Tuesday, October 27, 2009

सोंइस होने की गवाही


Dolphin_22 निषादघाट पर वे चार बैठे थे। मैने पहचाना कि उनमें से आखिरी छोर पर अवधेश हैं। अवधेश से पूछा – डाल्फिन देखी है? सोंइस

उत्तर मिला – नाहीं, आज नाहीं देखानि (नहीं आज नहीं दिखी)।

लेकिन दिखती है?

हां कालि रही (हां, कल थी)।

Gavaahaयह मेरे लिये सनसनी की बात थी। कन्फर्म करने के लिये पूछा – सोंइस?

हां, जौन पानी से उछरथ (हां, वही जो पानी से उछलती है)।

कितनी दिखी?

बहुत कम दिखाथिं। एक्के रही (बहुत कम दिखती हैं, एक ही थी)।

साथ वाले स्वीकार में मुण्डी हिला रहे थे। एक की बोली हुई और तीन की मौन गवाही कि सोंइस है, यहां गंगा में, शिवकुटी, प्रयागराज में। मुझे बहुत खुशी हुई। कभी मैं भी देख पाऊंगा। बचपन में देखी थी।

snakesमुझे प्रसन्नता इसलिये है कि सोंइस होने से यह प्रमाण मिलता है कि ईको-सिस्टम अभी बरबाद नहीं हुआ है। गंगामाई की जीवविविधता अभी भी बरकरार है - आदमी के सभी कुयत्नों के बावजूद! सोंइस स्तनपायी है और श्वांस लेने के लिये रेगुलर इण्टरवल पर पानी के ऊपर आती है। कभी कभी शाम के अन्धेरे में जब सब कुछ शांत होता है तो दूर छपाक - छपाक की ध्वनि आती है गंगा तट पर - शायद वह गांगेय डॉल्फिन ही हो!  

मुझे तीन-चार पानी के सांपों का परिवार भी किनारे तैरते दिखा। मेरा कैमरा उन्हे ठीक से कवर नहीं कर पाया। पर सवेरे सवेरे वह देखना मुझे प्रसन्न कर गया।

और यह गार्जियन का लिंक मुझे शाम के समय पता चला जो बताता है कि चीन की यांग्त्सी नदी में डॉल्फिन सन २००२ के बाद नहीं दिखी। अब यह माना जा सकता है कि मछली पकड़ने, बांध/डैम बनने और नदी में गाद भरने के फल स्वरूप यह विलुप्त हो गयी। पानी के मटमैला होने से यह लगभग अंधी पहले ही हो गयी थी। गंगा में डॉल्फिन बची है, यह प्रसन्नता की बात है न?

आप पता नहीं पहले पैराग्राफ के मेरी पोस्ट के लिंक पर जाते हैं या नहीं, मैं अपनी पुरानी पोस्ट नीचे प्रस्तुत कर देता हूं।


सोंइस

(नवम्बर 13' 2008)

Map picture

कल पहाड़ों के बारे में पढ़ा तो बरबस मुझे अपने बचपन की गंगा जी याद आ गयीं। कनिगड़ा के घाट (मेरे गांव के नजदीक का घाट) पर गंगाजी में बहुत पानी होता था और उसमें काले – भूरे रंग की सोंइस छप्प – छप्प करती थीं। लोगों के पास नहीं आती थीं। पर होती बहुत थीं। हम बच्चों के लिये बड़ा कौतूहल हुआ करती थीं।

मुझे अब भी याद है कि चार साल का रहा होऊंगा – जब मुझे तेज बुखार आया था; और उस समय दिमाग में ढेरों सोंइस तैर रही थीं। बहुत छुटपन की कोई कोई याद बहुत स्पष्ट होती है।

Photobucket
सोंइस/डॉल्फिन

अब गंगा में पानी ही नहीं बचा।

पता चला है कि बंगलादेश में मेघना, पद्मा, जमुना, कर्नफूली और संगू  (गंगा की डिस्ट्रीब्यूटरी) नदियों में ये अब भी हैं, यद्यपि समाप्तप्राय हैं। हजार डेढ़ हजार बची होंगी। बंगला में इन्हें शिशुक कहा जाता है। वहां इनका शिकार इनके अन्दर की चर्बी के तेल के लिये किया जाता है।

मीठे पानी की ये सोंइस (डॉल्फिन) प्रयाग के परिवेश से तो शायद गंगा के पानी घट जाने से समाप्त हो गयीं। मुझे नहीं लगता कि यहां इनका शिकार किया जाता रहा होगा। गंगा के पानी की स्वच्छता कम होने से भी शायद फर्क पड़ा हो। मैने अपने जान पहचान वालों से पूछा तो सबको अपने बचपन में देखी सोंइस ही याद है। मेरी पत्नी जी को तो वह भी याद नहीं।

सोंइस, तुम नहीं रही मेरे परिवेश में। पर तुम मेरी स्मृति में रहोगी। 


30 Comments so far:

eSwami said...

