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|| MERI MAANSIK HALCHAL ||
|| मेरी (ज्ञानदत्त पाण्डेय की) मानसिक हलचल ||
मन में बहुत कुछ चलता है। मन है तो मैं हूं| मेरे होने का दस्तावेजी प्रमाण बन रहा है यह ब्लॉग|
एक व्यक्तिगत संकल्प का इतना सुखद और जोशीला रिस्पॉंस मिलेगा, मुझे कल्पना नहीं थी।
शनिवार रात तक मैं सोच रहा था कि मेरी पत्नी, मैं, मेरा लड़का और भृत्यगण (भरतलाल और ऋषिकुमार) जायेंगे गंगा तट पर और एक घण्टे में जितना सम्भव होगा घाट की सफाई करेंगे। मैने अनुमान भी लगा लिया था कि घाट लगभग २५० मीटर लम्बा और ६० मीटर आधार का एक तिकोना टुकड़ा है। उसमें लगभग चार-पांच क्विण्टल कचरा - ज्यादातर प्लास्टर ऑफ पेरिस की पेण्ट लगी मूर्तियां और प्लास्टिक/पॉलीथीन/कांच; होगा। लेकिन मैने जितना अनुमान किया था उससे ज्यादा निकला सफाई का काम।
रविवार सवेरे भ्रमण के लिये आने वाले एक सज्जन (जिनका नाम पता चला आद्याप्रसाद पाण्डेय) से जिक्र किया। वे बहुत उत्साही निकले। समय तय हुआ नौ बजे। वे बोले – पांच सात लोगों को ले कर आता हूं। पर जब हम सब इकठ्ठा हुये तो बाईस लोग थे – तीन बच्चों समेत।
हम सब तसला ले, पॉलीथीन बीन, दूर फैंक कर आने लगे (एक तरह का लैण्डफिल बनाने को)। पर जल्दी ही समझ आ गया कि उसकी ढेरी लगा कर अग्निदेव को ही अर्पित करना होगा। हम कुछ पतले पॉलीथीन के दस्ताने ले कर गये थे – गन्दगी से हाथ बचाने के लिये। पर अन्तत: कीचड़ और गन्दगी में हाथ लगाना ही पड़ा। पॉलीथीन की पन्नियां कीचड़ में सूख कर दब गई थीं। उन्हे खींच खींच कर श्रमसाध्य तरीके से निकाला। चूड़ियां और अन्य कांच को हाथ बचाते इकठ्ठा करना पड़ा। सारी मूर्तियां एक अलग जगह इकठ्ठी की गयीं। फावड़ा ला कर एक गढ्ढ़ा खोदा गया उन्हें रेत में दबाने को।
छोटे बच्चे बहुत उत्साही थे। वे अपना बैट-बाल का खेल त्याग कर आये थे और इसमें उन्हे कम रोचकता नहीं मिल रही थी। काम उन्होने कम नहीं, अधिक ही किया और आनन्द भी बहुत लिया होगा।
आनन्द तो हम सब को प्रचुर मिला। भरतलाल ब्रेड पकौड़ा और चाय ले आया घाट पर। कार्यक्रम का समापन इस अल्पाहार से हुआ।
सब बहुत जोश में थे। आगे के लिये सबकी अपने अपने तरह की योजनायें थीं। कोई स्थानीय सांसद को, कोई डिस्ट्रिक्ट मेजिस्ट्रेट को, कोई आई-नेक्स्ट वाले को रोप-इन करने की बात कर रहे थे (अंतत हम जैसे चुप्पे मनई को हाशिये पर जाना ही होगा! :-) )। कोई गंगा मुक्ति अभियान जैसी बड़ी चीज की बात कर रहे थे। सब की कल्पना/रचनात्मकता को पंख लग गये थे। अगले रविवार सवेरे आठ बजे इस कार्यक्रम के लिये पुन: मिलने का तय हुआ है। अभी काफी कुछ किया जा सकता है घाट पर!
घाट पर नहाने वाले और एक दो ऑनलुकर्स भी थे। वे शायद अगली बार जुड़ें। और पण्डाजी को भी जोश आ गया था – वे अपने स्थान के आसपास का क्षेत्र साफ करने लग गये थे।
मैं नीचे फोटो दे रहा हूं सवा घण्टे के इस कार्यक्रम के। दो सज्जनों के नाम पूछ पाया था – श्री आद्याप्रसाद और एक नौजवान श्री पंकज सिंह। अगली बार सबके परिचय प्रस्तुत करूंगा।
इतना अटाला, पुरानी मूर्तियां, टूटी चूड़ियां, पूजा का सामान सब गंगाजी किनारे ऐसे फैंका गया था, जैसे गंगा माई न हों कचरापात्र हों! हिन्दू मानस का कथनी करनी में अन्तर यहां साफ नजर आता है। हर साल नई मूर्ति लो, पुरानी में से प्राण निकाल नई में घुसाओ और पुरानी मूर्ति को गंगाजी के कचरापात्र में ठूंस दो!
