Sunday, November 1, 2009

अघोरी


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sanichara alaav अलाव तापता जवाहिरलाल, लोग और सबसे बायें खड़े पण्डाजी

जवाहिरलाल को दो गर्म कपड़े दिये गये। एक जैकेट और दूसरा स्वेटर।

ये देने के लिये हम इंतजार कर रहे थे। पैर के कांच लगने की तकलीफ से जवाहिरलाल लंगड़ा कर चल रहा था। दूर वैतरणी नाले के पास आता दिखा। उसे अपने नियत स्थान पर आने में देर हुई। वह सूखी पत्तियां और बेलें ले कर आया – अलाव बनाने को। उसने ईंधन जमीन पर पटका तो मेरी पत्नीजी ने उसे गर्म कपड़े देते समय स्माल टॉक की – "यह जैकेट का कलर आपकी लुंगी से मैच करता है"।

जवाहिरलाल ऐसे मुस्कराया गर्म कपड़े लेते समय, मानो आन्द्रे अगासी बिम्बलडन की शील्ड ग्रहण कर रहा हो। हमें आशा बंधी कि अब वह सर्दी में नंगे बदन नहीं घूमा करेगा।

पर अगले दिन वह आगे से बटन खुले एप्रन नुमा कोई कुरता पहने था। और उसके अगले दिन से वही नंगे बदन दिखने लगा। बस अलाव जला कर बैठता है। अलाव के कारण आस पास लोग आग तापने जम जाते हैं। पण्डाजी ने बताया कि वह ऐसे ही रहेगा - अर्धनग्न। मैं अन्दाज भर लगाता हूं कि उन जैकेट-स्वेटर डिस्पोज कर कितनी शराब पा गया होगा वह। शायद न भी डिस्पोज किया हो।

Javahiralal मैने अलाव के पास उसे देख उसके व्यक्तित्व पर टिप्पणी की – अघोरी लगता है।

पण्डाजी ने मानो शब्द लपक लिया। “अघोरियै तो है। पहले कभी बंगाल गया था वहां का जादू सीखने। जान गया था। तान्त्रिक बन गया था । फिर किसी और बड़े तांत्रिक ने इसका गला बांध (?) दिया। अब साफ साफ नहीं बोल पाता तो वे तान्त्रिक मन्त्र स्पष्ट उच्चारित नहीं कर सकता।”

जवाहिरलाल यह स्मित मुस्कान के साथ सुन रहा था – मानो हामी भर रहा हो।

पण्डाजी ने आगे बताया – यह खटिया पर नहीं सोता। जमीन पर इधर उधर सो जाता है। कुलुर बिलार आस पास रहते हैं। एक बार तो कोई पगलाया कुकुर बहुत जगह काटा था इस को। कोई इलाज नहीं कराया। जब मन आता है जग जाता है। कभी कभी आटा सान कर इसी अलाव में बाटी सेंक लेता है। और कभी मन न हो तो पिसान को पानी में घोर (आटा पानी में घोल) यूंही निगल जाता है।

“अघोरियै तो है। आदमियों के बीच में अघोरी।”

मैं जवाहिरलाल को यूं देखने लगा जैसे मेरे सामने कुछ अजूबा हो रहा हो। और जवाहिरलाल निर्लिप्त भाव से अलाव की आग कुरेदने लगा था। --- यह एक आदमी है, हां आदमी, जिसे मैं प्रभावित करने का कोई दम्भ नहीं पाल सकता!

sanichara alaav1


[अघोरी [संज्ञा पु.] (हि.) १. औघड़। अघोर मत का अनुयायी। २. घृणित व्यक्ति। सर्व भक्षी। घिनौने पदार्थों का व्यवहार करने वाला।]

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प्रतिक्रियायें :
 

33 महत्वपूर्ण टिप्पणियां:

Varun Kumar Jaiswal said...

" आदमियों के बीच में अघोरी " ||
इस अघोरी में दुनिया के लिए कोई ' घोरियत ' तो नहीं दिखलायी पड़ती |

M VERMA said...

जवाहिर और कोई नहीं हमारा स्वरूप ही तो है. बन्दिशों, लोकलाज और दिखावे के आवरण के कारण हम जवाहिर नहीं बन पाते वर्ना शायद ---

Arvind Mishra said...

कभी कभी दिमाग कुंद हो जाता है -कुछ समझ में ही नहीं आता की क्या लिखें !
आज फिर जवाहर प्रसंग पढ़ कुछ ऐसा ही हो गया -संवेदना काठ मार गयी !

निशांत मिश्र - Nishant Mishra said...

फिर तो ऐसे अघोरी हिंदुस्तान में लाखों की तादाद में होंगे.

शराब को छोड़ दें तो जवाहिरलाल सम्पूर्ण मिनिमलिस्ट लाइफ जी रहे हैं.

