Saturday, October 10, 2009

पतझड़


@gyandutt I'm reading: पतझड़Tweet this (ट्वीट करें)!

कब होता है पतझड़?
ऋतुयें हैं – ग्रीष्म, वर्षा, शरद, शिशिर, हेमन्त वसन्त। पतझड़ क्या है – ऑटम (Autumn) शरद भी है और हेमन्त भी। दोनो में पत्ते झड़ते हैं।

झरते हैं झरने दो पत्ते डरो न किंचित। रक्तपूर्ण मांसल होंगे फिर जीवन रंजित। 
यह ट्विटरीय बात ब्लॉग पोस्ट पर क्यों कर रहा हूं? अभी उपलब्धि/लेखन/पठन के पतझड़ से गुजर रहा हूं। देखें कब तक चलता है!
Autumm
औरों की ब्लॉग पोस्टें देखता हूं - सदाबहार नजर आती हैं। चहकते, बहकते लोग। धर्म के नाम पर धर्म से लड़ते लोग। कविता कहते सुनते वाहावाही करते लोग। कैसे लोग बाईपास कर जाते हैं शरद और हेमन्त को और सदा निवसते हैं वसन्त में!

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प्रतिक्रियायें :
 

36 महत्वपूर्ण टिप्पणियां:

eSwami said...

औरों का पता नही पतझड का ज़िक्र हो तो मुझे यह याद आती है -

पुन: तपेगी वात
झरेंगे पीले-पीले पात
सहेंगे मौसम के आघात
बता दो पात-पात पर लिखे गये
अनुबन्धों का क्या होगा!

धूप-छांव में बुने गये
अनुबन्धों का क्या होगा!

पावन होगा द्वार
कभी तो आओगे इस पार
लिये मादक सौरभ का भार
बता दो रात-रात भर रचे
स्वप्न से छ्न्दों का क्या होगा!

धूप-छांव में बुने गये
अनुबन्धों का क्या होगा!

मुस्कायेंगे पात
मधुप दे जायेंगे सौगात
सजेगी मौसम की बारात
बता दो सांस-सांस में घुली
हुई उन गन्धों का क्या होगा!

धूप-छांव में बुने गये
अनुबन्धों का क्या होगा!

महेश सक्सेना

[http://hindini.com/fursatiya/archives/400]

HEY PRABHU YEH TERA PATH said...

प्रकृति मे पतझड नित समय पर होता है यह सर्व विदित है, किन्तु हिन्दी चिठठाकारी मे २४/७ डेज बारह मास चोबिस घडी पतझड चालू रहता है जी। ♥ ♥ ♥

♥ ♥



धर्म भी बुद्धि का विषय है ? ? ?
मुम्बई-टाईगर
एक प्रसिद्ध हिन्दी ब्लोगर को पहचानो

Udan Tashtari said...

कविमना इसे कैसे बाईपास कर सकते हैं...गुनते हैं..और सहेजते हैं.
कौनो जरुरी है कि हर चीज आपको बता ही दी जाये...आपे कौन सारा कुछ बताये हैं जो मन में चल रहा है...
इतना भर न: चहकते, बहकते लोग। धर्म के नाम पर धर्म से लड़ते लोग.....:)

सतीश पंचम said...

आज आपके ही आत्मोन्नति window से साभार

कुछ लोग महान पैदा होते हैं,
कुछ महान बन जाते हैं।
कुछ प्रेस एजेण्ट नियुक्त कर लेते हैं।
~ पॉल ब्रण्टन। सन 1934

------------------

- अधिभार सहित :) -

कुछ लोग विवाद पैदा करते हैं ।
कुछ विवादित होना चाहते हैं ।
कुछ ब्लॉगर बन जाते हैं :)
- श्री श्री कतराय स्वामी

हिमांशु । Himanshu said...

कहाँ-कहाँ से विचार-सूत्र तलाशते हैं आप !

इस बहाने ब्लॉग-नब्ज़ पर उंगली ।

वाणी गीत said...

