ऋतुयें हैं – ग्रीष्म, वर्षा, शरद, शिशिर, हेमन्त वसन्त। पतझड़ क्या है – ऑटम (Autumn) शरद भी है और हेमन्त भी। दोनो में पत्ते झड़ते हैं।
झरते हैं झरने दो पत्ते डरो न किंचित। रक्तपूर्ण मांसल होंगे फिर जीवन रंजित।
औरों की ब्लॉग पोस्टें देखता हूं - सदाबहार नजर आती हैं। चहकते, बहकते लोग। धर्म के नाम पर धर्म से लड़ते लोग। कविता कहते सुनते वाहावाही करते लोग। कैसे लोग बाईपास कर जाते हैं शरद और हेमन्त को और सदा निवसते हैं वसन्त में!





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पुन: तपेगी वात
झरेंगे पीले-पीले पात
सहेंगे मौसम के आघात
बता दो पात-पात पर लिखे गये
अनुबन्धों का क्या होगा!
धूप-छांव में बुने गये
अनुबन्धों का क्या होगा!
पावन होगा द्वार
कभी तो आओगे इस पार
लिये मादक सौरभ का भार
बता दो रात-रात भर रचे
स्वप्न से छ्न्दों का क्या होगा!
धूप-छांव में बुने गये
अनुबन्धों का क्या होगा!
मुस्कायेंगे पात
मधुप दे जायेंगे सौगात
सजेगी मौसम की बारात
बता दो सांस-सांस में घुली
हुई उन गन्धों का क्या होगा!
धूप-छांव में बुने गये
अनुबन्धों का क्या होगा!
महेश सक्सेना
[http://hindini.com/fursatiya/archives/400]
♥ ♥
♥
धर्म भी बुद्धि का विषय है ? ? ?
मुम्बई-टाईगर
एक प्रसिद्ध हिन्दी ब्लोगर को पहचानो
कुछ लोग महान पैदा होते हैं,
कुछ महान बन जाते हैं।
कुछ प्रेस एजेण्ट नियुक्त कर लेते हैं।
~ पॉल ब्रण्टन। सन 1934
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- अधिभार सहित :) -
कुछ लोग विवाद पैदा करते हैं ।
कुछ विवादित होना चाहते हैं ।
कुछ ब्लॉगर बन जाते हैं :)
- श्री श्री कतराय स्वामी
सावन आये या ना आये जिया जब झूमे सावन है ...एक बार मन से मुस्कुराकर देखिये ...पतझड़ पास भी नहीं फटकेगा ...
बहुत शुभकामनायें ..!!
इस बहाने ब्लॉग-नब्ज़ पर उंगली ।
कौनो जरुरी है कि हर चीज आपको बता ही दी जाये...आपे कौन सारा कुछ बताये हैं जो मन में चल रहा है...
इतना भर न: चहकते, बहकते लोग। धर्म के नाम पर धर्म से लड़ते लोग.....:)
धर्म के नाम पर लड़ते लडाते ,
एक दूसरे को कुटते पीसते
पीसा हुआ फिर से पीसते
तो वहां क्या वसन्त और क्या शरद....
सब माया है....कहीं धूप कहीं छाया है :)
इस बहस ने तो पूरा धार्मिक उन्माद फैला रखा है , मन बहुत व्यथित है इन मानसिक तौर पर विकृत लोगो की पोस्ट देखकर |
है नवीन का यह आगाज़
Can't say bout rest of all, however I still remember those old golden days when there use to be 10-12 days festival in our small town .It Was called 'Sharadotasav'.
or 'Automn Festival' or simply 'Automn'.
What the great fun that was !!
PS: Good that you are using twitter it's a fastest growing networking iste(tough i doubt that it's networking site).People also call it SMS Of internet.
वाह क्या सत्योक्ति है...ऐसा लगा आप ने मेरे दिल की बात कह दी हो...
धर्म के नाम पर कौन लड़ रहा है?
किसने शुरू की ये लड़ाई?
कोई जानबूझ कर हमें अपमानित करे और हम चुप रहें?
चुपचाप अपमानित होते रहना क्या उचित है?
क्या रामचरितमानस में लिखा "जिन मोहि मारा ते मैं मारे" गलत है?
क्या कृष्ण का अर्जुन को उपदेश "शस्त्र उठा ..." गलत है?
और अबूझ की बात ही नहीं, हाइपरबोल में लेखन तो एक आध बार छोड़ कभी नहीं किया। उससे पाठक नहीं मिलते!