“गर्व से कहो हम हिन्दू हैं” - क्या गर्व करें जी? बस ऐसे ही यदाकदा पन्नियां बीनें, फोटो चमकायें और जेब में धर लिया करें गर्व! बाकी तो हरहर गंगे भागीरथी, पाप न आवै एक्को रत्ती!
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49 महत्वपूर्ण टिप्पणियां:
गंगा घाट की सफाई के लिए उठाये गए आपके कदम की जितनी प्रशंसा की जाये कम ही रहेगी ...प्रशासन को कोसते रहने वालों के लिए एक अच्छा सबक ..
थोडा प्रचार प्रसार होगा तो लोग तो बढ़ेंगे ...मगर मुफ्त की रेवडी लुटने वाले भी काफी जुट जायेंगे ...अच्छा है की आप पहले से तैयार है ...
होसला बना रहे ...शुभकामनायें ...!!
इतने सार्थक कदम के सूत्रहार होने के बाद चुप्पई के मारे हाशिये पर जाना भी सुखद है.
आपको साधुवाद कहने का मन है आज!
ज़रूरत है इसी तरह जोत से जोत मिलाकर चलने की...प्यार की गंगा बहाने की...गंगा मैया की सेवा करने की...बूंद-बूंद से सागर भरने की इस कोशिश को मेरा प्रणाम...
जय हिंद...
बहुत अच्छा कार्य - आप बधाई के पात्र हैं।
आप सभी बाइस लोगों को सादर, वर्ना हम जैसों के लिए तो गाल बजाना ही आसान है. यदि कूड़ा फेंकने के लिए सरकार एसे सार्वजनिक स्थानों पर पर्याप्त संख्या में कचरेदान लगवा दे तो शायद कूड़ा-करकट यूं फेंकने की नौबत ही न आए. (मानता हूं कि हमें गंद फैलाने की आदत से मुक्ति जल्दी नहीं मिलने वाली). यूं, ये धरोहरें हमारी हैं, इन्हें संभालना भी हमें ही है...
गंगा घाट पर सफाई की बहुत बढ़िया शुरुआत की है आपने यदि इसी तरह हम सभी अपने आस पास हफ्ते में एक दिन मिलकर श्रम दान करे तो गंदगी से निजात पा जायेंगे और लोगों में कचरा न फैलाने के लिए प्रेरणा भी जागेगी |
बहुत ही प्रेरणादायक प्रसंग |
एक दिया जलाया है आपने
एक लौ का आगाज़ किया है
लौ से लौ जब जलेगी
उजाला होना तो तय ही है
साधुवाद
प्रेरणादायक
साधुवाद
वाह क्या नजारा रहा ....लोग आते गए कारवां जुट्त्ता गया ...
बाकी हिन्दू धरम करम को क्या कहिये ......
स्तुत्य है आपका प्रयास और उससे ज्यादा स्तुत्य है इसका भाव.
कचरे में भी रासायनिक कचरा डराने वाला है.ज्ञानेंद्र पति के 'गंगा तट' में एक कविता है जिसमे गंगा को साबुन की टिकिया से डर है..
अब देखिये, कैसे नया दौर के दिलीप कुमार माफिक सीन क्रियेट हो गया है। नया दौर में भी लगभग यही सीन था। सडक बनाने को कोई तैयार न था, लेकिन फिल्मी हीरो ने हिम्मत जुटाई और तसला मिट्टी से भरने लगा....पहले एक हाथ...फिर दो हाथ और अंत में हाथ ही हाथ.....
यह तो रही फिल्मी बात...
पर असल जिंदगी में यह काम करने के लिये नया दौर का ही गाना गाया जा सकता है ....
साथी हाथ बढाना....साथी रे :)
गंगा सफाई के बारे मे जान कर अच्छा लगा ।
बड़ी बातें न करे और छोटे छोटे उदाहरण स्वंय पेश करें तो बदलाव संभव है.. आपने सही मिसाल पेश की..
फोटो देख मुझे अपने NSS के दिनों कि याद आ गई..
ज़िन्दाबाद!
आपका यह कार्य अत्यन्त सराहनीय है!
