Monday, October 5, 2009

हिन्दू धर्म के रहस्यों की खोज

Dawn Ganges कल जो लिखा – “लिबरेशनम् देहि माम!” तो मन में यही था कि लोग इन सभी कमियों के बावजूद हिन्दू धर्म को एक महान धर्म बतायेंगे। यह नहीं मालुम था कि श्री सतीश सक्सेना भी होंगे जो हिन्दुत्व को कोसने को हाथो हाथ लेंगे। और मैं अचानक चहकते हुये थम गया।

«« गंगा किनारे सवेरा।

सोचना लाजमी था – इस देश में एक आस्तिक विरासत, ब्राह्मणिक भूत काल का अनजाना गौरव, भाषा और लोगों से गहन तौर पर न सही, तथ्यात्मक खोजपरख की दृष्टि से पर्याप्त परिचय के बावजूद कितना समझता हूं हिन्दू धर्म को। शायद बहुत कम।

A_Search_In_Secret_ ढोंगी सन्यासियों, जमीन कब्जियाने वाले लम्पट जो धर्म का सहारा लेते हैं, चिलम सुलगाते नशेड़ी साधू और भिखमंगे बहुरूपियों के भरे इस देश में कहां तलाशा है सही मायने में किसी योगी/महापुरुष को? क्यूं समय बरबाद कर रहा हूं इन छुद्र लोगों की लैम्पूनिंग में? किसका असर है यह? क्या रोज छिद्रान्वेंषणीय पोस्टें पढ़ लिख कर यह मनस्थिति बनती है?

वैसे हिन्दू धर्म के रहस्यों को या तो कोई पॉल ब्रण्टन प्रोब कर सकता है, या (शायद)हमारे जैसा कोई अधपका विरक्त – जो अपनी जिम्मेदारियां अपनी पत्नी को ओढ़ा कर (?) स्टेप बैक कर सकता है और जो नये अनुभवों के लिये अभी जड़-बुढ़ापा नहीं देखे है।

क्या करें? जमाने से पड़ी हैं कुछ पुस्तकें जो पढ़े और मनन किये जाने का इंतजार कर रही हैं। शायद उनका समय है। स्वामी शिवानंद कहीं लिखते हैं कि शीतकाल का समय आत्मिक उन्नति के लिये रैपिड प्रोगेस करने का है। कल शरदपूर्णिमा थी। अमृत में भीगी खीर खा चुका। कुछ स्वाध्याय की सम्भावना बनती है? पर स्वाध्याय अनुभव कैसे देगा? Shradpoornimaa

गंगा में झिलमिलाता शरदपूर्णिमा का चांद

मैं केवल यह कह सकता हूं कि भारत ने मेरा विश्वास वापस दिला दिया है। --- मैं इसको बड़ी उपलब्धि मानता हूं। विश्वास उसी तरह से वापस आया जैसा एक अविश्वासी का आ सकता है – भीषण तर्क से नहीं, वरन चमत्कृत करने वाले अनुभव से।

-- पॉल ब्रण्टन, इस पुस्तक से।    


और चलते चलते सूरज प्रकाश जी के ब्लॉग से यह उद्धरण -

Sooraj Prakash बुरी मुद्रा अच्‍छी मुद्रा को चलन से बाहर कर देती है। मतलब ये कि अगर आपकी जेब में दस रुपये का पुराना नोट हो और आपके हाथ में दस रुपये का नया नोट आये तो आप जेब में रखे पुराने नोट की जगह नया नोट रख लेंगे और जेब वाला पुराना नोट सर्कुलेशलन में डाल देंगे।

आज जीवन के हर क्षेत्र में यही हो रहा है। सब कुछ जो अच्‍छा है, स्‍तरीय है, मननीय है, वह चलन से बाहर है। कभी स्‍वेच्‍छा से, कभी मजबूरी में और कभी हालात के चलते। आज हमारे आस पास जो कुछ भी चलन में है, वह औसत है, बुरा है और कचरा है। हम उसे ढो रहे हैं क्‍योंकि बेहतर के विकल्‍प हमने खुद ही चलन से बाहर कर दिये हैं।

बड़ी राहत मिल रही है – अगर मेरा ब्लॉग चलन से बाहर जाता है तो एक दमदार तर्क मेरे हाथ रहेगा!


