Sunday, October 18, 2009

उत्क्रमित प्रव्रजन


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मेरा वाहन चालक यहां से एक-सवा घण्टे की दूरी से सवेरे अपने गांव से आता है। देर रात को वापस लौटता है। लगता है अगर काम उसको जम जायेगा तो यहीं इलाहाबाद में डेरा जमायेगा। वह प्रथम पीढ़ी का प्रव्रजक होगा। इस शहर में और अन्य शहरों में भी पिछले पचीस तीस साल में गांवों से आये लोगों की तादाद तेजी से बढ़ी है। यद्यपि भारत अभी भी गांवों का देश है, पर जल्दी ही आधी से ज्यादा आबादी शहरी हो जायेगी।

My abode1एक योगी का आश्रम है, उस गांव के पास। बहुत सम्भव है कि मुझे एक नये (आध्यात्मिक) क्षेत्र की ओर रुंझान मिले उस गांव में रहने से। पर वह क्या एक महत्वपूर्ण कारण हो सकता है उत्क्रमित प्रव्रजन का?! एक प्रमादग्रस्त 28 BMI की काया बिना बेसिक मेटीरियल कम्फर्ट के स्पिरिचुअल डेवलेपमेण्ट कर सकती है। कितने का सट्टा लगायेंगे आप? :-)

गांवों से शहरों की ओर तेजी से आ रहे हैं लोग। होमो अर्बेनिस (Homo Urbanis) एक बड़ी प्रजाति बन रही है। पर हमारे शहर उसके लिये तैयार नहीं दीखते।

शहर के शहरीपन से उच्चाटन के साथ मैने उत्क्रमित प्रव्रजन (Reverse Migration) की सोची। इलाहाबाद-वाराणसी हाईवे पर पड़ते एक गांव में बसने की। वहां मैं ज्यादा जमीन ले सकता हूं। ज्यादा स्वच्छ वातावरण होगा। पर मैं देखता हूं कि उत्क्रमित प्रव्रजन के मामले दीखते नहीं। लगता है कहीं सारा विचार ही शेखचिल्ली के स्वप्न देखने जैसा न हो।

कुछ सीधे सीधे घाटे हैं गांव के – बिजली की उपलब्धता अच्छी नहीं और वैकल्पिक बिजली के साधन बहुत मंहगे साबित होते हैं। कानून और व्यवस्था की दशा शहरों की अपेक्षा उत्तरप्रदेश के गांवों में निश्चय ही खराब है। गांवों का जातिगत और राजनीतिगत इतना ध्रुवीकरण है कि निस्पृह भाव से वहां नहीं रहा जा सकता!

फिर भी लोग गांव में बसने की सोचते होंगे? शायद हां। शायद नहीं।


उत्क्रमित नाव खेवन:

रोज सवेरे गंगा की धारा के विपरीत नायलोन की डोरी से बांध एक दो आदमी नाव खीचते ले जाते हैं। आज नाव खाली थी और एक ही व्यक्ति खींच रहा था। मैने पूछा – कहां ले जाते हो रोज नाव। चलते चलते ही वह बोला – ये धूमनगंज थाने पर जाती है।

धूमनगंज थाने पर जाती इस नाव का उत्क्रमित खेवन देखें 6 सेकेण्ड के इस वीडियो में:


34 Comments so far:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

यह दिया है ज्ञान का, जलता रहेगा।
युग सदा विज्ञान का, चलता रहेगा।।
रोशनी से इस धरा को जगमगाएँ!
दीप-उत्सव पर बहुत शुभ-कामनाएँ!!

वाणी गीत said...

गांवों का जातिगत और राजनीतिगत इतना ध्रुवीकरण है कि निस्पृह भाव से वहां नहीं रहा जा सकता!
और ये हाल तब है जबकि गाँव के लोग सीधे सच्चे ईमानदार होते हैं ...हाँ ...शायद तभी इन्हें हांकना इतना आसान होता है ....
शुभ दीपावली ...!!

गिरिजेश राव said...