चहकना बहकना ऐसा कोई मुश्किल काम नहीं है ...मुश्किल है स्वनाम को धन्य करती आपकी प्रविष्टियाँ ...
सावन आये या ना आये जिया जब झूमे सावन है ...एक बार मन से मुस्कुराकर देखिये ...पतझड़ पास भी नहीं फटकेगा ...
बहुत शुभकामनायें ..!!

सतीश पंचम said...

और जब इतने सारे विवाद चल रहे हों...

धर्म के नाम पर लड़ते लडाते ,
एक दूसरे को कुटते पीसते
पीसा हुआ फिर से पीसते

तो वहां क्या वसन्त और क्या शरद....

सब माया है....कहीं धूप कहीं छाया है :)

Arvind Mishra said...

समझ नहीं पाए हम पतझड़ आज तक !

Ratan Singh Shekhawat said...

"औरों की ब्लॉग पोस्टें देखता हूं - सदाबहार नजर आती हैं। चहकते, बहकते लोग। धर्म के नाम पर धर्म से लड़ते लोग। "
इस बहस ने तो पूरा धार्मिक उन्माद फैला रखा है , मन बहुत व्यथित है इन मानसिक तौर पर विकृत लोगो की पोस्ट देखकर |

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

मत हो पतझड़ देख उदास
है नवीन का यह आगाज़

Sudhir (सुधीर) said...

कैसे लोग बाईपास कर जाते हैं शरद और हेमन्त को और सदा निवसते हैं वसन्त में!


वाह क्या सत्योक्ति है...ऐसा लगा आप ने मेरे दिल की बात कह दी हो...

दर्पण साह "दर्शन" said...

Gyandutt sir,
Can't say bout rest of all, however I still remember those old golden days when there use to be 10-12 days festival in our small town .It Was called 'Sharadotasav'.
or 'Automn Festival' or simply 'Automn'.

What the great fun that was !!

PS: Good that you are using twitter it's a fastest growing networking iste(tough i doubt that it's networking site).People also call it SMS Of internet.

कुश said...

सब अपना एक बसंत लेकर जीते है.. सब अपना एक पतझड़ लेकर जीते है..

श्रीश पाठक 'प्रखर' said...

बात जितनी समझ में आ रही है,,पता नहीं उतनी ही लिखी है...या ....महामना थोड़ा सरल लिखिए....या मुझ अबूझ को माफ़ करिए.....

जी.के. अवधिया said...

"धर्म के नाम पर धर्म से लड़ते लोग।"

धर्म के नाम पर कौन लड़ रहा है?
किसने शुरू की ये लड़ाई?
कोई जानबूझ कर हमें अपमानित करे और हम चुप रहें?
चुपचाप अपमानित होते रहना क्या उचित है?
क्या रामचरितमानस में लिखा "जिन मोहि मारा ते मैं मारे" गलत है?
क्या कृष्ण का अर्जुन को उपदेश "शस्त्र उठा ..." गलत है?

ज्ञानदत्त पाण्डेय| Gyandutt Pandey said...

@ श्रीश पाठक - बात में कोई पर्त नहीं, सरल सी है! आत्मकेन्द्रित सी।
और अबूझ की बात ही नहीं, हाइपरबोल में लेखन तो एक आध बार छोड़ कभी नहीं किया। उससे पाठक नहीं मिलते!

प्रवीण पाण्डेय said...

पतझड़ नये के आने के स्वागत में अपना स्थान छोड़ देता । ब्लॉग के क्षेत्र में नयी पोस्ट के साथ बसन्त होता है और अगली पोस्ट आने के पहले पतझड़ ।

नयी पौध/पोस्ट में कविता का उदय
मेरी भी छोटी आहुति

पत्ते टूटेंगे पेड़ों से,
निश्चय द्रुतवेग थपेड़ों से,
आहत भी आज किनारे हैं,
सब कालचक्र के मारे हैं,
क्यों चित्र यही मन में आता,
जीवन गति को ठहरा जाता,
व्यवधानों में जलता रहता, मैं दिशा-दीप का वादी हूँ।
मैं उत्कट आशावादी हूँ।।३।।

संजय बेंगाणी said...

