Saturday, November 7, 2009

थकोहम्


@gyandutt I'm reading: थकोहम्Tweet this (ट्वीट करें)!

मुझे अन्देशा था कि कोई न कोई कहेगा कि गंगा विषयक पोस्ट लिखना एकांगी हो गया है। मेरी पत्नीजी तो बहुत पहले कह चुकी थीं। पर कालान्तर में उन्हे शायद ठीक लगने लगा। अभी घोस्ट बस्टर जी ने कहा -

लेकिन थोड़े झिझकते हुए कहना चाहूंगा कि मामला थोड़ा प्रेडिक्टेबल होता जा रहा है. ब्लॉग पोस्ट्स में विविधता और सरप्राइज़ एलीमेंट की कुछ कमी महसूस कर रहा हूं।

एक तरह से सोचूं तो मुझे प्रसन्नता से उछल जाना चाहिये। घोस्ट बस्टर जी मुझसे वैविध्य और अन-प्रेडिक्टेबिलिटी की अपेक्षा करते हैं। पोस्ट दर पोस्ट सुन्दर और वाह वाह ब्राण्ड टिप्पणी टिपेरना नहीं चाहते! पर 28 BMI (बॉड़ी मास इण्डेक्स) की काया में सेनसेक्सात्मक उछाल आना बहुत कठिन है। शरीर में ट्विचिंग (नस फड़कन) हो कर ही रह जाती है! न लहर उठती है न कोई उछाल आता है। काम का बोझ, थकान और कुछ सार्थक न हासिल हो पाने की सोच – यह सब खदबदाने लगते हैं मन में।

Thakoham1 स्टेलनेस मेरा ही यू.एस.पी. हो, ऐसा नहीं है। आप कई ब्लॉगों पर चक्कर मार आईये। बहुत जगह आपको स्टेलनेस (स्टेनलेस से कन्फ्यूज न करें) स्टील मिलेगा| लोग गिने चुने लेक्सिकॉन/चित्र/विचार को ठेल^ठेल (ठेल घात ठेल) कर आउटस्टेण्डिंग लिखे जा रहे हैं।

सरकारी डेमी ऑफीशियल लैटर लिखने की स्टाइल में ब्लॉग साहित्य सर्जन हो रहा है। कविता भी बहुत जगहों पर प्रोडक्शन की असेम्बली लाइन से निकलता फिनिश्ड प्रॉडक्ट है। जब आप पोस्ट ठेलोन्मुख होते हैं तो हर ड्राफ्ट बिना पालिश किये पोस्ट में तब्दील हो जाता है।

असल में हम लोग बहुत ऑब्जर्व नहीं कर रहे, बहुत पढ़ नहीं रहे। बहुत सृजन नहीं कर रहे। टिप्पणियों की वाहियात वाहावाहियत में गोते लगा रिफ्रेश भर हो रहे हैं!

गंगाजी, अपने किनारों में सिमटिये। सनिचरा, हीरालाल, अवधेश, निषादघाट, माल्या प्वॉइण्ट… बिलाओ सवेरे की धुन्ध में। इन सब पर पोस्ट बनाने में अच्छा लगता है, पर मानसिक हलचल में क्या यही भर होता है/होना चाहिये? नहीं। और घोस्ट बस्टर जी शायद वही इशारा कर रहे हैं।

भरतलाल, जरा गरदन पर फास्ट रिलीफ लगा मालिश करना। और अगर नीद आ जाये तो मैडम रीता पाण्डेय, नियंत्रण कक्ष से फोन आने पर मुझे जगाना मत – जब तक कि रेल यातायात का ट्रंक रूट अवरुद्ध न हो रहा हो किसी अन-यूजुअल से।

बहुत बैडली थकोहम् (बहुत जबरदस्त थका हूं मैं)! ब्लॉग पोस्ट की ऐसी तैसी!


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प्रतिक्रियायें :
 

31 महत्वपूर्ण टिप्पणियां:

श्यामल सुमन said...

बहुत विविधता पोस्ट में सत्य वचन है ज्ञान।
दिखा चित्र तो ये लगा सचमुच बहुत थकान।

सादर
श्यामल सुमन
09955373288
www.manoramsuman.blogspot.com

Ashok Pandey said...