31 comments:

  1. यहाँ बात सिर्फ हिन्दू धर्म की नहीं है देखा जाये तो सारे ही धर्मों में जो मूल है , और प्रगति का वास्तविक कारक है चुपचाप भुला दिया गया है और अब तक मात्र लम्पटों की ही पौ बारह रही है | इस पूरे चक्र में एक बात हिन्दू धर्म को सबसे अलग और महान बनती है और वो है व्यक्तिगत होना , उदाहरण के लिए अगर मैं वरुण हूँ तो फिर सारी जिन्दगी मेरा धर्म वरुण होने के इर्द- गिर्द ही घूमता रहेगा न कि मुझे पहले कुछ और जैसे मुस्लिम , ईसाई या अन्य कुछ होकर सोचना पड़ेगा |

    इसी लिबरेशन में महानता का सारा राज छुपा है |
    ज्ञान की परतें उघाड़ती पोस्ट के लिए बधाई |

    :) :) :( :P :D :$ ;)

    ReplyDelete
  2. क्या रोज छिद्रान्वेंषणीय पोस्टें पढ़ लिख कर यह मनस्थिति बनती है?
    नहीं भाई....ऐसा नहीं सोचते...मन पर काबू रखते हैं और शीतकाल की प्रतीक्षा करते हैं। और लगातार आपकी तरह अच्छा लिखते हैं।

    ReplyDelete
  3. sab tah ke log hain aur apne wichar prakat karane par pabandee bhee nahee hai. Par itane sankaton bad bhee ye dharm tika hua hai to tikega aur badhega.

    ReplyDelete
  4. अब इतने चिंतन मोड में भी न आईये -अध्ययन के शीत पर्व में मनन की ऊष्मा से हमें भी कृतार्थ करते रहें !

    ReplyDelete
  5. बड़ी राहत मिल रही है – अगर मेरा ब्लॉग चलन से बाहर जाता है तो एक दमदार तर्क मेरे हाथ रहेगा! अच्छा कहलाने के लिये इत्ती हुड़क भी अच्छी नहीं साहब जी।

    ReplyDelete
  6. @ अनूप शुक्ल - फिक्र न करें। अभी ब्लॉग चलन में है - सो वह औसत है, बुरा है और कचरा है! :)

    ReplyDelete
  7. "बड़ी राहत मिल रही है – अगर मेरा ब्लॉग चलन से बाहर जाता है तो एक दमदार तर्क मेरे हाथ रहेगा!"



    और यदि यह चलन से बाहर नहीं गया तो वह दमदार तर्क फिसलकर हमारे हाथों में आ जाएगा ! :)

    ReplyDelete
  8. सहिष्णुता ही हमारे धर्म का गौरव है, बागवान का शुक्र है कि आज भी हमारा बहुमत कट्टर नहीं है , जियो और जीने दो में विश्वास करता हमारा धर्म हमें औरों से जोड़े रखेगा, ऐसा मेरा विश्वास है .

    ReplyDelete
  9. यह हमारी सहिष्णुता है या विडम्बना ...अंतर्द्वंद है ...
    अपने मन से टिपण्णी लिखने की कोशिश करे तो शायद गडबडा जाएँ ..इसलिए वीरेन्द्र जी टिपण्णी को ही हमारी भी मान लें ....

    सब कुछ जो अच्‍छा है, स्‍तरीय है, मननीय है, वह चलन से बाहर है। कभी स्‍वेच्‍छा से, कभी मजबूरी में और कभी हालात के चलते।
    बहुत सही कहा है ...पर अच्छे का चलन लौटेगा पूरा विश्वास है ...!!

