Saturday, October 24, 2009

शिवकुटी घाट पर छठ


@gyandutt I'm reading: शिवकुटी घाट पर छठTweet this (ट्वीट करें)!

आज ब्लॉगरी के सेमीनार से लौटा तो पत्नीजी गंगा किनारे ले गयीं छठ का मनाया जाना देखने। और क्या मनमोहक दृष्य थे, यद्यपि पूजा समाप्त हो गयी थी और लोग लौटने लगे थे।

चित्र देखिये:


तट का विहंगम दृष्य:

Chhath3

घाट पर कीर्तन करती स्त्रियां:

Chhath1

घाट पर पूजा:

Chhath2 

सूप में पूजा सामग्री:

Chhath5

लौटते लोग:

Chhath4


Bookmark and Share
प्रतिक्रियायें :
 

21 महत्वपूर्ण टिप्पणियां:

Vivek Rastogi said...

वाह लाईव रिपोर्टिंग।

कल हम दादर गये थे तो भी ट्रकों में महिलाओं और बच्चों को जाते हुए देखा था, अदभुत नजारा था पर हमारे मोबाईल का कैमरा इतना अच्छा नहीं था कि हम फ़ोटो खीच पाते।

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

घाट और छठ पूजा के चित्र देख कर अच्छा लगा। मैं ने कभी छठ पूजा नहीं देखी। हो सकता है अब कोटा में भी हो रही हो। लेकिन उस का हल्ला कहीं नहीं दिखाई दिया। मैं कल्पना ही करता था कि छठ पूजा कैसी होती होगी। पर आप के चित्र और आज टीवी आदि पर देखते हुए ही पता लगा कि वे दृष्य मेरी कल्पना के चित्रों जैसे ही हैं। आखिरी चित्र नहीं दिख रहा है। लेकिन यह समस्या कुछ दिनों से देखने को मिल रही है कि पोस्टों के चित्र किसी को दिखाई देते हैं और किसी को नहीं। मेरे यहाँ नहीं दिखता औरों की उन पर टिप्पणियाँ ब्लाग में होती हैं। सम्मेलन के बारे में आप बिलकुल चुप रहे। कुछ तो बोलते, हम आप से जानना चाहते थे।

शरद कोकास said...

"आज ब्लॉगरी के सेमीनार से लौटा तो पत्नीजी गंगा किनारे ले गयीं " मैं सोच रहा हूँ कि इसके बाद छठ पूजा का वर्णन एवं इतने सुन्दर चित्र न होते तो इसका क्या अर्थ होता !!

Arvind Mishra said...

जीवन कितना तेज है -कहाँ से कहाँ पहुँच गए ज्ञान जी और हमें भी पहुंचा दिये !

राज भाटिय़ा said...

बहुत सुंदर चित्र, लेकिन हम हर पुजा के समय नदियो को क्यो गंदा करते है, यह दीप वगेरा ओर अन्य सामग्री क्या नदी मै वहा देने से ओर नदी के पानी को दुषित करने से ही भगवान खुश होते है??

Ratan Singh Shekhawat said...

बढ़िया चित्र |
दिल्ली में भी यमुना पर छट पूजा हुई है लेकिन हम वहां होने वाले जाम से निजात पाने के लिए आज काम बीच में ही छोड़कर चले आये | आपकी तरह फोटो आदि लेना भूल ही गए |हाँ अब सोमवार को ऑफिस में बिहारी बंधुओं से छट माता का प्रशाद खाने को जरुर मिल जायेगा | जय हो छट माता की |

विवेक सिंह said...

चित्र देखकर अच्छा लगा ।

संगीता पुरी said...

बहुत सुंदर चित्र हैं .. बिहार झारखंड के तालाबों , नदियों में भी छठ पूजा की सुंदरता देखते ही बनती है .. बडा पवित्र वातावरण महसूस होता है !!

P.N. Subramanian said...

छट की पूजा तो हम भी पहली बार ही देख रहे हैं. एक बात हमने गौर की. आपके विहंगम दृश्य में १००-१२५ लोग ही दिखे.

Udan Tashtari said...

दर्शन भये- धन्य भये..आपके आभारी.

सतीश पंचम said...

@ नदियों में फैली गंदगी
उन जगहों पर, उन मंदिरों में जहां बडे पैमाने पर फूल मालाएं रोजाना जमा होती हैं, वहां मैंने देखा है कि उन फूल मालाओं से खाद बना कर बेची जाती है। मुंबई का सिद्धिविनायक मंदिर यह काम बखूबी और प्रशंसात्मक ढंग से और अच्छे से करता है।

गांवों में तो लोग फूल मालाओं का कम ही इस्तेमाल करते हैं। यदि करते भी हैं तो उन सूखे फूलों को कही खेत आदि में ही फेंक देते हैं। यहां शहरों में बात थोडी अलग है। हर कालोनी में अक्सर डेली बेसिस पर फूल मालाएं देने के लिये माली नियुक्त है जो रोज फूल दे जाता है।

मैं सोचता हूँ कि शहरों में घर-दुकान में कई जगह अक्सर फूल मालायें चढती ही हैं। महीने में एक थैली भर कर सूखी मालाएं जमा हो जाती हैं।

लोग मौका निकाल कर महीने में एक दिन उसे तालाब या पानी वगैरह में फेंक आते हैं। इस भावना से कि भगवान को चढे फूल हैं इसलिये कहीं नाले वगैरह में नहीं फेंकना चाहिए।

अब यहां एक Opportunity develop हो रही है।

ऐसे में अगर कोई नया व्यवसाय अपनाए की वह केवल फूल मालाएं ही हफ्ते में हर घर से कलेक्ट करेगा और उसे लेजाकर बडी मात्रा में एक जगह इकट्ठा कर खाद आदि बनाएगा तो कैसा रहेगा ?