थकान भी जरूरी है। आदमी थके नहीं तो लगातार चलते रहने से यात्रा का मजा ही नहीं रहेगा।

सतीश सक्सेना said...

सर्वाइकल प्रोब्लम के लिए होमेओपैथी की शरण लें , बिलकुल ठीक हो जायेंगे ! शुभकामनायें !

सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी said...

आपकी इस पोस्ट में “थकोहम्‌ टीपियो नास्ति” [एकोऽहं द्वीतीयो नास्ति की तर्ज पर] की घण्ट ध्वनि सुन रहा हूँ।

आप थके तो हमारी पोस्ट पर टिप्पणियों का औसत पूरा का पूरा एक अंक नीचे आ जाएगा। बल्कि अधिकांश लोगों का यही हश्र होगा।

घोस्ट बस्टर, जी आपने ये क्या किया? इस ब्लॉग जगत की टिप्पणी-पिपासु जनता को दुखी करना क्या जरूरी था।

आप लिखते रहिए जी, हम इसमें पूरी विविधता पाते हैं। तभी तो बिना नागा आते हैं...!

Raviratlami said...

"...बहुत बैडली थकोहम् (बहुत जबरदस्त थका हूं मैं)! ब्लॉग पोस्ट की ऐसी तैसी! ..."

ये तो वाकई, टोटली अनप्रेडिक्टेबल था!

वुई डोंट वांट दिस!!!

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

बधाई!
इस पोस्ट के साथ आप ने ब्लाग आलोचना में कदम रख दिया है। जिस की शिद्दत से जरूरत है।

rajiv said...

थकोत्वम्, सोअहम्, ये रहा मलहम
पहले लगता था आप सामान्य 'मनई' नहीं हैं. लेकिन जब कभी आप में थकान, ऊब, और अस्वस्थता के 'लच्छन' देखता हूं तो आपके सामान्य होने का आभास होता है. लगता है इस समय आपको कोई 'ऊब' ज्यादा सता रही है, इस पट्टे से भी ज्यादा. कुछ दिन ब्लॉग से दूर रहें, इस बारे में सोचिए भी नहीं. ये फास्ट रिलीफ से ज्यादा कारगर है. ओझा का ये नुस्खा आजमाएं, फायदा ना हो तो पैसा वापस.

काजल कुमार Kajal Kumar said...

बीड़ी-सिगरेट,स्मैक,दारू,ब्लागिंग...सब व्यस्न हैं. अब हर रोज़ ब्लैक लेबल या ट्रिपल फाइव की तो उम्मीद नहीं की जा सकती न...सो, व्यस्नी जब जब यूं लिखेगा तो ठेलमठेल का मामला तो हो ही जाएगा.

ePandit said...

ऐसी बात नहीं है जी, जैसे कल नारियल साधना वाली पोस्ट चकाचक थी.
गंगा सीरीज जारी रखें जी, हाँ विविधता के लिए बीच-बीच में और चीजों पर भी लिखते रहें.
बाकी पोस्ट ठेलने वालों को पोस्ट ठेलने का बहाना चाहिए.

अमरेन्द्र नाथ त्रिपाठी said...

आपने थकने की बात की , मैं
इसे रसबदल समझूंगा क्योंकि
'मानसिक हलचल' में थकन की
गुंजाइश नहीं हो सकती |
थकान की बात के बावजूद
आपने ब्लॉग जगत पर एक सचेत
और प्रौढ़ राय दी , यह मेरी पूर्वोक्त
बात का प्रमाण है |
सुस्वास्थ्य की कामना के साथ ...
धन्यवाद् . . .

गिरिजेश राव said...

@ rajiv

ये पैसे का खेल समझ में नहीं आया। जरा स्पष्ट करें।
_____________________________

अस्वस्थ होना शारीरिक हलचल है, यह बताने के लिए कि मानसिक हलचल को कम करें :) मसखरी थी। लिखते रहिए। ये सब तो लगा ही रहता है। वैसे फोटो से वाकई कष्ट में लगते हैं। शीघ्र स्वस्थ होने के लिए शुभकामनाएँ।
स्टेलनेस स्टील - एक थकेले की नई खोज(?) यदि सचमुच है तो पेटेंट करा लें।
इससे रेलवे के कोच बनाने का विचार कैसा है?

cmpershad said...