बहुत सुंदर जीव होती है डॉल्फ़िन्स!
केलिफ़ोर्निया के कई तटों पर बडे आकार और झुंड मे दर्शन देती हैं.

Udan Tashtari said...

सोंइस का फोटू लग जाये किसी तरह तो गंगा घाट की सोंइस भी देख ली जाये.

कल से जरा उन चारों के बीच थोड़ा ज्यादा देर बैठिये. :)

M VERMA said...

सोंइस देखने का अनुभव मुझे भी रहा है. मै वाराणसी के दशाश्वमेध घाट पर यूँ ही भ्रमण कर रहा था कि गंगा के मध्य धारा मे भूरे रंग की आकृति उभरी और पलांश मे लुप्त भी हो गयी. लोगो ने बताया कि यह सोंइस था.

श्रीश पाठक 'प्रखर' said...

एक साथ कई भाव रोप दिए हैं इस चिट्ठे में...पुराने लिंक पर जाते है जी,,,टिप्पणियां नहीं कर पाते हैं....:)

प्रवीण शर्मा said...

Jagran ke 2 din purane article ka link hai isame abhi ganaga me dolphin dikhane ka jikra kiya gaya hai.

http://in.jagran.yahoo.com/news/travel/general/16_36_427.html

प्रवीण शर्मा said...

ek aur link
http://timesofindia.indiatimes.com/city/kolkata-/Swiss-explorer-on-Ganga-voyage/articleshow/5140174.cms

Arvind Mishra said...

ऐसे ही गंगा तट पर निर्जन निर्द्वंद घूमते रहे तो तो कोई गांगेय लोचनेस मान्स्टर भी कभी मिल जायेगा !
अब यह हमारा राष्ट्रीय जलजन्तु है !

Ratan Singh Shekhawat said...

उम्मीद है हमें जल्द ही गंगई डोल्फिन का चित्र यहाँ देखने को मिलेगा |

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

काश ये जन्तु आम तौर पर दिखाई देने लगे। गंगा जीवन्त हो उठे।

वाणी गीत said...

क्या सचमुच डालफिन दिखती है
निषाद घाट पर ...!!

कुश said...

कल डिस्कवरी चैनल वाले आपका नंबर मांग रहे थे.. दे दू क्या ?

Dhiraj Shah said...

डाल्फिनो का गंगा से कम होना एक दुखद धटना है।

दर्पण साह "दर्शन" said...

मुझे प्रसन्नता इसलिये है कि सोंइस होने से यह प्रमाण मिलता है कि ईको-सिस्टम अभी बरबाद नहीं हुआ है।

..hummmm !!

Dil ko Khush rakhne ko Ghalib ye khayal accha hai !!

P.N. Subramanian said...

सुना है इन्हें संरक्षित किया जा रहा है.गोवा में जहाँ मंडोवी नदी समुद्र से मिलती है, उस क्षेत्र में ढेरों दीखते हैं. अब ये फ्रेश वाटर वाले हैं या नहीं पता नहीं है.

Anil Pusadkar said...

राष्ट्रीय जलज्न्तु आपको ज़ल्द नज़र आये और उसके व पर्यावरण के संरक्षण के लिये आपकी चिंता जायज है।पता नही कैसे और कब हमने खुस ही अपना कुदरती खज़ाना लूट लिया।

Murari Pareek said...

ज्ञान दत्त जी आपकी गंगा में आपको डालफिन दिखे यही कामना करता हूँ | केमरा तो आप हमेशा साथ रखते है कभी आपको फोटो भी मिल जाए और हम भी गंगे में डालफिन देख पायें !!!

परमजीत बाली said...

हमारे लिए तो यह सोच ही रोमांचित करने वाली है।....आप सही भ्रमण का मजा उठा रहे हैं और हमारे लिए भी बढिया पोस्ट रच रहे हैं।आभार।

अभिषेक ओझा said...