बहुत अच्छा प्रयास है। बच्चे आए यह पढ़कर और भी अच्छा लगा। नदी तो सबकी है। इस प्रयास का असर भी होगा। धीरे धीरे इसे और बड़ा कीजिए।
गंदगी देख कर उसे हटा देने का विचार ब्लाग पर प्रकट कर के भी इतिश्री हो सकती थी। लेकिन उस पर वास्तविक काम करने का निर्णय लेना और काम में जुट जाना बहुत बड़ा काम है। आप ने एक ऐसी आग लगा दी है जिसे सिर्फ समय समय पर हवा देने की आवश्यकता है। गंदगी साफ करने के अभियान को गंदगी साफ न होने देने के अभियान में भी बदला जा सकता है। इस के लिए आप को सिर्फ घाट और उस के आसपास के लोगों को वालण्टियर्स में बदलना पड़ेगा।
बहुत बधाई!
कर्मक्षेत्र सदैव ही विचार क्षेत्र से श्रेष्ठ होता है।
आपके इस उत्साही कदम की जितनी भी प्रशंसा की जाये कम है....गंगा की गन्दगी पर प्रशासन को कोसने के बदले आपने को स्वयं ही कुछ कर गुजरने की मिसाल पेश की है...आशा है उससे औरों को भी प्रेरणा मिलेगी...
हम तो बस ई है कहब गंगा मैया की जय!! और उनके भगत आदरणीय "ज्ञानदत्त पाण्डेय जी" की जय!!
इसका अर्थ यही माना जाए कि हमें किसी भी समय किसी भी काम की शुरूआत कर देनी चाहिए .. लोग साथ दे ही देते हें !!
कमाल कर दिया आपने।
आपके इस स्तुतीय प्रयास को नमन!! काश!ऐसे संकल्प हर कोई करके जागरूकता लाए तो भारत सुंदर स्वच्छ देश बनने में देर न लगेगी। पुनः बधाई आपके इस अभियान पर॥
This is really great.
Thanks for creating this awareness.
I hope it will be eye opening for public.
Once Public will do such things then government will also change their mindset and come forward to clear polution.
Jai ho Gangaji ki....
ज्ञानदत्त जी बहुत प्रेरक पोस्ट बन गई है यह.....आप का यह कदम कईयों को प्रेरित करेगा.....इस से बहुतो में इस तरह के कार्य करने का उत्साह जरूर पैदा होगा।धन्यवाद।
थोड़ी सी सफाई आस पास करे |
आओ मिल कर प्रयास करे ||
It is matter of proud to see a blogger in field. I will be fortunate if I get chance to participate in this holy work in coming days. Best wishes Gyan ji.
Sahasra sadhuwad, you are real bearer of Ma Ganga's blessings.
"मैं अकेला ही चला था जानिबे मंजिल मगर
लोग साथ आते गये और कारवां बनता गया ।"
बेहद प्रेरक . इस कारवां के सार्थवाह और इसके हरावल दस्ते को मेरा ’सैल्यूट’ .
लोगों में ये जोश बना रहे ! तो घाट चमचमाता रहेगा.
Kartik Poornima aur Dev Deepavali ko devgan kitane prasann huye honge. Aaj ke din is se behatar kuch nahi ho sakta . Aap sab ne Bina Ganga snan kiye hi Ganga nahane ka punya kamaya hai .
आपको कभी कभी गंगा पुत्र कहने का मन करता है..आपके भाव और गंगा के प्रति आपके स्नेह को देख कर...
आज आपकी इस पोस्ट ने मेरे इस विश्वास को फ़िर से बना दिया कि इस समाज में बदलने की ललक तो है ...बस अगुओं की जरूरत होती है...आपको इस काम के लिये नमन..
इस सुखद अनुकरणीय कार्य में पूरे परिवार को प्रेरित करने के लिए आपको प्रणाम ज्ञानदत्त जी ! आशा है विद्वान् प्रयागवासी इस शुरुआत से कुछ सीखेंगे !
सादर !
आदमी अच्छे मालूम पड़ते हैं आप ।
दिनेश जी ने तो कह ही दिया .आपके प्रति सम्मान से मन भर आया.अपनी अलख जगा लें हम तो बूँद बूँद से समुद्र बन जाये.
क्या गर्व से कहें की हम हिन्दू हैं ? शर्म से ही कहा जा सकता है !
विवेक सिंह ने पूरी गंभीरता से कमेंट्स दिए है , मैं भी सहमत हूँ भाई जी :-)
इस काम की जितनी प्रशंशा की जाये कम है...एक झंडा उठा कर चलने वाला चाहिए...लोग अपने आप जुड़ जाते हैं...