आपका ब्लॉग तो सदा हरा-भरा ही देखा है. रोज नए नए पत्ते (पोस्ट) खिल रहें है.

Nirmla Kapila said...

जीवन मे पतझड् का कोई समय नहीं होता हम तो रोज़ बसंत समझ कर जीते हैं। इस लिये हंसते हैं मुस्कुराते हैं और टिप्पियाते हैं। आशा करते हैं कि आपका ब्लाग भी सद बसंत मनाता रहे

Anil Pusadkar said...

पत्ते झडेंगे नही तो नये उगेंगे कैसे?

अन्तर सोहिल said...

पतझड भी अच्छा लगता है जी।
कुछ रंग, खुशबुएं और संगीत केवल पतझड में ही होते हैं। इसके अलावा एक आशा कि नई कोंपलें आने वाली हैं।
वैसे आपके ब्लाग पर तो कभी पतझड नही आता, फिर यह हलचल क्यूं ?
प्रणाम स्वीकार करें

इष्ट देव सांकृत्यायन said...

आप के ब्लॉग पर तो हमेशा बसंते-बसंत लौकता है. आप काहें पतझड़ की बात कर रहे हैं?

Shiv Kumar Mishra said...

कई गम्भीर मुद्दों पर सिद्धू जी महाराज ने अपने अमृत वचन से कृतार्थ किया है. आपकी आज की पोस्ट वाले मुद्दे पर महाराज कहते हैं;

"ओ गुरु, गुलकंद कितना भी टेस्टी हो, उसे रोटी पर रखकर खाया नहीं जाता...उबले अंडे से आमलेट बनाया नहीं जाता...रिक्से पर बैठाकर प्रेमिका को लॉन्ग ड्राइव पर ले जाया नहीं जाता..और सच तो यह है गुरु की हिमालय में चाहे जितनी ठण्ड हो वहां पोलर बीयर पाया नहीं जाता."

(महान विचारक, दार्शनिक और 'समझशास्त्री' सिद्धू जी महाराज के अमृत वचनों से साभार.)

दर्पण साह "दर्शन" said...

"हाइपरबोल में लेखन तो एक आध बार छोड़ कभी नहीं किया। उससे पाठक नहीं मिलते!"

humne dekha hai tazruba karke...

Par phir bhi dil hai ki manta nahi...

Ise pathak ki quality chahiye Quantity nahi...

...Ab bahut khush hai ye...

kyunki ise "Bahut Khoob" , "sawagt hai aapka" jaise 50-60 tippniyoon se 2-3 baudhik (so called hyperbolic) tippani hi pasand hai....
chahe usmein aalochnayien hi kyun na hon...
..balki aalochnaon se vishes prem hai ise.

राज भाटिय़ा said...

जनाब आप के यहां तो बसंत है जी,बहुत हरियली भी छाई है, बस एक नया "फ़ूल" अभी तक नही चमका, जिस के आते हि पतझड आ जाती है.. जरा बच के वो फ़ूल बहुत दुर्गंध मारता है, निकलते ही मसल दे... अब आप ने गंगा किनारे जाना छोड दिया क्या

ज्ञानदत्त पाण्डेय| Gyandutt Pandey said...

@ राज भाटिया जी (अब आप ने गंगा किनारे जाना छोड दिया क्या) - जी नहीं, आज की गंगा किनारे की फोटो ट्विटर पर!

Shastri JC Philip said...

पतझड के समय पानी पड जाये तो "पतझड" पर "पानी पड जाता है" और तुरंत नये पत्ते आ जाते हैं. अत: सोचा कि निम्न बात कह कर आप के लेखक-मन को जरा सींच दूँ:

भौतिकी के मेरे प्रोफेसर साहित्य में काफी रुचि लेते थी. वे इलाहबाद के थे और उनका कहना था कि इलाहबाद हिन्दी साहित्य का केंद्र है और वहा साहित्य के अनुरूप अच्छा माहौल है.

क्या आप एक आलेख में इस विषय पर कुछ प्रकाश डालेंगे ?

