Wednesday, September 9, 2009

गाय


मुझे लगभग हर रेलवे स्टेशन पर गाय दिखीं। वडोदरा, भोपाल, सिहोर, बीना व झाँसी में गऊ माँ के दर्शन करने से मेरी यात्रा सुखद रही। मनुष्यों और गायों के बीच कहीं पर भी अस्तित्व सम्बन्धी कोई भी झगड़ा देखने को नहीं मिला। समरसता व सामन्जस्य हर जगह परिलक्षित थे।
praveen
यह श्री प्रवीण पाण्डेय की अतिथि पोस्ट है। और इसमें आप पायेंगे कि उनकी मानसिक हलचल विराट विविधता लिये होती है।

श्री प्रवीण हाल ही में रेलवे स्टाफ कॉलेज, वडोदरा गये थे। यह वृतान्त सम्भवत वापसी की यात्रा का है।

आप प्रवीण जी का गाय पर लिखा पढ़ें।

मुझे आशा है कि प्रवीण नियमित बुधवासरीय अतिथि पोस्ट देते रहेंगे! 

स्टेशन पर घर से लायी रोटियाँ खाने के बाद बच्चे के हाथ से गाय को खिलाने से खाना व्यर्थ भी नहीं हुआ और लगे हाथों पुण्य भी प्राप्त हो गया। गाय भी लोगों के बैठने में कोई विघ्न न डालते हुये शान्त भाव से धीरे धीरे प्लेटफार्म का पूरा चक्कर लगाती है। इतने धैर्य से स्टेशन के बड़े बाबू भी निरीक्षण नहीं करते होंगे।

कुत्तों की चपलता पर ध्यान न देती हुयी ’एबन्डेन्स थ्योरी’ को मानते हुये हमारी गायें हर स्टेशनों पर अपना जीवन ज्ञापन करती हैं। बड़े अधिकारियों के दौरों के दौरान स्टेशन से अस्थायी निष्कासन को भी बुरा न मानते हुये पुनः सहजता से वापस आ जाती हैं।

कमोबेश यही स्थिति हर नगर की सड़कों की है। बड़े नगरों में ट्रैफिक जैम का प्रमुख कारण गायों का सड़क पर बैठे रहना है। पिछले वर्ष खजुराहो से झाँसी आते समय पानी बरस रहा था और प्रत्येक गाँव के बाहर गायें सैकड़ों की संख्या में झुण्ड बनाकर सड़क पर बैठी हुयी दिखीं थीं।

मुझे श्रीमदभागवतम का दशम स्कन्ध पढ़ने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है जिसमें कृष्ण की लीलाओं का चित्रण है। मथुरा भ्रमण के समय भी कहीं पर किसी गाय ने सड़क पर कृष्ण को ’हैलो कान्हा’ कहकर नहीं बुलाया। (निश्चय ही सड़कों पर गायों का डेरा जमाना कृष्ण के जमाने में नहीं था!)

Cows on Road यह इलाहाबाद की स्टेनली रोड का केण्टोनमेण्ट इलाका है जहां वाहन तेज गति से चलते हैं। गायें सड़क पर स्वच्छंद जुगाली कर रही हैं!

वर्तमान में दूध देने वाले पशुओं की दुर्दशा का मुख्य कारण हमारी आधुनिकता है। सभी अपने घर में बच्चों के लिये गाय का शुद्ध दूध चाहते हैं। दूधवाले पर विश्वास न करने वाले सज्जन चट्टों पर जाकर अपने सामने दूध निकलवाते हैं लेकिन शायद नहीं जानते कि गाय को एक इन्जेक्शन पहले ही दिया जा चुका है। चट्टों की स्थिति का वीभत्स वर्णन कई ब्लागों में आ चुका है।

चारे की कमी के कारण बुन्देलखण्ड क्षेत्र में दूध न देने वाली गायों को व बछड़ों को अपना भोजन तलाशने के लिये खुला छोड़ दिया जाता है। हर जगह कांजी हाउस बन्द हो चुके हैं। पूरी खेती मशीनीकृत होने से बैलों का उपयोग नहीं होता है जिससे पशुओं के लिंग अनुपात में बुरा असर पड़ा है। इस स्थिति में यदि चमड़े का निर्यात बढ़ता है तो कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिये।

दूध महत्वपूर्ण होने पर भी पशुओं की यह स्थिति मार्मिक है और दशा और दिशा निर्धारण के लिये प्रयास की अपेक्षा करती है।