नयी पौध/पोस्ट में कविता का उदय
मेरी भी छोटी आहुति
पत्ते टूटेंगे पेड़ों से,
निश्चय द्रुतवेग थपेड़ों से,
आहत भी आज किनारे हैं,
सब कालचक्र के मारे हैं,
क्यों चित्र यही मन में आता,
जीवन गति को ठहरा जाता,
व्यवधानों में जलता रहता, मैं दिशा-दीप का वादी हूँ।
मैं उत्कट आशावादी हूँ।।३।।
कुछ रंग, खुशबुएं और संगीत केवल पतझड में ही होते हैं। इसके अलावा एक आशा कि नई कोंपलें आने वाली हैं।
वैसे आपके ब्लाग पर तो कभी पतझड नही आता, फिर यह हलचल क्यूं ?
प्रणाम स्वीकार करें
humne dekha hai tazruba karke...
Par phir bhi dil hai ki manta nahi...
Ise pathak ki quality chahiye Quantity nahi...
...Ab bahut khush hai ye...
kyunki ise "Bahut Khoob" , "sawagt hai aapka" jaise 50-60 tippniyoon se 2-3 baudhik (so called hyperbolic) tippani hi pasand hai....
chahe usmein aalochnayien hi kyun na hon...
..balki aalochnaon se vishes prem hai ise.
"ओ गुरु, गुलकंद कितना भी टेस्टी हो, उसे रोटी पर रखकर खाया नहीं जाता...उबले अंडे से आमलेट बनाया नहीं जाता...रिक्से पर बैठाकर प्रेमिका को लॉन्ग ड्राइव पर ले जाया नहीं जाता..और सच तो यह है गुरु की हिमालय में चाहे जितनी ठण्ड हो वहां पोलर बीयर पाया नहीं जाता."
(महान विचारक, दार्शनिक और 'समझशास्त्री' सिद्धू जी महाराज के अमृत वचनों से साभार.)
भौतिकी के मेरे प्रोफेसर साहित्य में काफी रुचि लेते थी. वे इलाहबाद के थे और उनका कहना था कि इलाहबाद हिन्दी साहित्य का केंद्र है और वहा साहित्य के अनुरूप अच्छा माहौल है.
क्या आप एक आलेख में इस विषय पर कुछ प्रकाश डालेंगे ?
सस्नेह -- शास्त्री
हिन्दी ही हिन्दुस्तान को एक सूत्र में पिरो सकती है
http://www.Sarathi.info
टिप्पणी पोस्ट नहीं हो पा रही, छेपने का कष्ट करें:
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पतझड़ की चर्चा मैंने अपनी ताजी पोस्ट में की है। लिंक नहीं दूँगा नहीं तो कहेंगे प्रचार कर रहा है।
शरद हेमंत की ठिठुरन भी http://kavita-vihangam.blogspot.com की कविता 'रात' में है। (यह प्रचार है। चचा अब अन्ना चुप हैं तो कोई बड़ा ब्लॉग तो चाहिए न प्रचार करने के लिए !)
आप हमको हाँकने के लिए अलग 'लउरी' का प्रयोग करिए। ई आरोप खारिज कि 'लोग बाईपास कर जाते हैं शरद और हेमन्त को'' ।
फोटो तो हरियाली का ही लगाए हुए हैं आप बात पतझड़ की -उलटबाँसी, वह भी मगहर में नहीं शिवकुटी में?
धरम का टंटा के मुआमले में हम अवधिया जी से सहमत थे - उपेक्षा करो।
अब वह आजिज आ कर ट्रैक बदल रहे हैं। मुझे लगता है जो लोग लड़ सकते हैं, उन्हें लड़ना चाहिए - अपने अपने तरीके से। मैं भी लड़ता रहता हूँ।
इस्लाम का जो रूप आजकल स्वच्छ रूप धरे आ रहा है, वह पूरी मानवता के लिए खतरनाक है - खुद मुसलमानों के लिए भी। मेरे आदर्श तो क़ुरबानी मियाँ और बाउ हैं।
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(मेरा कथ्य - फोटो पतझड़ का ही है! एक सज्जन के ई-मेल से प्राप्त चित्र का परिवर्तित रूप। पेंड़ पर हरे पत्ते हैं पर पीतवर्ण पत्ते झड़े भी हैं। पतझड़ है - पर ठूंठ नहीं!)
(ये हरियाली का सूत्र है ! )
कवितायेँ पढ़ कर प्रसन्न हूँ -
प्रवीण भाई की रचना की अंतिम लाइन
" मैं उत्कट आशावादी हूँ।"
बहुत पसंद आयी .............
ई स्वामी जी की भेजी हुई भी
उम्दा लगी -
हमारे यहां पतझड़ की सुन्दरता ,
देखने लायक होती है --
मानो प्रकृति
शीत लहर से पहले
रंगबिरंगी परिधान में सज कर ,
दर्पण निहार रही हो --
- लावण्या
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