"जब आप पोस्ट ठेलोन्मुख होते हैं तो हर ड्राफ्ट बिना पालिश किये पोस्ट में तब्दील हो जाता है"... तो क्या अब पोस्ट में भी हियरआर्कि आएगी! पहले क्लर्क पोस्ट लिखेगा, अफ़सर संशोधन करेगा और अंत में ब्लागर अप्रूव करके पोस्ट करेगा:)

रही बात ‘ब्लाग की ऐसी की तैसी’ तो इस व्यसन से न आप बच सकते है और न ही आपके कमेंटेटर [इसे क्रिकेट की दृष्टि से न देखें] आपका पीछा छोडेंगे॥

....और हां, यदि होमियोपेथी में आस्था है तो ब्रैयोनिया २०० की पांच गोलिया रोज़ एक बार तीन दिन लीजिए। अंतर आप खुद महसूस करेंगे:)

लवली कुमारी / Lovely kumari said...

मुझे लिखने को विषय नही समझ आता तब मैं लिखने की कोशिश नही करती ..हाँ गंगा तट का आख्यान मुझे भी बोर करने लगा था..पर मैं कह नही पाई.

Anil Pusadkar said...

ज़्ल्द स्वस्थ्य हों और सभी लाईनो का ट्रेफ़िक क्लियर रहे इसी आशा के साथ्।वैसे थकान होना अच्छा लक्षण है इससे रिकव्हरी के बाद स्पीड़ डबल हो जाती है।

संजय बेंगाणी said...

ब्लॉग पोस्ट की ऐसी तैसी!

मनोहारी वाक्य था. मजा आया.

नीरज गोस्वामी said...

अगर आप गौर करें तो सबके जीवन में स्टेल नेस्ता आती ही है...वो ही सुबह उठाना /घूमना/ नाश्ता /आफिस/ घर/ टी.वी और नींद...दूसरे दिन फिर से वोही क्रम... रोचकता के क्षण कितने कम आते हैं...जब जीवन ही स्टेल हो गया है तो लेखन में ताजगी कैसे आएगी...हम अपने ही बनाये घेरे में हमेशा घूमते रहेंगे तो नए की आशा व्यर्थ है... आप चिंतित ना हों कमो बेश सबका जीवन ऐसा ही है और इसमें अचानक कोई परिवर्तन आ जायेगा इसकी उम्मीद भी नहीं है...इसलिए जो जैसा है चलने दीजिये और जो मन में आये लिखते रहिये...बिंदास...
नीरज

परमजीत बाली said...

सुनो सब की करो मन की....

वैसे पहले अपनी सेहत का ध्यान रखे.....बाकी काम बाद में।

Murari Pareek said...

आप जल्दी स्वस्थ होंगे हमारी शुभ कामनाए आपके साथ है !!!

प्रवीण पाण्डेय said...

थकान स्वाभाविक है । शरीर और मन कुछ दिनों के अन्तराल में थकान को प्राप्त होता है । इस स्थिति में निर्णय न लें और कोई निष्कर्ष न निकालें । निष्कर्षों में अति सरलीकरण हो जाता है । विश्राम करें और ऊर्जान्वित हो साहित्य सजृन के लिये पुनः प्रस्तुत हों ।

सतीश पंचम said...

blogging ke aage jahaan aur bhi hai ghalib, ki koi is marz ki dava to bata de :)


Paka raha hu :)

Arvind Mishra said...

अब मांग पर लिखने वालों में ज्ञान जी कैसे हो गए ? गंगा तो मोक्षदाता हैं -यह गंगा लहरी चलतीरहे -इसमें प्रत्येक दिन और दर्शन पर नया बोध हो रहा है ! बच्चे अभी चंचल हैं उनकी चंचलता का साजो सामान मैं सायास अपने ब्लॉग पर इसलिए ही तो परोसता रहता हूँ की ऋषि तुल्य साधना चलती रहे अविराम अविकल ...चलिए कल के गंगा दर्शन के नव बोध का इंतज़ार रहेगा ! घोस्ट बाबू ज़रा खुद और अपने अनुयायियों को उधर भी लाईये न -मेरे ब्लॉग पर -यहाँ खलल क्यों डाल रहे हैं ? कहीं ब्लागेंद्र की तरफ से सायास तो नहीं भेजे जा रहे इधर ?

dhiru singh {धीरू सिंह} said...

thakohm na ,aaramam aanandam

कार्तिकेय मिश्र (Kartikeya Mishra) said...