शरद कोकास said...

बह्त बढ़िया कैरेक्तर लगा यह जवाहिरलाल

विवेक सिंह said...

मन का मंथन करता यह मानसिक हलचल ब्लॉग ।

वाणी गीत said...

शराब आदमी को अघोरी बना ही देती है ...!!

रंजन said...

मुजे तो मस्त लगा जवाहरलाल.. अपने पुरखे.. (आदिम) कुछ एसे ही रहे होगें...

रंजन said...

और लगता है.. ये बुद्धत्व को प्राप्त है...

अजय कुमार झा said...

ज्ञान जी,
गंगाजी के किनारे ..अद्भुत सभ्यता, एक अनोखा युग हमारे समानांतर चलता रहता है...आपको पढता रहता हूं तो उस युग से परस्पर संवाद स्थापित होता रहता है...वर्ना इस पाषाण दुनिया में सब कुछ अधूरा सा मिल ही जाता है। अघोरी ..उसी युग की एक अबूझ पहेली सा लगा...और अबूझ ही अच्छा लगा ...

Ratan Singh Shekhawat said...

आपका प्रात:कालीन भ्रमण हमें भी कई चरित्रों से मुलाकात करवा देता है |

संजय बेंगाणी said...

कठीनाईयों से पलायन का एक मार्ग यह भी है. सम्मानित मार्ग तो कतई नहीं है.

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

मनुष्य ने अनेक चरित्र जिए हैं। वह हर बार एक नए चरित्र के रूप में सामने आता है। यह भी एक रुप है।

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

हम तो कब से इंतज़ार कर रहे थे की वह स्वेटर पहने दिखाई देगा मगर उसे तो शायद स्वेटर में भी दारू की बोतल ही दिख रही थी. अघोरियों ने सदा निराश ही किया है, इस हिसाब से भी यह उपाधि ठीक बैठती है.

संगीता पुरी said...

आपके प्रात: कालीन भ्रमण के बाद के पोस्‍ट में भारत में बसनेवाला हर चरित्र दिख जाता है !!

ललित शर्मा said...

पंडा जी का जवाहर के क्रिया कलापों से परिचय कराना जैसे कोइ मंजा हुआ गाईड है बढिया रहा।
आभार

सतीश पंचम said...

जहां तक जवाहिरलाल के बारे में आपने विश्लेषण किया है तदनुसार जवाहिरलाल मुझे एक 'सॉफ्ट अघोरी' लग रहा है :)

परमजीत बाली said...

ज्ञानदत्त जी,आज कल हम भी इसी विषय पर लिख रहे हैं.....यह अघोरी लोग बहुत विचित्र होते हैं.........वह सब हजम कर जाते हैं जिस बारे में हम सोच भी नही सकते......यदि किसी अघोरी के साथ रहने का मौका मिले तभी इन के बारे में जाना जा सकता है....

काजल कुमार Kajal Kumar said...

मुझे तो यहां दिल्ली में हर कोई अघोरी लगता है...हर किसी की संवेदनाएं पूर्णत: कुंद हैं यहां...

पंकज said...

मिथकों में घोर घोर अघोरियों के विषय में पढते हैं. एक था जो, एक टब में रहता था और केवल प्याज खाता था. पिछले दिनों वाराणसी में अस्सी पर कीचड में रहने वाले अघोर का वर्णन भी था. अब ज्ञानी और पागल होने में बडा बारीक अंतर होता है.

cmpershad said...

लोग जिन परिस्थितियों में रहते हैं उन्हीं से संतुष्ट रहते हैं। कहा जाता है कि एस्किमो के कठिन जीवन को देख कर उन्हें अन्य स्थान पर भेजने की योजना को उन्होंने यह कह कर ठुकरा दिया कि वे यहां संतुष्ट हैं।

यदि वे टीवी देखे होते तो शायद शाहरुख खां की बात मानते- डोंट बी संतुष्ट :)

गिरिजेश राव said...

वह जरूर मन ही मन हँसता होगा - बहुत देखे ऐसे!
अब आप उसे उसके हाल पर छोड़ दीजिए। उसकी दुनिया अलग है जिसमें आप एक घुसपैठिए हैं। स्वेटर वगैरह न पहन कर सूक्ष्मता से वह यही तो बताना चाह रहा है।
लोवर डिग्री का मनोरोगी पलायित लगता है यह चरित्र! जाने कितने गाँव, क़स्बे और शहरों की गलियों में भटकते रहे हैं, आज भी हैं। मनुष्य के साथ सम्वेदना हमें उनकी तरफ खींचती है लेकिन वे मनुष्य हैं, यही सचाई तो उन्हें और हमें लाचार कर देती है,सीमाएँ और रेखाएँ खींच देती है ...
जब वह आप की दुनिया में नहीं घुसते तो आप भी न जाएँ उनकी दुनिया में !

सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी said...

जवाहिर लाल - अघोरी
जवाहर लाल - चाचा नेहरू

दोनो इलाहाबाद से - एक भूत और एक वर्तमान में भूत जैसा...। जय हो:)

राज भाटिय़ा said...

हमारा समाज भी आधोरी बना देता है हमे, बची खुची कसर लडाकी बीबी निकाल देती है..... बेचारे?

प्रवीण पाण्डेय said...

जवाहिर का मानसिक सॉफ्टवेयर हमसे भिन्न है । प्रशंसा व निन्दा हमें प्रभावित करती है, जवाहिर को छूती भी नहीं । पण्डाजी ने इस स्थिति को स्पष्ट करने का प्रयास तो किया है पर वही मात्र कारण हो यह लगता नहीं है । यह संवेदनहीनता की स्थिति नहीं है अपितु वेदनाओं को पार करने की स्थिति है । व्यक्तित्व को पढ़ते रहें और तथ्य मिलेंगे ।

HEY PRABHU YEH TERA PATH said...

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जय ब्लोगिग विजय ब्लोगिग
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आदरणीय ज्ञानदत्तजी पाण्डे,
“अघोरियै तो है। आदमियों के बीच में अघोरी।”
सत्य है- ससार मे बहुत सी चीजे सीख देती है तो कही मनो मे संवेदनाएं प्रकट होती है। गुजरात के एक बहुत बडे लेखक है
श्री सुरेशजी सोमपुरा,उन्होने गुजरात के घने जन्गलो मे अघोरीयो के सग रहकर धाराप्रवाह अपने अनुभव चित्रलेखा गुजराती एवम राजस्थान पत्रिका मे दो सालो तक लिखा उसमे रोगटे खडे करने वाले प्रसग थे।

रही बात जवाहिरलाल जी की तो आपने ठीक कहा, वो भी अघोरी ही है अब कोई उसे लोवर डिग्री का मनोरोगी कहे या कुछ भी पर है तो हमारे ससार का ही अन्ग!!! मेरे हीसाब से मनोरोगी या पागल तो ससार का हर आदमी है, कोई १०% तो कोई २५% तो कोई ५०% सभी मानसिक रोगो से ग्रसित है जिसे हम पागल कहते है। ब्लोग लिखना भी पागलपन की श्रेणी मे ही आता है। तो जवाहिरलाल को लोवर डिग्री का मनोरोगी नही मान सकते वो भी हमारे ससार का हिस्सा है- अघोरी ही है!!!!!

♥ ♥ ♥ ♥ ♥ ♥ ♥ ♥ ♥ ♥ ♥ ♥ ♥ ♥ ♥ ♥ ♥ ♥ ♥ ♥ ♥ ♥ ♥ ♥
हे प्रभू यह तेरापन्थ पर पढे
अणुव्रत प्रवर्तक आचार्य तुलसी

Praney ! said...

They say, "Every human heart is an Ocean, noone can measure the depth." This Jawahar seems to be just another, untouched & unexplored !

Hey Bhagwan...teri duniya.

dhiru singh {धीरू सिंह} said...

अघोरी , विस्तृत जानकारी दीजिये वैसे गंगा जी के पास नर ,नाग , किन्नर ,देव , दानव , वानर सब आश्रय लेते ही है

अमरेन्द्र नाथ त्रिपाठी said...

''आदमी, जिसे मैं प्रभावित करने का कोई दम्भ नहीं पाल सकता! ''________मानव-मनीषा इस यथार्थता को
स्वीकार न करे तो क्या करे |
ऐसे चरित्रों के सामने दावे
नहीं चलते और न हम
भारत-सरकार हैं , न ही
विधाता |
अनदेखे पहलुओं की
ओर आप दृष्टि डालते हैं |
ऐसा अन्यत्र नहीं मिलता |
सो ...
आभार... ...

अभिषेक ओझा said...

रिलेटिव दुनिया है जी. वो भी अपने फ्रेम से शायद कुछ अजीब ही सोचता होगा आपके बारे में ! गिरिजेशजी की बात सही लगती है.

अभिषेक ओझा said...

गिरिजेशजी की बात की आखिरी लाइन छोड़कर.

RAJ SINH said...

सबसे अलग सबसे जुदा होना खुद में अनहोनी हो पर जवाहर प्रसन्न है संतुष्ट भी . और क्या चाहिए दुनिया में और दुनिया से ?
तारीफ करूंगा आपकी दृष्टि को कहाँ कहाँ पहुँच जाती है.

कृष्ण मोहन मिश्र said...

ganga kinare aghoriyon ka hona nayee baat nahi hai.

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