मैं अकेला ही चला था जानिबे मंजिल मगर
लोग खुद जुड़ते रहे और कारवां बनता गया
नीरज
आप को साधुवाद , कारवां बनते देर न लगेगी . गंगा मैय्या की कृपा बनी रहे आप पर और आपकी गंगा मैय्या पर
ज्ञानदत्त पाण्डेय जी आप ने तो सच मै बहुत सुंदर काम कर दिया काश हर भारतीया ऎसा सोचे, क्यो नही लोग समझते कि एक तरफ़ तो गंगा को गंगा मा कहते है फ़िर उसी मां को अपनी गंदी करतुतो से गंदा करते है.
आप का धन्यवाद
i can not resist to say thank you to you and my well wishes.
rakesh
अगले रविवार को प्रातः आठ बजे। समय नोट कर लिया है। इस पुण्य के कार्य में सहभागी होने का अच्छा अवसर है।
इलाहाबाद के डी.एम. साहब संगम क्षेत्र में आजकल सफाई अभियान चला रहे हैं। बहुत से अधिकारी जुट रहे हैं वहाँ। सफाई वे स्वयं भी करते हैं। यहाँ आपलोगों को देखकर मन प्रसन्न हो गया। साधुवाद।
"एक व्यक्तिगत संकल्प का इतना सुखद और जोशीला रिस्पॉंस"
एक सत्कार्य के लिए किस तरह आप इतने लोगों को साथ ले पाए यह पढ़कर बहुत ही अच्छा लगा.
हाशिये को भी हमारा नमन!
बहुत ही बढ़िया कोशिश है पाण्डेय जी आपकी, मानना पड़ेगा. थोडा प्रयास इसमें भी होना चाहिए की लोगों को गंगा जी में कूड़ा न फेंकने के लिए प्रेरित किया जाए. ये काम संगम छेत्र और कई जगहों पर भी होना चाहिए. हर घाट के आस पास इस समबद्ध में लगे हुए बोर्ड कुछ लोगों को तो प्रेरित करेंगे ही.
यद्यपि ये प्रयास सराहनीय है लेकिन जब पूरे के पूरे शहरों का सीवर ही सीधे गंगा में जा रहा हो तो इस तरह से गंगा जी को साफ़ करने का प्रयास कितना फल देगा, पता नहीं.
अच्छा लगा। आपके साथ आपके बेटे को लगा देखकर बहुत खुशी हुई। बेहद। आपने शिराघात से संबंधित साइट बनाने वाला काम छोड़ ही दिया।
aap jaise logon ko hi shayad leader bola jata hai aur kahin padha tha ki 'leadership is an action not a position'....
bahut achha laga aur padhkar bahut khushi hui ki aapne jo thaana wo karke dikhaya..aur to aur kaafi logo ko joda aur ab baatein sampoorn safai ki ho rahi hain...
ganga maiya bhi aapko aashirwaad dengi.. aur mera NAMAN :) sweekaar karen..
lage rahiye ....isi urja se ....
@ हम सब तसला ले, पॉलीथीन बीन, दूर फैंक कर आने लगे (एक तरह का लैण्डफिल बनाने को)। पर जल्दी ही समझ आ गया कि उसकी ढेरी लगा कर अग्निदेव को ही अर्पित करना होगा।
त्वदीयं वस्तु गोविन्दं, त्वदीयं समर्पये...
हमारा साधुवाद दर्ज करें
very impressive indeed ! example ,afterall, is better than precept. But ....we must write about the menace to concerned officials as well. Jai ho....
पावन कार्य को अंजाम दिया है हार्दिक बधाई पूरी टीम को !! इसीलिए तो कहते की पहल करने वालों की आवश्यकता है !!! आपने पहल की तो साथी भी मिल ही गए !!! रही बात गन्दगी फैलाने वालों की तो जो गंगा को पवित्र धाम मानते हैं वे ही ऐसा करते हैं !!! ये धर्म की ग्लानी नहीं तो और क्या है !!!
यह भी जरूरी है कि बीच बीच मे जाकर वहा के लोगो को भी इस बात के लिये प्रेरित करते रहे अन्य्था वे अपनी ज़िम्मेदारी कैसे समझेंगे ।
आपको और श्रीमती रीता पाण्डेय जी को असली वाला साधुवाद।
वैसे वो कहावत भी है ना कि अकेले चले और कारवां बनता गया। आप लोगों ने शुरुआत की और अन्य लोग भी हाथ लगाने को साथ आ गए, जितना काम आपको करने की आशा थी कदाचित् उससे कुछ अधिक ही हो गया। जय हो। :)
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