अहा... आपको भी थकान आती है गुरुदेव। ऐसी परिस्थितियों में चाय बहुत काम आती है। गीता में स्वयं योगेश्वर कृष्ण ने कहा है...त्वया चापि, मया चापि! अर्थात तुम भी चाय पियो, मैं भी।

Ratan Singh Shekhawat said...

मुझे तो आपकी हर पोस्ट में विवधता ही नजर आती है | आप तो वही लिखिए जो आपको भाता हो |

अभिषेक ओझा said...

हम्म... वैसे मुझे आपकी हर पोस्ट में कम से कम एक नयी सी बात मिलती है. वर्ना मैं बहुत कम चीजें इतने नियमित तरीके से फोल्लो कर पाता हूँ. ब्लॉग तो बहुत कम. अक्सर रीडर खोलकर कीबोर्ड पर 'जे' प्रेस कर के निकाल देता हूँ कई ब्लॉग तो. अपनी बात कर रहा हूँ, पता नहीं वो कुछ मायने भी रखती है या नहीं :) ये तस्वीर तो पुरानी है न?

Pankaj Upadhyay said...

पान्डे जी.. ये राज़ मै समझ नही पाया हू कि हमे वो लिखना चाहिये जो हमे अच्छा लगता है, या वो लिखना चाहिये जिसपे टिप्प्णी ज्यादा मिले....

अनप्रेडिक्टेबल होना चाहिये लेकिन फिर सनीचरा,हीरालाल..... को सामने कौन लायेगा??? और वो भी सिर्फ़ इसलिये कि आप प्रेडिक्टेबल होते जा रहे है...

धर्म सन्कट है... गीता पढिये और हो सके तो हमे भी पढाइये..

राज भाटिय़ा said...

मै भी बहुत जबरदस्त थका हूं दो दिन मेहनत कर के, बस युही यहां से गुजरा तो देखा कीआप ने गला बांध रखा है, सो हाल पुछने आ गया मेरी शुभकानये, जल्दी से ठीक हो जाये

ANAND TRIPATHI said...

अभी अगर आप थक जायेगे तो हमारा क्या होगा
ऐसी पोस्ट ना लिख़े हम निराशा मिलती है

Praney ! said...

One question keep roaming in my mind since ‘by mistake’ I enrolled in ‘Chitthajagat’, whom do people here write for, for themselves -what comes in their own mind or for what others like or want them to write ?

amit said...

स्टेलनेस की बात नहीं है जी, लेकिन कभी-कभार फॉर ए चेन्ज भी तो होना चाहिए ना, ज़ाएका बदलने के लिए। अब जैसे रोज़ाना रोटी खाई जाती है, बदलाव के लिए कभी परांठा भी खा लिया जाता है, या फिर बाहर किसी रेस्तरां में डोसा वगैरह। इससे रोटी के प्रति जो उदासीनता उत्पन्न होने को होती है वह वहीं मर जाती है और पुनः स्टेपल डॉयट पर वापसी होती है। बस तो आप भी इस "विविध" होने के सुझाव को कुछ ऐसा ही लीजिए न।

गंगा माई किधर जा रही हैं, एक दिन उनकी जगह मोहल्ले और पड़ोस के मोहल्ले पर नज़र मार लीजिए और उसी पर ठेल दीजिए। पहले आप बीच-२ में आलू-टमाटर, मोहल्ले की चाय की दुकान, कुकुर आदि पर ठेल दिया करते थे तो स्वाद में बदलाव आ जाता था। :)

श्रद्धा जैन said...

Gyaan datt ji
aapki tabiyat jaldi theek ho dua karti hun......

post mein bhinnta aur man ke vichaar ka aur bhi gahra sochna zaruri hai

zindgi mein sabhi ke tharaav aa hi jaata hai
halanki badlaav zaruri hai

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