    ReplyDelete
  10. भूल सुधार
    कृपया वीरेन्द्र जी लो वरुणजी पढ़े

    ReplyDelete
  11. आप इसे धर्म कहें या और कुछ मैं इसे हिन्दू जीवन पद्धति कहता हूँ। उस का सार यही है कि वह किसी को बांधती नहीं। उस की यात्रा बंधनों से मुक्ति की ओर है। यहाँ कोई बंधता भी है तो स्वैच्छा से।
    लेकिन आप महिलाओं के बारे में सोचेंगे तो पाएँगे कि यह जीवन पद्धति उन्हें कहाँ कहाँ नहीं बांधती।

    ReplyDelete
  12. बुरी मुद्रा अच्‍छी मुद्रा को चलन से बाहर कर देती है।

    ये तो कटु सत्य है और इसको आपने ब्लाग के चलन से जोडकर सभी को एक उपाय सुझाया है. आखिर कब तक आदमी दौडता रहेगा? कभी ना कभी तो यह स्थिति हर आदमी के साथ आयेगी ही. बहुत शुभकामनाएं.

    रामराम.

    ReplyDelete
  13. ढोंगी सन्यासियों, जमीन कब्जियाने वाले लम्पट जो धर्म का सहारा लेते हैं, चिलम सुलगाते नशेड़ी साधू....याद हो तो इसी आधार पर एक बार गुरूजी के लिए मैने टिप्पणी की थी और आप नाराज हो गए थे. वैसे स्थिति स्पष्ट भी हो गई थी. कुल मिला कर एक औसत भारतीय एक सा सोचता है, जिसकी चिंताएं साँझा है.

    सुनिल दीपक, उन्मुक्त, रविरतलामी को औसत से कम टिप्पणियाँ मिलती है और वे अच्छे ब्लॉगर है. आगे कुछ नहीं कहेंगे :)

    ReplyDelete
  14. हां ये सच है कि कई बार ऐसा लगता है सब कुछ छोड-छाड़ के प्रकृति की गोद मे छुप कर बैठ जायें।लेकिन रोज़ ज़िंदा रहने की कुत्ताघसिटी ऐसा करने भी नही देती।नदी मे तैरते चांद को देखे ज़माना बीत गया,नदी मे तैरते तो क्या आसमान पर उड़ते हुये भी नही देखा है।धर्म के नाम पर पाखण्ड देख-देख कर उल्टी होने लगी है।मंदिरों मे लूट-खसोट और देवता से ज्यादा दर्शनार्थ आई देवियो के दर्शन मे डूबे भक्तों को देखो तो ऐसा लगता है कि इससे तो नास्तिक़ होना बेहतर है।जाने दिजिये गुरुजी आपका असर हो रहा है मुझे तो स्टेप बैक करने के बीबी का सहारा भी नही है।

    ReplyDelete
  15. सूरज प्रकाश जी के लेख का प्रमाण मेरे सामने है . मेरे पिता जी राजनीती के उच्च स्तर तक पहुचकर स्वेच्छा से अलग होगये क्योकि सिस्टम में एडजेस्ट नहीं हो प् रहे थे . कोई आरोप भी नहीं लगा विरोधी से ज्यादा उनके अपने लोग उनकी इमानदारी से परेशान थे

    ReplyDelete
  16. चाहे कुछ भी कहें या लिखें हम तो कहेंगे "मेरा धर्म महान" अब क्या आपके नज़रिए से इसे महान कहलाने के लिए चलन से बाहर जाना होगा? .

