Tuesday, October 13, 2009

रेत, वैतरणी नाला और बन्दर पांड़े


@gyandutt I'm reading: रेत, वैतरणी नाला और बन्दर पांड़ेTweet this (ट्वीट करें)!

Monkey कभी कभी गठी हुई पोस्ट नहीं निकलती सवेरे की गंगा किनारे की सैर में। या फिर सन के रेशे होते हैं पर आपका मन नहीं होता उसमें से रस्सी बुनने का। पर सन के रेशों की क्वालिटी बहुत बढ़िया होती है और आप यूं ही फैंक नही सकते उन रेशों को।

सो बनती है गड्डमड्ड पोस्ट – जैसे कि यह!


सबेरे सबेरे बन्दर पांड़े दिखे पड़ोस की सुकुलाइन की मुंड़ेर पर। कल रात उनके किरायेदार की बीवी को काट लिया था। उसके बाद कल्लू के बाप को खौंखिया रहा था। कल्लू और उसके निठल्ले दोस्तों ने दौड़ाया तो गायब हो गया। आज सवेरे फिर हाजिर! बन्दर पांड़े इज अ बिग मिनास फॉर सिविलाइज्ड (?) सोसाइटी!

Vaitaraniवैसे बन्दर पांड़े अपनी प्रजाति के परित्यक्त हैं - आउटकास्ट। उनकी प्रजाति का एक झुण्ड आया था और उनकी धुनाई कर चला गया। उनसे बचने को छिपते फिर रहे थे!

« खैर, गंगा तट पर देखा कि वैतरणी नाला (मेरा अपना गढ़ा नाम) – जो शिवकुटी-गोविन्दपुरी का जल-मल गंगा में ठेलता है; अपने वेग और आकार में सिकुड़ रहा है। पहले इसका गंगाजी में बाकायदा संगम होता था निषादघाट के समीप।


पर अब वह गंगाजी में मिलने से पहले ही समाप्त हो जा रहा है।

अब उसका पानी रेत में से छ्न कर गंगा में जा रहा होगा। वैतरणी नाला वैसे भी घरों का सीवेज ले जाता था, किसी फैक्टरी का केमिकल वेस्ट नहीं। फिर भी अच्छा लगा कि उसका गंगा-संगम अवरुद्ध हो गया है। »

माल्या प्वॉइण्ट (वह स्थान जहां गुड़ की शराब बनाने के प्लास्टिक के जरीकेन रेत में दबाये गये हैं) के पास मैं बैठ गया। रेत दोनो हाथ में ले कर धीरे धीरे गिराना अच्छा लगता है। रेत की कमी नहीं, फिर भर लो – फिर गिराओ! पुनरपि जननं, पुनरपि मरणं! पुनर्जन्म के सिद्धान्त का प्रेक्टीकल। मेरी पत्नी प्रयोग करते मेरा फोटो लेती हैं।Sand

Monkey2 « वापसी में देखा कि बन्दर पांड़े मेरे दरवाजे पर विराजमान हैं। चाहते नहीं कि घर में घुसें हम। खौंखियाते आगे बढ़े बन्दर पांड़े। टिपिकल इलाहाबादी चरित्र – दूसके के मकान पर जबरी कब्जा करने की मनोवृत्ति। मदार की एक संटी तोड़ उन्हे धमकाना पड़ा। हमारा बन्दर, हम से ही खोंखों! अब भरतलाल इन्हें दूध रोटी दे कर तो देखे!

जय हो पोस्ट लेंथ का ठेलन हो गया!

Vaitarani Nala[ मैने कहा कि वैतरणी नाला अब गंगा में नहीं मिलता, पर वह परिदृष्य बदल गया। कल से गंगा में जल बहुत बढ़ा। तट पर कटान भी बढ़ी। सारे उभरे द्वीप बिला गये। वैतरणी नाला अब गंगा से पुन: संगमित हो गया। दायें बाजू के चित्र में नावें गंगा किनारे पार्क की गई हैं और वैतरणी नाले का जल उनको स्पर्श कर रहा है।

शाम के समय तो और पता चला – सवेरे स्नान को इकठ्ठी स्त्रियों के नीचे से जमीन धसक कर पानी में चली गई थी। कठिनाई से बच पाईं! शाम को पानी बढ़ रहा था। किनारे की रेत छप्प-छप्प कर कट रही थी। अंधेरे में मैं और मेरी पत्नीजी खड़े थे और गंगामाई का उद्वेलन अजीब सा लग रहा था – उनके सामान्य व्यवहार से अलग!]