एक बात जो मैं तथाकथित धर्मांध जनता में पाता हूं, वह यह है कि गायें जब दूध देना बंद कर देती हैं तो उन्हे अपने हाल पर छोड़ दिया जाता है। उनका वध धार्मिक कारणों से नहीं किया जाता; पर लगता है कि रात में उन्हे जानबूझ पर रेलवे ट्रैक पर धकेल दिया जाता है। ट्रेन से कट कर उनकी मृत्यु हो जाती है।

उससे ट्रेन परिचालन अवरुद्ध होता है और (यह कयास है, कि) तथाकथित धर्मान्ध मालिक उनके इन्श्योरेंस का पैसा जेब में डाल कर गौ माता की जय बोलता है।

रेलवे में जरूरत है एक ऐसे स्प्रे की जो ट्रेक के आस पास उगने वाली घास को नष्ट कर डाले। उससे गाय/नीलगाय ट्रैक पर नहीं आयेंगे और कटेंगे नहीं। खरपतवार नाशी स्प्रे होंगे जरूर। एक विचार तो यह पन्ना पढ़ने पर आ रहा है -  एयरेटेड शीतल कोला पेय अगर पानी में १:१०० में मिला कर स्प्रे किया जाये तो शायद घास और खरपतवार नष्ट हो जाये।

अपडेट (सवेरे सवा सात बजे): अभी अभी नियंत्रण कक्ष से सवेरे का ट्रेन रनिंग का हाल चाल लेने पर खट्टा हो गया मन। सोनागिर-दतिया के बीच 2716 सचखण्ड एक्स्प्रेस से 28 गायें कट गयीं। सवा घण्टा यातायात अवरुद्ध रहा। पता नहीं वे गायें थीं या नीलगाय का झुण्ड था! जो भी हों, दुखद! अपडेट (सवेरे नौ बजे): ओह, वे 34 हैं। सात के शव ट्रैक पर, शेष छितराये हुये। नीलगायें हैं।   


35 comments:

  1. पशुओं की स्थिति मार्मिक है और दशा और दिशा निर्धारण के लिये प्रयास की अपेक्षा करती है- एक बेहतरीन उद्धहरण के मार्फत कही बात बहुत सटीक है.

    लेखन का प्रवाह और सहजता आकर्षित करती है. यह आयाम प्रशंसनीय है.

    आशा करता हूँ कि प्रवीण जी नियमित बुधवारीय अतिथि पोस्ट देते रहेंगे!

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  2. सुन्दर निबंध है गाय पर। आशा है कि प्रवीणजी नियमित रूप से वुधवार को लिखते रहेंगे।

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  3. चारा भी नेता ही खा जाएंगे तो गऊ माता की ये दशा होनी ही है...

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  4. कचरे के ढेर में मुंह मारती गायों की दुर्दशा देख कर बहुत दुःख होता है..और इस कारण से ही शायद इनके स्वाद में इतना परिवर्तन आ गया है की सब्जियों के छिलके..चपाती..हरे चारे आदि को देख कर मुंह फेर कर चली जाती हैं ... आये दिन झुंड की झुंड गायें रंभाती दरवाजे पर आ खड़ी होती है मगर जब इधर बहुत जरुरत है तो ढूंढे नहीं मिल रही ...और मिल भी जायेंगी तो कोई गारंटी नहीं है कि रोटी खा ही लें ..!!

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  5. प्रवीण जी ने जानवरों की दयनीय स्थिति पर बहुत सुंदर पोस्‍ट लिखा है .. उनकी नियमित बुधवारीय अतिथि पोस्ट का इंतजार रहेगा !!

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  6. समस्या की सहज प्रस्तुति !

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  7. गाय की दुर्दशा का सटीक चित्रण.....दुखद किन्तु सत्य

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  8. यदि गाये दूध न दे रही हो और किन्ही कारणवश कोई व्यक्ति उनका पालन नहीं कर सकता तो ऐसे में उन्हें गौशाला छोडा जा सकता है.. मैंने ऐसे कई केसेस देखे है. जिनमे गायो को गौशाला छोडा गया..
    आज की पोस्ट अच्छी लगी. उम्मीद है प्रवीण जी निरंतर लिखते रहेंगे

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  9. गायों ही नहीं सभी जानवरों के रेल लाइनों पर पहुँचने पर रोक लगाने के लिए प्रयत्न किए जाने चाहिए

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  10. एक तरफ माँ कहते है, दुसरी तरफ उसके हाल पर छोड़ देते हैं, कैसे धार्मिक हैं हम?