    ReplyDelete
  17. कविता क्या है? हिंदू धर्म क्या है? शायद अनादि काल तक इसकी चर्चा चलती रहेगी। जहां तीन लाख देवी-देवता पूजे जाते हैं वहां धर्म की व्याख्या कैसी!!
    क्या हिंदू धर्म है या हिंदुस्तान में रहनेवाले हर हिंदुस्तानी के रहने-जीने की पद्धति। इसकी व्याख्या साधारण कचरा ब्लागर करें।
    मैं तो उच्च श्रेणी का ब्लागर हूं क्योंकि मेरा ब्लाग लुप्त होने के कगार पर है:)

    ReplyDelete
  18. आपके ही पिछले लेख पर आई एक टिप्पणी पर आपका ही प्रत्युत्तर यहाँ पर उद्धृत करना चाहूँगा-- ये चिलम सुलगाने वाले, गँजेड़ी और लम्पट भी इसी सनातन धर्म का अनन्य अंग हैं।

    व्यवहार की कमियों को छोड़ दें तो मेरे विचार से जीवन संघर्ष से भागे इन प्राणियों को भी तो हमारा सर्वसमावेशी धर्म अपनी गोद में जगह देता है...

    ईशावास्यमिदं सर्वं....

    ReplyDelete
  19. एक बेचैनी,निरंतर नकार का भाव,प्रश्नाकुलता,और समाहित करने की प्रवृत्ति. ये हमारी जीवन पद्धति रही है.यही इसमें उत्कृष्ट है बिलकुल आपके ब्लॉग की तरह.

    ReplyDelete
  20. यह हिन्दू धर्म की सतही भंगिमायें हैं । जब समाज द्वारा कोई अनुशासित व निश्चित आचार संहिता नहीं होती है तो सब लोग अपने अपने हिस्से के हिन्दुत्व का दिखावा करते हैं या अपने मन की भावनाओं को हिन्दुत्व बना कर परोसते हैं । अध्यात्म इन सतही कम्पनों का न तो आश्रय लेता है और न ही इस पर कुछ टिप्पणी देना अपना कर्तव्य ही समझता है । यह सब कर के कौन किसको बेवकूफ बना रहा है और कौन किस बेवकूफ का अनुसरण कर रहा है यह उनके मन की उधेड़बुन है । हिन्दुत्व की धुन तो बहुत ही सुरीली है । सुनाने वाला ढूढ़ा जाये ।

    ReplyDelete
  21. आपकी पोस्ट पढी किन्तु पढकर जो बात मैं अपनी टिप्पणी के माध्यम से कहना चाहता था....हूबहू वही विचार मुझसे पहले प्रवीण पांडेय जी अपनी टिप्पणी के जरिए प्रकट कर चुके हैं ।
    वास्तव में आज यही हो रहा है कि हम लोग अपनी कमियों को दूर करने की अपेक्षा उसे ही अपनी विशेषता बताकर एक मिथ्या भ्रम में जीने के आदी हो चुके हैं ।

    ReplyDelete
  22. आज हम कुछ नही बोलेगे, बस चुप चाप पढेगे आप का लेख ओर टिपण्णीयां,क्योकि मेने पुजा करते , भगवान को मानाते तो बहुत देखे है, लेकिन भगवान की मानते किसी को नही देखा, इस लिये मै क्या कहूं .
    धन्यवाद

    ReplyDelete
  23. इशारों इशारों में इतनी बड़ी बात कह देना यह आप ही के बस की बात है ज्ञान जी। सदैव की भाँति सहमत आपकी बात से। जय हिन्द।

    ReplyDelete
  24. एक रोचक वाकया बताना चाहूँगा।

    अपने Shy nature को ही दोष दूंगा कि मैं Online तो खूब घसीट देता हूँ पर फेस टू फेस या फोन पर हैंक हो जाता हूँ। क्या कहूं सामने वाले से, क्या, कैसे....और इन्ही मानसिकता को लिये कटनी से गुजरते वक्त एक साधू से ट्रेन में मिला था।

    बगल की बर्थ पर बैठकर वह साधू कोई किताब पढ रहा था। बैठे बैठे मैं उस किताब के कवर देखने लगा। अचानक साधू ने किताब को नीचे कर मेरी ओर देखा और कहा - Do u want to be 'Dedicated चूतिया' ?