हर घर से यदि वह हफ्तेवार पांच रूपया भी लेता है तो महीने के बीस रूपये एक घर से बनते हैं। एक कॉलोनी से हजार रूपये महीने के तो कहीं नहीं गए। खाद बनेगी सो अलग प्रॉफिट। कलेक्शन ब्वॉय के रूप में लोगों को रोजगार मिलेगा सो अलग।


ओहो...लिजिए मैं भी उंचे उंचे सपने देखने लगा हूँ ....लगता है मुंगेरी लाल कहीं आस पास ही हैं शायद :)

Harkirat Haqeer said...

जी आज मैं भी मार्केट गयी तो देखा कुछ लोग सड़क पर पूरे रस्ते लेट लेट कर सूर्य को नमस्कार करते आगे बढ़ रहे थे मेरे लिए ये अद्भुत नजर था ...इतनी कठोर तपस्या .....?

cmpershad said...

लगता है कि इलाहाबाद ब्लाग सम्मेलन का फ़ोटो सेशन कन्टिन्यू हो रहा है:)

निशांत मिश्र - Nishant Mishra said...

बहुत लम्बे अरसे बाद शाम को एक पोस्ट का आना सुखद है.

लिछ्ले कुछ समय से छठ इतना प्रचारित हो गया है... इसे पुरबिया की अस्मिता से जोड़ के देखने लगे हैं बहुतेरे. बहुतों के लिए ये बचकाना है. हमारे एम् पी में तो यह बहुत कम होता है इसलिए इसे देखना बहुत भाता है. आखिर हमारी लोकसंस्कृति की ऐसी कितनी चीज़ें अपने शुद्ध रूप में बची रह गयी हैं?

दोपहर में बिहार के छठ मेले देख रहे थे टी वी में, हर तरफ फूहड़ बाजारू भोजपुरी गाने बजते सुनकर मन खट्टा हो गया. लोग एक दिन के लिए भी अपसंस्कृति नहीं छोड़ सकते.

Pankaj Upadhyay said...

gyaan ji, kabhi kabhi mann ko lagta ki humare reeti rivaz, paramparayen sab prakriti ke against kyun hain??

Ganga ji mein bahte diye bahut achhe lagte hain lekin agar wo dissolvable nahi hue to ganga ji ko ganda karenge...

Hum Holi mein wo kaanch mila hua rang lagate hain, diwali mein aaatishbajiyon se oxygen ko pollute kar dete hain....

kya hum sahi kar rahe hain ya yahan bhi humein badlaav ki jaroort hai? Lekin samsya bhi yahi hai ki kya hum is naye jamane mein bhi apne reeti rivajon ko badalne ka sonch sakte hain??

काजल कुमार Kajal Kumar said...

अच्छा लगा घर बैठे ही छठदर्शन हेतु आभार.

अभिषेक ओझा said...

ये रिपोर्टिंग अच्छी है. हर जगह तो ब्लॉगरी सेमिनार की ही रिपोर्टिंग चल रही है !

वाणी गीत said...

गंगा किनारे की छठ भी देख ली ..उम्मीद है सुबह के अर्ध्य की तस्वीरें भी उपलब्ध होंगी ...!!

Raviratlami said...

पर, ये तो बहत गलत बात है. हमारे इलाहाबाद में होते हुए भी आपने अकेले छठ देख ली. हमें भी दिखा देते तो थोड़ा पुण्य आपको और मिल जाता. हमें भी खयाल नहीं था नहीं तो सप्रयास देख ही लेते. चलिए, चित्रों से ही देख लेते हैं.


एक आग्रह है कि बाजू में ब्लॉग आर्काइव को सूचीबद्ध कर दें (जैसा कि रचनाकार में है) - इससे पुराने पोस्टों में नेविगेशन बेहद आसान हो जाता है.

लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्` said...

गंगा जी के घाट पर
भई संतन की भीड़
और अब छठ पूजा भी...
तस्वीरें लाजवाब हैं ज्ञान भाई साहब
- लावण्या

amit said...

वाह। :)

अब एक पोस्ट तनिक छठ के औचित्य, उसकी मान्यता और महत्व आदि पर भी ठेल दीजिए, बहुत उत्सुकता है यह जानने की कि पूर्वी उत्तरप्रदेश, झाड़खंड, बिहार आदि में मनाए जाने वाले इस त्योहार का महत्व क्या है और यह क्यों मनाया जाता है। :)

Blog Widget by LinkWithin

स्टैटकाउण्टर