाहिए, इसी बहाने पुराने सहपाठियों (खासतौर से जिनसे संपर्क नहीं रहा) से मुलाकात हो जाती है!

सागर नाहर said...

इतने बरसों बाद मिले और बस रिजर्वेशन की बातें ही हुई? हम तो समझ रहे थे कि बचपन की शरारतें, गिल्ली डंडा, इमली आदि सब कुछ याद किये होंगे.. खैर शायद कुर्सी ने यह सब नहीं करने दिया हो।
एक बार घुन्नन को घर बुलायें या चालीस किलोमीटर की यात्रा कर ही लें, इसी बहाने एक बार बचपन को जी लेंगे और हमें एक पोस्ट पढ़ने का मसाला।
:)

Reetika said...

jadon ke paas dobara lautna mumkin hai ki nahi, yeh is baat par nirbharkarta hai ki man mein iccha hai ki nahi...?lekin is baat ka yakeen zaroor hai ki agar iccha hai to sab kuch mumkin hai. Aapki post ne mujhe apne us gaaon mein le ja kar dobara khada kar diya, jo ki Allahabad se kuch 1 ghante ki doori par hai "Kala Kaakar, PAriyanvan".. Naani ka ghar hota tha kabhi wahan...kitni hibachpan ki yaadein... kacche aam ki khushboo... ber ke junglelaal amrood ki laali ....aur chane ke ki sondhi mehak mein lipat gayee hoon main !! Shukriya is post ko share karneke liye ...

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