    आप समझ सकते हैं कि मेरी क्या हालत हुई होगी। अच्छा भला साधू अचानक 'डेडीकेटेड चूतिया' जैसे शब्दों का इस्तेमाल करे तो आश्चर्य होगा ही।

    मैं मुस्करा पडा। बदले में उसने वह किताब मेरे सामने कर दी। किताब को उलट पलट कर देखा तो उसमें लंगोट विधि लिखी थी कि - हिंदू प्रणाली से वीर्य की रक्षा कैसे करे :)

    फिलहाल तो मैं इस डेडिकेशन पर नहीं जाना चाहता, हां इतना जरूर कहूंगा कि हिंदू धर्म केवल लंगोट, जन्म पत्री और करमकाण्ड नहीं है....वह इससे आगे बढ कर है।

    ReplyDelete
  25. हमें तो लगा कि हम आजकल अपडेटेड रहते हैं अपने नए गैजेट से. लेकिन २ दिनों से देखा ही नहीं और शरद पूर्णिमा निकल गयी हमें पता तक नहीं चला ! आप अनुभव कीजिये और ब्लॉग पर ठेलिए हम भी पढ़ लिया करेंगे अब शरद पूर्णिमा का चाँद भी तो यहीं देख रहे हैं !

    ReplyDelete
  26. aap gyaani hai aur main mahamoorkh :) isliye main aaj chup :P

    ReplyDelete
  27. अगर मेरा ब्लॉग चलन से बाहर जाता है तो एक दमदार तर्क मेरे हाथ रहेगा- और ऐसा लिखते रहने के कारण मुझे उम्मीद है कि चलन बढ़ने वाला है, तब इस तर्क के मुताबिक??

    ReplyDelete
  28. बुरी मुद्रा कभी अच्छी मुद्रा रही होगी. और अच्छी मुद्रा कभी बुरी मुद्रा बन जायेगी .....
    ऐसे उद्धरणों को कम से कम स्वयं से तो न जोडिए.....
    बुद्धिमानों से ऐसी अपेक्षा नहीं होती....

    ReplyDelete
  29. gyaan ji , namaskar

    jaise ki ye sabit ho chuka hai ki adhyaatam dharm se upar hai aur jeevan ke path par dongi dharmikata se jyada jaruri hai seedhi sacchi adhyatmikta .. agar hame eeshwar se judna hai to uske liye kisi dharm ke aawaran ki jarurat nahi apitu , sahaj man ke aachran ki jarurat hai jo ki insaniyat ki sewa se hi sambhav hai ..

    aapka dhanywad.

    regards

    vijay
    www.poemsofvijay.blogspot.com

    ReplyDelete
  30. हिन्दू धर्म या सनातन धर्म इतना विस्तृत है के , कितना भी जाने , बहुत सारा - फिर भी रह जाता है
    जो छूट जाता है - चन्द्रमा की गंगा जी में छवि अच्छी लगी
    - लावण्या

    ReplyDelete
  31. केवल हिन्दू धर्म ही नहीं, दूसरे धर्मों के साथ भी यही है. दिक़्क़त यह है कि हम लोग केवल हिन्दू धर्म को ही जानते हैं ठीक से, इसलिए इसी की आलोचना करते हैं. पश्चिम में भी तो चर्च लोगों को स्वर्ग का टिकट बेचता रहा, आज भी चर्चों मे जो कुछ हो रहा है ब्रह्मचर्य के नाम पर वह किसी से छिपा नहीं है. वहीं मस्जिदों-मदरसों से लेकर मजारों तक आप इस्लाम का दुरुपयोग देख सकते हैं. लेकिन यह सब धर्म के नाम पर हो रहा है, धर्म का काम नहीं है यह. इसके ख़िलाफ़ आम जन को खड़े होना चाहिए. आख़िर हम ऐसा होने ही क्यों देते हैं?

    ReplyDelete

आपको टिप्पणी करने के लिये अग्रिम धन्यवाद|

हिन्दी या अंग्रेजी में टिप्पणियों का स्वागत है|
--- सादर, ज्ञानदत्त पाण्डेय