मैं सोच रहा था कि ब्लॉग पढना इंसान को कितना बदलता है. ४ दिन के लिए घर जा रहा हूँ. और एक दिन तो गंगा किनारे जाने का प्लान है ही. देखता हूँ शायद मुझे भी दिख जाय ! मुझे लगता है कि अब कुछ ज्यादा लोगों से बात कर पाऊंगा मैं...

जी.के. अवधिया said...

कलुषहारिणी गंगा में तो डॉल्फिन देखने का सौभाग्य नहीं मिला है हमें पर हमने इस जीव को चिल्का झील में अवश्य देखा है।

राकेश 'सोऽहं' said...

जी, शायद वह शायद वह गांगेय डॉल्फिन ही हो! अब इस प्रदूषण में और क्या संभव है ?

डॉ .अनुराग said...

कुदरत ने अपने जुगाड़ बहुत पहले से कर रखे है इको सिस्टम के ....ये तो इन्सान है जिसने इसमें पैबंद लगा दिए है ...

विवेक सिंह said...

अतिसुन्दर!

राज भाटिय़ा said...

डाल्फिनो का गंगा से कम होने के कई कारण हो सकते है, गंगा का पानी हद से ज्यादा गंदा होना ( जो एक सच है) ओर फ़िर लोग भी इस का शिकार करते होगे... शेर बाघ हम ने खत्म कर दिये हिरन भी मार भगाये ओर यह डाल्फ़िनो का ना भी लग गया....
वेसे आप का यह गंगा घाट एक दिन जरुर देखने आना पडेगा, बहुत सुंदर लिखा आप ने

Aflatoon said...

तट से देखने पर लगता था गंगाजी के भीतर से भिश्ती मसक पानी की सतह पर निकला, फिर डूब गया | हांलाकि अब भिश्ती भी नहीं हैं | मालवीय पुल (अंग्रेजों का डफरिन ब्रिज ) पर से जब दिखातीं तब उसका नन्ही डालफिन का रूप दीखता था |

मुकेश कुमार तिवारी said...

आदरणीय ज्ञानदत्त जी,

विषय कैसा भी क्लीष्ट क्यों ना हो आपकी लेखनी का प्रवाह सुगम बना देता है। तस्वीरें तो जैसे अपनी जबानी खुद ही कह देती हैं।

पनैले सांप देखने में बहुत ही सुखद लगा कि गंगा मईया इतने प्रदूषण के बाद भी दैवीय शक्तियाँ बचाये हुये हैं कि जल-जन्तु बने रहें और वो अपनी ओर से प्राकृतिक संतुलन बनाये रखने के प्रयास कर सकें।

सादर,


मुकेश कुमार तिवारी

cmpershad said...

डाल्फ़िन.. गंगा में...सुखद आश्चर्य:)

dhiru singh {धीरू सिंह} said...

संगम स्नान के लिए गए तब गंगा जी यमुना जी बाढ़ पर थी . नावं से लौटने पर धार काटने में घंटा भर लगा . वहीँ पर गंगा डोल्फिन अपनी मस्ती में उछल रही थी और हम डर रहे थे कहीं नाव के नीचे से उछली तो हम तो गए काम से . नाव बाले ने हमारे डर का बहुत मजाक बनाया . तट पर पहुचते ही नाव वाले से मजाक में कहा अब डर हमसे ,क्योकि मेरे हाथ में रिवाल्वर थी उस समय

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

वैसे तो आपकी सभी पोस्ट अच्छी होती हैं (कहने की ज़रुरत है क्या?) मगर यह वाली पढ़कर कलेजे को विशेष ठंडक पहुँची. यह जानकार खुशी हुई कि सांइस अभी भी हैं और (शायद) उन्हें बचाया जा सकता है.

गिरिजेश राव said...

आँखें भर आईं, जाने क्यों !
आज की पोस्ट कल पढ़ेंगे।

amit said...

ऐसा पढ़ा है कि जिस प्रकार कुकुरों को मनुष्य से खासा लगाव होता है (किसी अन्य जीव के मुकाबले) उसी प्रकार डॉल्फिनों को भी मनुष्य से लगाव होता है।

गंगा में अभी भी हैं यह वाकई सुखद समाचार है लेकिन कब तक रहेंगी इसकी आशंका बरकरार है! :(