मैं तो सवेरे पौने छ बजे गंगा तट पर जाता हूं। बहुत सी स्त्रियां लौटती दीखती हैं और कई तो स्नान के बाद पण्डाजी के पास संकल्प करती पाई जाती हैं। बहुत सी शंकर जी के मन्दिर में पूजा-अर्चना में दीखती हैं।
कल शाम शनिवार को उन्हें हनुमान जी के मन्दिर में पीपल के पेंड़ के थाले में दीपक सजाते पाया था। जगमगाते दीपक और ढेर सारा बिखरा तेल। उनपर आते अनेक चींटे – बड़ी प्रजाति वाले।
स्त्रियों की साधना-आराधना का मास लगता है कार्तिक!
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आज का सवेरा- सूर्योदय सवेरे ६:०३ बजे
स्त्रियां, सवेरे ६:०८ बजे
वापस लौटती स्त्रियां, सवेरे ६:१६ बजे
शनिवार को कल पीपल के थाले पर दिये सजाती स्त्रियां





28Comments so far:
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सचित्र बढ़िया प्रस्तुति.....धन्यवाद
पर हमें क्या ? जब स्त्रियों को ही आपत्ति नहीं :)
रामायणप्रेमी पाठकों को ध्यान में रखकर आज से मैंने एक नया ब्लॉग "संक्षिप्त वाल्मीकि रामायण" आरम्भ किया है। आशा करता हूँ कि आप सभी को मेरा नया ब्लॉग "संक्षिप्त वाल्मीकि रामायण" पसन्द आयेगा और उससे लाभान्वित होंगे।
आशा करता हूँ कि श्री ज्ञानदत्त जी मेरे इस प्रचार को सहर्ष अनुमति देंगे।
धन्यवाद!
सोच रहा हूँ कि पूरे कार्तिक प्रात: सबसे पहले आप की पोस्ट पढ़ी जाय और उसके बाद अवधिया जी की वाल्मीकि रामायण पढ़ी जाय। अपना पुण्य़ इसी से जुट जाएगा। पिताजी को भी समझा दूँगा, शायद वह मुझे नास्तिक कहने के पहले सोचेंगे। .....लेकिन यह तो इस पर निर्भर होगा कि आप यह क्रम जारी रखें।
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श्रीमती जी पीछे पड़ी हैं - पंडिताइन ने 23000 सूर्य मंत्रों का जाप बताया है। बहुत फॉलोअप के बाद मैंने आज रविवार के दिन प्रारम्भ करने को कहा था। वह शायद भुला गई हैं - तभी तो उनके हाथ की तली रोहू खाने के बाद मैं यह पोस्ट लिख रहा हूँ। सूर्य भगवान अब अगले अतवार तक अकुलाएँगे। ....
मैं यह सब क्यों लिख रहा हूँ ? सहज आत्मीयता के कारण? चचा सोचता हूँ आप से कभी साक्षात न मिलूँ। बस ऐसे ही आभासी दुनिया में सम्वाद होता रहे। .... भौतिक शरीर के साक्षात्कार कई बार बहुत कुछ 'भंग' कर देते हैं।..
पी ओ के कहीं पडा न हो :)
इस समय तो रसूलाबद,संगम के साथ ही बलुआघट पर कितनी रौनक होगी इसकी मैं सिर्फ़ कल्पना कर रहा था कि आपकी पोस्ट पर मां के दर्शन भी हो गये।
वह भी सूर्योदय के समय।
वैसे इस समय बलुआघट के मेले की बड़ी याद आ रही है-----
हेमन्त कुमार
@अरविन्दजी ...
जहाँ तक शोध की बात है ...कार्तिक मास में तारों की छाँव में नदी के शीतल जल में स्नान करने से सर्दी से होने वाले रोग सर्दी जुखाम आदि से दूर रखने लायक प्रतिरोधक क्षमता विकसित होती है ...अब इस शहर में नदी तो नहीं है ...तो नल के ठंडे पानी से ही काम चलता है ...मगर यह अनुभव किया है की मौसम बदलते ही होने वाला सर्दी जुखाम कार्तिक मास में इतने ठंडे जल से स्नान पर भी कोई असर नहीं दिखाता ..
और कार्तिक स्नान सिर्फ स्त्रियाँ ही नहीं ...पुरुष भी कर सकते हैं ...ऐसा विधान है ...छोटी काशी कहलाये जाने वाले इस शहर में इस मास में मंदिरों में सुबह स्त्री और पुरुषों दोनों की है भारी उपस्थिति रहती है ..
आपको बहुत आभार ...दूर से ही सही इस मास में गंगाजी के दर्शन होते रहेंगे ...!!
Chetra...
baishaakha....
jaiyesht...
aashad....
saawan...
bhado....
.....
Sabhi barah mahine.
To ye shirahska kuch atpata sa laga tha :)
कार्तिक में सवेरे चार-पांच बजे से स्त्रियां घाट पर स्नान प्रारम्भ कर देती हैं।
Aur sampann wahi 10-11 baje hota hoga snan !!
How do they manage?
Snana karna nahi...
...4-5 baje uthna?
अजीब सा रहस्यबोध होता है..लगता है कि जीवन का रहस्य अभी उभर आयेगा। शब्दातीत.....
वैसे आपने झांकी अच्छी सजाई है.
सचित्र छवि
आपके ब्लॉग पर देख पाना
सुखद अनुभव है मेरे लिए ........
ना गंगा माई को ही देखा है आज तक ,
नाही दीप जलाकर
पीपल तले
उन्हें सजाकर रखतीं स्त्रियाँ ...
कार्तिक माह स्नान का
उन्हें खूब पुन्य मिले
- लावण्या
कार्तिक माह का स्नान, कतकी का मेला, यही वह सब है जो छूट गया था, यादें ताजा हो आई वो नानी का अस्सी बरस की उमर में गंगाजी जाना तड़के तड़के फिर पूजा पाठ, बरखण्ड़ेश्वर बाबा की पूजा तब कहीं जाकर चाय, चबैना।
चित्रमय झलकियों ने वहीं किले और संगम की सैर करा दी।
बहुत अच्छी पोस्ट,
सादर,
मुकेश कुमार तिवारी
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