अपडेट आज सवेरे सात बजे -

सवेरे छ बजे दृष्य और भी खतरनाक था। गंगाजी तेजी से किनारा काटती जा रही थीं। हल्की धुन्ध थी। स्त्रियां जो सामान्यत: १५-२० होती थीं, आज मात्र एक दो दिख रही थीं। आदमी भी भयावहता की बात कर रहे थे। एक सज्जन बोले – जब मनई गंगा जी पर अत्याचार कर रहा है, तब वे भी तो कर सकती हैं।
यह रहा कटान का ताजा वीडियो -


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प्रतिक्रियायें :
 

26 महत्वपूर्ण टिप्पणियां:

Udan Tashtari said...

तट पर रहते रहते कितने अनुभवी हो गये हैं आप गंगा माई के व्यवहार को समझ लेने के लिए..ठेलते चलें. :)

हिमांशु । Himanshu said...

सुबह-सवेरे रेत के बहाने दार्शनिक सत्य का परीक्षण !

आपके बंदर पाँडे का नाम भी लेना पड़ा सुबह-सवेरे ही । आभार ।

Arvind Mishra said...

वो निराला की कविता कौन सी थी -रेत सा तन ढह गया -याद नहीं आ रही सवेरे सवेरे !

सतीश पंचम said...

बंदर पाण्डे को धीरे से कहिये कि उसे शांति के लिये Nobel Prize मिलने की घोषणा की गई है

तब शायद बंदर पाण्डे उधम रोकते हुए खुद ही कह बैठें

- अरे मुझे तो पता ही नहीं था कि मैं इस लायक भी हूँ ! :)

संगीता पुरी said...

सन के रेशों की क्वालिटी बहुत बढ़िया होती है और आप यूं ही फैंक नही सकते उन रेशों को
कुछ ही दिनों में एक पुस्‍तक का रूप ले लेंगे ये रेशे .. काफी महत्‍वपूर्ण हैं ये !!

सतीश सक्सेना said...

कैसे कैसे काम करते हो आप भी ? समय कैसे मिलता है महाराज !

प्रवीण पाण्डेय said...

रेत में प्रवाह है । पड़ोसी है जल, उसमें भी प्रवाह है । पर साथ साथ रहते हैं तो जड़ हो जाते हैं !

Udan Tashtari said...

कहते हैं कि ब्न्दर पाण्डॆ क सुबह नाम ले लो..तो खाना नसीब नहीं होता..यह मिथ तोड़ खबर दिजिये जरा.

Ratan Singh Shekhawat said...

रेत में खेलती तस्वीर ने तो गांव का बचपन याद करा दिया , क्या मजा आता था बालू रेत के टिल्लों पर लुढ़कर खेलने का ! बचपन का कोई एसा दिन नहीं बिता होगा जब रेत में लोटकर ना खेलें हो !
वैतरणी नाले का गंगा में संगम ना होना सुखद समाचार लगा |

Udan Tashtari said...

बहुत सूक्ष्म और आजतकनुमा एक्स्क्लूसिव रिपोर्टिंग है जनाब!! रिपोर्टर ऑफ द ईयर.

वाणी गीत said...

सन के रेशे आकृतियाँ लेते हुए एक दिन पुस्तक का रूप लेंगे ...संगीताजी से सहमत ...बहुत शुभकामनायें ..!

ज्ञानदत्त पाण्डेय| Gyandutt Pandey said...

@ उड़न तश्तरी > कहते हैं कि ब्न्दर पाण्डॆ क सुबह नाम ले लो..तो खाना नसीब नहीं होता..यह मिथ तोड़ खबर दिजिये जरा.
---------
नाश्ता कर लिया है। दफ्तर निकलने की तैयारी है और टिफिन भी तैयार है! :)

ताऊ रामपुरिया said...