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  11. @ संजय बेंगानी जी - कैसे धार्मिक हैं हम? वास्तविक मांओं की दशा भी पता करें तो बड़ी हॉरर स्टोरीज निकलेंगी!
    और धार्मिक ही क्यों, तथाकथित मानवतावादी सेक्यूलर भी अपने वृद्धों का कितना सम्मान करते हैं - देखने की बात होगी! :)

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  12. जजमान लोग दूध निचोड लेने के बाद गायों को प्रायः सड़कों पर छोड़ देते हैं। दिन भर अपना समय बिता कर गायें अपने गंतव्य पर आ जाती हैं। इसीलिए गाय का हर जगह [रेलवे स्टेशन से लेकर पुलिस स्टेशन तक:)] पाई जाती है।

    चूंकि इन गायों पर जजमान को कुछ भी लागत नहीं आती, इसलिए यह कहना शायद उचित न हो कि उन्हें पटरी पर मरने के लिए ठेल दिया जाता है।

    अच्छे लेख के लिए एक और पाण्डेयजी को बधाई।

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  13. अच्छा लगा. नियमित लेखन की अपेक्षा है प्रवीण जी से.

    धार्मिक से ज्यादा धर्मभीरुओं का अनुपात है समाज में. सुविधा देखकर धर्मपथ पर चलते हैं.

    दतिया के पास वाली दुर्घटना का समाचार सुबह समाचार पत्रों में पढ़कर मन दुखी था. इंश्योरेंस वाल एंगल डालकर सोचने से खट्टा भी हो गया.

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  14. गौ माता ही नही भारत माता और धन्नासेठ सुपुत्रों? के होते हुये आश्रमों मे रहने वाली माताओं को देखो तो सबकी हालत एक समान नज़र आती है।एक अच्छी पोस्ट दिल को छू लेने वाली।

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  15. गाय की यह दुर्दशा मुझे तो कहीं रुकती नहीं दिखती। इससे बचने के लिए उसे दुधार बने रहना होगा....

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  16. मन बड़ा भारी हो गया ..........

    आपके सद्प्रयास की ह्रदय से सराहना करती हूँ और ईश्वर से प्रार्थना करती हूँ कि वे मनुष्य को जानवरों के प्रति संवेदनशील बनायें...

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  17. कोक-पेप्सी वाली जानकारी रोचक रही. बाकी पोस्ट तो है ही अच्छी .

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  18. अपडेट्स पढ़कर तो मन अजीब हो गया ।

    रात में उन्हें जानबूझ कर रेलवे ट्रैक पर धकेल दिया जाता है- इस बात ने उद्वेलित किया । इतनी स्वार्थपरक प्रवृत्ति से कैसे भला होगा मानवता का,कैसे संरक्षित होगी नैतिकता, कैसे बचेगी संवेदना ।

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  19. छोटे शहरों में हालत फिर भी काबू में लगते हैं। लेकिन, महानगरों में तो हद है। जानवरों के नाम पर यहाँ कुत्ते कुत्ते ही नज़र आते हैं। पिछले दिनों मम्मी ने कहा कि पंडित ने कहा है गाय को रोटी खिलाया करो। मैंने जवाब दिया कि यहाँ गाय मिलती ही कहाँ है... क

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  20. गाय को रेल्वे स्टेशनो पर, सडक के बिचो बिच बैढे देखना सहज सरल हो गया है। कारण पशु पालन अब महगा हो गया। लोगो द्वारा अपने पशुओ को यूही आवारा छोड देना से प्रतित होता है उससे व्यवसायिक लाभ नगण्य हो गया है। मैने मारवाड जक्शन पर अक्शर रेल्वे पट्री पर इस तरह जानवरो को घुमते देखा है जिससे कई बार चालाक के होर्न बजाने पर भी वो हटते नही है। तब मजबुरन ट्रेन को आधे प्लेट फार्म पर रोकना पडता है। कभी कभी मोत भी हो जाती है। अब पाण्डॅजी इसके लिऍ जिम्मेदार कोन ? पशु ? मानव ?

    छोटे पाण्डेयजी (प्रवीणजी) की हिन्दी बडी ही सरल है पढने मे ज्यादा उर्जा ख्रर्च नही करनी पड्ती। बडे पाण्डेयजी को पढने के लिऍ दो तीन चाय पीनी पडती है। प्रवीणजी आपको आगे भी पढने की चाहत है- आभार

    ♥♥♥♥♥♥
    पाकिस्तानी ब्लोगरिया कहे छु छु कर रिया है ?