सस्नेह -- शास्त्री

हिन्दी ही हिन्दुस्तान को एक सूत्र में पिरो सकती है
http://www.Sarathi.info

ज्ञानदत्त पाण्डेय| Gyandutt Pandey said...

श्री गिरिजेश राव की ई-मेल से प्राप्त टिप्पणी:
टिप्पणी पोस्ट नहीं हो पा रही, छेपने का कष्ट करें:
+++++++++++++++++++++++++++++
पतझड़ की चर्चा मैंने अपनी ताजी पोस्ट में की है। लिंक नहीं दूँगा नहीं तो कहेंगे प्रचार कर रहा है।
शरद हेमंत की ठिठुरन भी http://kavita-vihangam.blogspot.com की कविता 'रात' में है। (यह प्रचार है। चचा अब अन्ना चुप हैं तो कोई बड़ा ब्लॉग तो चाहिए न प्रचार करने के लिए !)
आप हमको हाँकने के लिए अलग 'लउरी' का प्रयोग करिए। ई आरोप खारिज कि 'लोग बाईपास कर जाते हैं शरद और हेमन्त को'' ।

फोटो तो हरियाली का ही लगाए हुए हैं आप बात पतझड़ की -उलटबाँसी, वह भी मगहर में नहीं शिवकुटी में?

धरम का टंटा के मुआमले में हम अवधिया जी से सहमत थे - उपेक्षा करो।
अब वह आजिज आ कर ट्रैक बदल रहे हैं। मुझे लगता है जो लोग लड़ सकते हैं, उन्हें लड़ना चाहिए - अपने अपने तरीके से। मैं भी लड़ता रहता हूँ।
इस्लाम का जो रूप आजकल स्वच्छ रूप धरे आ रहा है, वह पूरी मानवता के लिए खतरनाक है - खुद मुसलमानों के लिए भी। मेरे आदर्श तो क़ुरबानी मियाँ और बाउ हैं।
+++++++++++++++++++++++++++++
(मेरा कथ्य - फोटो पतझड़ का ही है! एक सज्जन के ई-मेल से प्राप्त चित्र का परिवर्तित रूप। पेंड़ पर हरे पत्ते हैं पर पीतवर्ण पत्ते झड़े भी हैं। पतझड़ है - पर ठूंठ नहीं!)

dhiru singh {धीरू सिंह} said...

सावन भादो में लगाये पौधे अब जमीन पकड चुके है . धान की बालियाँ अपना रंग बदलने को आतुर है . प्रक्रति का अजब नज़ारा नजर आ रहा है लेकिन पतझड़ -- कल चेक करूँगा गाँव जाकर .

Babli said...

वाह बहुत बढ़िया लिखा है आपने जो प्रशंग्सनीय है!

ज्ञानदत्त पाण्डेय| Gyandutt Pandey said...

@ Babli jee - धन्यवाद जी। पर मैने कुछ खास लिखा ही नहीं है! असल में लिख ही यही रहा हूं कि कुछ खास है ही नहीं!

चंदन कुमार झा said...

अब तो पतझर को भी बायपास किया जाने लगा है, पर इसकी भी तो आवश्यकता है जीवन में ।

अभिषेक ओझा said...

वाह बहुत बढ़िया लिखा है आपने जो प्रशंग्सनीय है!
(ये हरियाली का सूत्र है ! )

पुनीत ओमर said...

शब्दों में कम पर सोचने के लिए मजबूर कर देने वाली एक बेहद सार्थक पोस्ट.. कम से कम एक ब्लोगर के लिए..

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

हमारे यहाँ तो शुरू हो गया

लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्` said...

टिप्पणियों में आयीं
कवितायेँ पढ़ कर प्रसन्न हूँ -
प्रवीण भाई की रचना की अंतिम लाइन
" मैं उत्कट आशावादी हूँ।"
बहुत पसंद आयी .............
ई स्वामी जी की भेजी हुई भी
उम्दा लगी -

हमारे यहां पतझड़ की सुन्दरता ,
देखने लायक होती है --

मानो प्रकृति
शीत लहर से पहले
रंगबिरंगी परिधान में सज कर ,
दर्पण निहार रही हो --
- लावण्या

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