टूट गया जी. हमने आज छुट्टी के दिन यह पोस्ट पढनी शुरु की और दर्शन करते ही घरवाली ने गर्मा गर्म जलेबी टेबल पर रख दी हैं और हमने खाना भी शुरु कर दिया है.:) आप तो ऐसे दर्शन रोज रोज
करवाईयेगा.

रामराम.

संजय बेंगाणी said...

हमेशा की भाँती पढ़ लिया है. लत लग गई है. टिप्पणी समझ नहीं आ रही क्या करें...

डॉ .अनुराग said...

माल्या पॉइंट इतना खुला है की कोई भी इस्तेमाल कर सकता है ?उसके पास बैठकर ही थोडा सरूर आ गया होगा जो बन्दर पांडे से भिड़ने चल दिए आप.....अब इलाहाबादी चरित्र पूरे देश में फ़ैल गया है ....

Anil Pusadkar said...

गड्डमड्ड इतनी सुघड़ है तो गठी हुई कैसी होगी?

अभिषेक ओझा said...

रेत में बैठे हुए आपकी तस्वीर अच्छी है. बिलकुल जमीन से जुड़े हुए :)

बन्दर पांडे की दूध-रोटी बंद तो नहीं हुई?

ज्ञानदत्त पाण्डेय| Gyandutt Pandey said...

@ अभिषेक ओझा - बन्दर पांड़े गायब हैं। शान्ति (महरी) का झोला छीनने की कोशिश कर रहे थे। उसमें उसको बुरी तरह काट भी खाये।
फिर भी उनके लिये रोटी रखी जाती है, पर दिख ही नहीं रहे। दिवाली आने वाली है। पटाखे की आवाज से वैसे ही कहीं दूर चले जायेंगे!

महेन्द्र मिश्र said...

गोलू पांडे तो लगता है पडोसी पर फ़िदा है ...... गंगा नदी में जिस तरह नाले का मिलाप हो रहा है उसी तरह माँ नर्मदा भी इसे नालो से प्रदूषित हो रही है .

dhiru singh {धीरू सिंह} said...

क्या अब संशोधन करना पड़ेगा वानर कुत्ता हाथी नहीं जाति के साथी , वानर की जगह वामन लगता था . और यह बंदर पांडे नहीं लगता आदते तो बंदर सिंह सी लग रही है .

राज भाटिय़ा said...

अजी अगर पुलिस ने देख लिया कि आप रेत पर बेठे बठे हाथो से बार बार उठा रहे है तो किसी शक मै ना धरे जाओ...
स्त्रियां जो सामान्यत: १५-२० होती थीं, आज मात्र एक दो दिख रही थीं। अरे बाकी कहां गई... कही डुब ...
राम राम

चंदन कुमार झा said...

इ बंदर पाण्डे जी का केरेक्टर बहुत अच्छा लगा । और यह जिन्दगी भी रेत की तरह ही तो है ।

पुनीत ओमर said...

श्रीमान बन्दर को पांडे कहने के पीछे कोई ख़ास मंशा है या फिर यूँही..?

इष्ट देव सांकृत्यायन said...

वैसे बन्दर पांड़े अपनी प्रजाति के परित्यक्त हैं - आउटकास्ट। उनकी प्रजाति का एक झुण्ड आया था और उनकी धुनाई कर चला गया। उनसे बचने को छिपते फिर रहे थे!

निश्चित रूप से आपके बन्दर पांड़े अपनी बिरादरी में कुछ ऊंच-नीच करके आए हैं. उनको समझाइए कि यहां आ गए तो शरीफ़ हो जाएं, जैसे नवाज शरीफ़ या जाफर शरीफ टाइप के लोग हैं.

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

"हमारा बन्दर, हम से ही खोंखों!"
मुहावरा पसंद आया. कहीं आप साहित्य का नोबल पाने के प्रयास में तो नहीं हैं? सुना है उसके लिए ज्ञानपीठ से कम राजनीति से ही काम चल जाता है. अलबत्ता देश-विदेश की नेट्वर्किंग चाहिए, सो तो है ही आपके पास ब्लॉग-बाबा की कृपा से.

amit said...

बंदर पांडे की तो छोड़िए यह बताया जाए कि रेत में खेलना कैसा लगा? मुट्ठी से रेत जब फिसलती है तो कुछ अजीब सा लगता है अपने को तो। :)

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