एकदम तैयारी कीजिए। सोलर पॉवर अब महंगा नहीं है। बैटरी वगैरह की भी देखभाल हो जाती है। मोबाइल कनेक्सन तो हर जगह उपलब्ध है। उस वक्त तक तीव्र गति नेट भी गाँव में उपलब्ध हो जाएगा।
..
गाँवों में ध्रुवीकरण तो हमेशा से रहा है। कोई नई बात थोड़े है। आप का आश्रम ध्रुवीकरण का एक नया केन्द्र होगा, यह क्यों नहीं सोचते। सत्ता और प्रभाव का आधुनिक केन्द्र - महंत चचा की कुटी। यहाँ इंटरनेट से लेकर अल्ल सुबह दार्शनिक चर्चा की सुविधा उपलब्ध है। साहित्यकार लोग दूर रहें....
वाणी गीत जी को बताइए कि गँवार कितना सीधा होत है !
_____________
आपात कारणों से कहीं 5 बजे ही जाना था। कल ही ड्राइवर से सब सेट कर लिया था। भाई साहब अब तक नहीं आए। मोबाइल ऑफ कर परुआ मना रहे हैं। शायद गाँव से आते हैं ;) पूछने पर इतना सुन्दर बहाना मारेंगे कि आप मुग्ध हो जाएँगे।
लखनऊ काहिलों की धरती है जिसका प्रभाव आस पास के गाँवों तक है। प्रयाग की क्या स्थिति है?

ab inconvenienti said...

कुछ सोलर पैनल, एक बड़ा लोन्ग बैकअप इंवार्टर लाख से दो लाख के बीच मिल जाएँगे. एक इंजीनियर इंवार्टर का थोड़ा बहुत मैंटेनेंस-रिपेयर आसानी से सीख सकता है. सॉफ पानी के लिए एकवगार्ड और जोड़ लें. बस इंटरनेट नहीं मिलेगा. पर आराम के लिए इतनी कीमत चुकाई जा सकती है, थोड़ा व्यस्त रहना चाहें तो किसी पर्यावरण, सामाजिक, ग्रामीण, प्रशिक्षण, रोज़गार संबंधी एनजीओ को अपनी शिक्षा और परामर्श का लाभ दे सकते हैं उसके सदस्य बनकर.

ePandit said...

हमने भी कभी उत्क्रमित प्रवजन का स्वपन देखा था कि उत्तराँचल में नौकरी लगी तो अपने गाँव वापस चले जाएँगे पर यह स्वपन अधूरा ही रह गया।

Ratan Singh Shekhawat said...

गांवों में सिर्फ थोडी बिजली की कमी ही दिक्कत पैदा करती है बाकि गांव में आजकल सभी सुविधाएँ उपलब्ध है और जो कुछ कमी है वह पास के शहर से पूरी की जा सकती है | जातिगत धुर्विकरण भी गांव में कितना भी क्यों न हो इज्जत सबको शहर से बढ़िया मिलती है | मेरी निगाह में तो गांव में रहने का मजा ही निराला है | मै तो गांव की प्रष्ट भूमि का आदमी हूँ रिटायर्मेंट लेने के बाद सीधा गांव जा कर ही रहूँगा | सुविधा के लिए दो डेस्कटॉप रखूँगा एक खेत वाले घर में और एक गांव की हवेली में | वही से बैठकर इत्मिनान से ब्लॉग लिखा करूँगा |

वाणी गीत जी आजकल गांव के लोग जितना आप समझते है उतने सीधे नहीं होते शहर से वापस गांव में जाकर बसने और उन्हें गंवार समझ हांकने वाले को गांव वाले एसा हांकते है कि वह अपना सारा शहरी ज्ञान भूल जाता है |

अनूप शुक्ल said...

सुबह-सुबह गांव की याद। जय हो। सोचने में जाता क्या है। एक पोस्ट निकल आती है।

प्रवीण पाण्डेय said...