    SELECTION & COLLECTION
    हे! प्रभु यह तेरापन्थ

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  21. ऐसा हाल यहाँ भी है, घर के पास ही इलाके की सड़क पर शाम होते ही गायों के झुंड सड़क पर चहलकदमी करते हैं, सड़क पर बैठ भी जाते हैं। अब यह सड़क छोटी है, दोनो ओर के वाहनों के लिए एक-एक लेन तो ऐसे में आने जाने वालों को समस्या होना स्वभाविक है।

    मेरे ख्याल से तो इन पशुओं के मालिकों पर तगड़ा जुर्माना होना चाहिए जो अपनी गाय और बछड़ों को खुला छोड़ देते हैं और जिससे बड़ी सड़क पर कई बार रात को दुर्घटना की संभावनाएँ अत्यधिक बढ़ जाती हैं।

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  22. गाय की हालत को अच्छी तरह बयां किया गया है।

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  23. ३४ नीलगायें कटने की खबर से मन दुखी हो गया !

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  24. One fact:
    Mc'dee was in losses for initial 1-2 years in india,
    Now they r making money like anything. Reason?
    May be this board on counter can explain:"We do't serve BEEF and BEEF related products."

    Want to earn money in india?
    Be indian !!

    Even better....
    Want to survive in india?
    Be indian.

    Darpan Sah
    (A Proud Vegetrain)

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  25. i know my comment 1st time is not related to post by any means , But there there is no rule, even.

    :)

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  26. mann kaafi khinn ho gaya hai poori post padhne ke baad.. :((

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  27. सुन्दर,सारगर्भित लेख......बहुत बहुत बधाई....

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  28. अच्छी प्रस्तुति....बहुत बहुत बधाई...

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  29. आश्चर्य का विषय यह है कि भारत जैसे देश में इतनी पूज्यनीय होने के बावजूद गायों की यह दशा है।
    मेरा एक बार गाय की वजह से एक्सीडेंट भी हो चुका है। यदि हेलमेट न लगा होता, तो राम नाम सत्य हो चुका होता।
    -Zakir Ali ‘Rajnish’
    { Secretary-TSALIIM & SBAI }

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  30. न जाने कब यह स्थिति सुधेरेगी?
    यह हाल सिर्फ बुंदेलखंड का नहीं भारत की राजधानी दिल्ली में भी ऐसा आम दीखता है.
    वहां भी चारे की कमी के कारण दूध न देने वाली गायों को व बछड़ों को अपना भोजन तलाशने के लिये sadak पर खुला छोड़ दिया जाता है..एक बार शायद कुछ इनाम रखा था [ एक गाय पकड़ने का --? रूपये??]वह स्कीम चली नहीं..
    प्रवीण जी ने लेख बहुत अच्छा लिखा है .
    --अंत में खबर दुःख bhari दी है.क्या हल है?pashupremi सब कहाँ हैं?

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  31. गायों की ये दुर्दशा बहुत आम हो गयी है ,जो बहुत गलत है ,
    गाय को माता का दर्जा दिया जाता है और आज वो दर दर भटक रही है

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  32. ट्रेन दुर्घटना की शिकार हुये पशुओं रिश्तेदार यदि उन्हें स्टेशन पर ढ़ूढ़ते पाये जाते हैं, तो क्या बुरा है ?
    यदि यह यूँ ही न भटक कर किसी गौशाला / पशुशाला की सुरक्षा पा जायें, तो गौरक्षा समिति कैसे बनेगी ?
    यदि समिति का स्कोप खत्म हो जायेगा, तो एक समानाँतर हिन्दू वोट बैंक कैसे मज़बूत होगा ?
    प्रवीण, आप बहुत अच्छा लिखते हो, बशर्ते आप हर बुधवार को यहाँ मिलो ।
    शुभकामनायें ।

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  33. क्या केने क्या केने। आपके भी, और गाय के भी।

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  34. प्रवीण पाण्डेय की पोस्ट बढ़िया लगी. धाराप्रवाह लेखन और रोचक अभिव्यक्ति पाठक की मनः स्थिति पर अच्छा प्रभाव छोड़ती है . लेखक को बधाई और शुभकामनाये . प्रस्तुति के लिए आभार.

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  35. प्रवीण जी की यह पोस्ट बेहद अच्छी लगी और उनकी यह चिंता भी वाजिब की कुछ ऐसा होना चाहिए की ट्रैक के आस पास खरपतवार ना उगे.

    मनोज खत्री
    http://manojkhatrijaipur.blogspot.com/

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--- सादर, ज्ञानदत्त पाण्डेय