बड़े नगर में ऊँचे मूल्य पर मकान लेने से अच्छा है कि आबादी से १०-१२ किमी दूर डेरा बसाया जाये । शहर की (कु)व्यवस्थाओं पर आश्रित रहने की अपेक्षा कम सुविधाओं में रहना सीखा जाये । यदि ध्यान दिया जाये तो सुविधायें भी कम नहीं हैं ।
१. नगर के बाहर भूमि लेने से लगभग ६-७ लाख रु का लाभ होगा । इसका एक वाहन ले लें । यदाकदा जब भी खरीददारी करने नगर जाना हो तो अपने वाहन का उपयोग करें ।
२. मकान में एक तल लगभग आधा भूमितल के अन्दर रखें । भूमि के १० फीट अन्दर ५ डिग्री का सुविधाजनक तापमान अन्तर रहता है जिससे बिजली की आवश्यकता कम हो जाती है । सीपेज की समस्या को इन्सुलेशन के द्वारा दूर किया जा सकता है ।
३. प्रथम तल में पु्राने घरों की तरह आँगन रखें । प्रकाश हमेशा बना रहेगा । यदि खुला रखना सम्भव न हो तो प्रकाश के लिये छ्त पारदर्शी बनवायें ।
४. एक कुआँ बनवायें । पानी पीने के लिये थोड़ा श्रम आवश्यक है ।
५. सोलर ऊर्जा पर निर्भरता कभी भी दुखदायी नहीं रहेगी । तकनीक बहुत ही विकसित हो चुकी है । यदि एक विंड पैनेल लगवाया जा सके तो आनन्द ही आ जाये ।
६. एक गाय अवश्य पालें । गायपालन एक पूरी अर्थव्यवस्था है ।
७. इण्टरनेट के बारे में निश्चिन्त रहें । डाटाकार्ड से कम से कम नेशनल हाईवे में आपको कोई समस्या नहीं आयेगी और आपका सारा कार्य हो जायेगा ।
८. स्वच्छ वातावरण के लिये पेड़ ही पेड़ लगायें । नीम के भी लगायें ।
९. निर्लिप्त भाव से साहित्य सृजन करें । हिन्दी की प्रगति होगी ।
१०. वहाँ के समाज को आपका आगमन एक चिर प्रतीक्षित स्वप्न के साकार होने जैसा होगा ।
११. अगल बगल कुछ प्लॉट रोक कर रखें । बहुत से लोग जल्दी ही टपकेंगे ।

P.N. Subramanian said...

आश्रम का आईडिया जोरदार है. शत प्रतिशत सफलता की गेरेंटी

हिमांशु । Himanshu said...

प्रवीण जी ने पूरा खाका ही खींच दिया है प्रवास का/आश्रम का । मुझे खूब आकर्षित कर रहा है ।

आकर्षित तो आपकी प्रविष्टि ने भी किया-शीर्षक से ही - ’उत्क्रमित प्रवजन’ ।

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

वाकई सोचने में कुछ भी नहीं जाता। सोचते तो हम भी हैं। पर फिर लगता है संभव नहीं है। वैसे भी नगर से 10 -12 किलोमीटर की परिधि में ही जाना हो तो कोई बात नहीं कुछ दिन बाद वह स्थान नगर का ही हिस्सा होगा।
दीपावली की शुभकामनाएँ!

rajiv said...

Homo Urbanis ban rahe hain is bare me to sure nahi hun lekin Homo Barbaris (Kameene , kayaiyan , kutil) ik prajati teji se fail rahi hai. Aur itani klisht hindi to aapke blog ko kisi sarkari anubhag ke up prkosht ke anusoochi ke avashisht prakhand me daal degi.

श्रीश पाठक 'प्रखर' said...

प्रवीण जी ने तो खुश कर दिया, ज्ञान जी ने सपने जगाये और प्रवीण जी ने गजब का ब्लूप्रिंट भी दिखा दिया....अब तो बस....

जी.के. अवधिया said...

वास्तव में बड़ी संख्या में गाँव के लोग शहर की ओर पलायन कर रहे हैं। यह एक गम्भीर समस्या है।

लक्ष्मीपूजन तो कल हो चुका, चलिए आज दीपावली मनाएँ।

परमजीत बाली said...

प्रवीण पांडे जी ने अच्छे सुझाव दिए हैं।वैसे गाँव मे रहने की अपनी इच्छा भी है।

समयचक्र - महेंद्र मिश्र said...

दीपावली पर्व की हार्दिक शुभकामनाये आपको और आपके परिवाजनों को ....

dhiru singh {धीरू सिंह} said...

अपनी जड़ो में लौटना किसे अच्छा नहीं लगेगा . लेकिन यह व्यावहारिक नहीं है . यह पागलपन के शिकार हम भी हो चुके है . गाँव में बसने के लिए अच्छा खासा मकान बनवाया खेती के लिए लाखो रु खर्च करे लेकिन हम तो फेल हो गए . मन करता है सब बेच के मुक्त हो तो बेहतर होगा .
@ प्रवीन जी , दूर के ढोल सुहावने होते है

दर्पण साह "दर्शन" said...

Yani "Mc'dee ke burgur" aur "Gau Gober" dono hi kaaafi nazdik aa jaiyenge...
M LOVIN IT !!

...Generation 'y' ko generation 'Gai' banne ka accha idea hai....

दर्पण साह "दर्शन" said...

AAJ POST SE ZAYADA PRAVEEN JI KI TIPPANI PRABHAVIT KAR GAYI !!

राज भाटिय़ा said...

बहुत सुंदर विचार, ऎसा ही विचार अहि मेरा भी, मै जब तक भारत मै रहा महा नगरो मे ही रहा, यहा आते ही गांव मै रहना पडा, गांव मै लाभ बहुत है, लेकिन भारत मै बस एक डर है कि आप जब गांव मै या गांव के आसपास मकान लेते है तो सुरक्षा कम होती है, लेकिन्शहरो मे भी कहा है सुरक्षा, अगर मै भारत मै आ कर रहा तो जरुर किसी गांव मै ही डेरा जमे गा, ्दुध घर का, सब्जियांघर की, क्योकि मुझे बहुत शोक है बाग बाणी का.आगे राम जाने

HEY PRABHU YEH TERA PATH said...

गाव बनाम शहर! विषय बडा ही तार्किक है- इस पर व्यवहारिक कठीनाऎ है. चुकी मुम्बई शहर इस समस्या से झुज रहा है हजारो व्यक्ति रोजाना रोजगार वास्ते बडे शहरो की तरफ़ पलायन करते है. सरकारे उन्हे मुलभूत सुविधाऎ (बिजली/पानी/ राशन/ मकान ) नही दे पाती है जिससे सामाजिक ढाचा गडबडा सा गया है. जब तक गावो का विकास ना होगा इस समस्या को झेलना ही पडेगा. यह सरकारे पानी बिजली घर, एवम रोजगार के अवसर गावो मे मुहैया नही कराते तब तक नागरिको को दुखी होना ही पडेगा. रही बात प्रवीणजी की - गावो-शहरो से दुर घर मकान लेने से रुपयो कि बचत हो जाती है पर रुपया पैसा बडा फ़ैक्टर नही है- कुछ सामाजिक व्यवाहारिक अध्यापन चिकित्सा जैसे महत्वपुर्ण अवरुधता है... इस और सोचने मे विचारने मे...
आपने बडे ही काम के विषय को चुना है--- इस पर सरकारो को बडी ही गम्भीरता से विचार करना होगा.... दिखने मे यह मुद्दा छोटा लगता है पर बात बडी ही महत्वपुर्ण है.
आदरणीय पाण्डेजी!

सुख, समृद्धि और शान्ति का आगमन हो
जीवन प्रकाश से आलोकित हो !

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दीपावली की हार्दिक शुभकामनाए
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ताऊ किसी दूसरे पर तोहमत नही लगाता-
रामपुरियाजी
हमारे सहवर्ती हिन्दी ब्लोग पर
मुम्बई-टाईगर
ताऊ की भुमिका का बेखुबी से निर्वाह कर रहे श्री पी.सी.रामपुरिया जी (मुदगल)
जो किसी परिचय के मोहताज नही हैं,
ने हमको एक छोटी सी बातचीत का समय दिया।
दिपावली के शुभ अवसर पर आपको भी ताऊ से रुबरू करवाते हैं।
पढना ना भूले। आज सुबह 4 बजे.
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दीपावली की हार्दिक शुभकामनाए
हेपी दिवाली मना रहा हू ताऊ के संग
ताऊ किसी दूसरे पर तोहमत नही लगाता-
रामपुरियाजी

द फोटू गैलेरी
महाप्रेम
माई ब्लोग
मै तो चला टाइगर भैया के वहा, ताऊजी के संग मनाने दिवाली- संपत
हे प्रभु यह तेरापन्थ

ताऊ रामपुरिया said...

भारतीय गांव आज विश्व व्यापी आर्थिक मंदी मे ताजा हवा की तरह उभर कर प्रकट हुये हैं. भारत मे जो मंदी की मार कम होती दिखाई दे रही है उनके पीछे गांव ही है. आज गांव को पहले जैसा आंकन बडा गलत होगा. हर बडी कंपनी आज गांव को लक्ष्य करके अपनी मार्केटिंग पोलिसी बनाती है.

वैसे भी गांव वाले अब गांव वाले नही रहे....शहर वालों को बेभाव बेचने की अक्ल और ताकत रखते हैं.:)

रामराम.

काजल कुमार Kajal Kumar said...

बहुत मुश्किल है कृत्रिम अंतर बनाए रखना.
शहर गांवों को व गांव शहरों को प्रभावित करते ही आए हैं, किसी भी समाज को देखे लें.

cmpershad said...

हम शहर के बाहर गांव में ही रहते थे पर देखते देखते अब यह गांव शहर में मिल गया- ग्रेटर हैदराबाद! अब न गांव के मज़े हैं न शहर की सुविधाएं। हां, टैक्स तो बढ गए हैं:)

Vivek Gupta said...

आप को दीपावली की हार्दिक शुभकामनायें

Anil Pusadkar said...

गांव मे बसने का मन तो मेरा भी है गुरूदेव और इस दिशा मे पिछले दो-तीन सालों से ट्राई भी कर रहा हूं लेकिन कभी कभी ऐसा लगता है सब कुछ अपने हाथ मे होते हुये भी कुछ भी अपने बस मे नही होता।गांव का अपना अलग आनंद है तो ज़रूर लेकिन अब गांवो मे आपको सिर्फ़ और सिर्फ़ बूढे ही मिलेंगे,गिरते हुये घरो की देखभाल करते हुये,जवान तो शहर की चकाचौंध मे गुम हो जाने के लिये चुंबक की तरह खींचे चले जाते है शहर की ओर्।वैसे यंहा बिज़ली की कमी तो नही है मगर शहरो की तुलना मे गांव मे बिजली कम ही मिलती है,बस यही एक प्रोब्लम है,बाकी तो सब बराबर है।देखते है कब वापसी हो पाती है अपनी।

Udan Tashtari said...

नित कुछ विचार आते हैं
नित कुछ विचार जाते हैं
जाने कैसी फितरत है हमारी
हम जहाँ थे वहीं रह जाते हैं...

-समीर लाल ’समीर’

Udan Tashtari said...

अभी तो रिटायरमेन्ट में समय है..चाँद पर बसने का प्लान कैसा रहेगा? :)

लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्` said...

IN WEST especially in America MEGAPOLIS are being created

The idea of an idyallic , rural helmett is attarctive ,but it has
its flaws I'm sure as human beings whever may we live , tend to spoil the enviornment & mis use the basic infrastructure provided therein --

still, nothing wrong in trying :)

Hope Deepawali was wonderful
&
that Boat was really fast --->

शरद कोकास said...

प्रसिद्ध शायर कैफी आज़मी ने अपने अंतिम दिनो मे यह निर्णय लिया था कि वे अपना अंतिम समय यू पी के अपने गाँव में व्यतीत करेंगे । आज पुत्र के पास रहने का मोह अधिकांश लोगो को गाँव जाने से रोकता है । कुछ सुख सुविधाओ का मोह भी । शायद अब गाँव मे आबादी कम होती जाये और शहरों मे बढ़ती जाए ।

सतीश सक्सेना said...

गाँव में बसना सुखकर हो सकता है यदि आप स्वामी ज्ञानानंद बनकर जाएँ , और बहुमत को शिष्य बनाने में कामयाब हो जाएँ ! अगर ऐसा करने में नाकामयाब रहे तो लोग आपको शिष्य बनाने का प्रयत्न अवश्य करेंगे !
आज गाँव में सीधे साधे लोग नहीं रहते, शहर की हर बुराई हर जगह देखी जा सकती है, हाँ पर्यावरण को अवश्य अभी नुक्सान नहीं पहुंचा, मगर सामाजिक पर्यावरण यहाँ से अधिक दूषित है !

Vivek Rastogi said...

हमारा भी यही सपना है अब देखते हैं कि यह कब सच होता है और व्यवहारिक कठिनाइयों से हम कितना लड़ पाते हैं अगर उतक्रमित प्रव्रजन किया तो मतलब सपना साकार किया तो क्योंकि हमारे कुछ मित्र ये सपना उज्जैन में साकर कर चुके हैं और जैसा कि प्रवीण जी ने बताया है, उससे जीवन की व्यवहारिक कठिनाइयों से निपटा जा सकता है।

डॉ .अनुराग said...

अब गांव वैसे नहीं रह गये है ....न गांव वाले ..बाजारीकरण का वाइरस वहां भी अपने पांव जमा चूका है सर जी

अभिषेक ओझा said...

मैं तो इस पर सट्टा लगा रहा हूँ कि अगर आप बस गए तो मैं भी जल्दी रिटायर्मेंट लेके उधर ही पड़ोस में बस जाऊँगा :) लेकिन वास्तव में जा के रहना.... देखते हैं. कुछकुछ प्लान है तो. पहले आप चलिए.