इस आकलन पर मैं आहत होता हूं। क्या ऐसा है?
नोट - यह पोस्ट मेरी पिछली पोस्ट के संदर्भ में है। वहां मैने नीलगाय के पक्ष में अपना रुंझान दिखाया था। मैं किसान के खिलाफ भी नहीं हूं, पर मैं उस समाधान की चाह रखता हूं जिसमें दोनों जी सकें। उसपर मुनीश जी ने कहा है - very Brown Sahib like thinking! इस पोस्ट में ब्राउन साहब (?) अपने अंदर को बाहर रख रहा है।
और क्या दमदार टिप्पणियां हैं पिछली पोस्ट पर। ऐसी परस्पर विरोधी, विचारों को खड़बड़ाने वाली टिप्पणियां पा कर तो कोई भी ब्लॉगर गार्डन गार्डन हो जाये! निशाचर जी तो अन्ततक लगे रहे नीलगायवादियों को खदेड़ने में! सारी डिबेट क्या क्या मारोगे और क्या क्या खाना छोड़ोगे की है! असल में समधान उस स्तर पर निकलना नहीं, जिस स्तर ने समस्या पैदा की है!
मेरे समधीजी कहते हैं – भईया, गांव जाया करो। जमीन से जुड़ाव महसूस होगा और गांव वाला भी आपको अपना समझेगा। जाने की जरूरत न हो, तब भी जाया करो – यूंही। छ महीने के अन्तराल पर साल में दो बार तो समधीजी से मिलता ही हूं। और हर बार यह बात कहते हैं - “भईया, अपने क्षेत्र में और गांव में तो मैं लोगों के साथ जमीन पर बैठने में शर्म नहीं महसूस करता। जो जमीन पर बैठे वो जम्मींदार और जो चौकी पर (कुर्सी पर) बैठे वो चौकीदार”! मैं हर बार उनसे कहता हूं कि गांव से जुड़ूंगा। पर हर बार वह एक खोखले संकल्प सा बन कर रह जाता है। मेरा दफ्तरी काम मुझे घसीटे रहता है। और क्या दमदार टिप्पणियां हैं पिछली पोस्ट पर। ऐसी परस्पर विरोधी, विचारों को खड़बड़ाने वाली टिप्पणियां पा कर तो कोई भी ब्लॉगर गार्डन गार्डन हो जाये! निशाचर जी तो अन्ततक लगे रहे नीलगायवादियों को खदेड़ने में! सारी डिबेट क्या क्या मारोगे और क्या क्या खाना छोड़ोगे की है! असल में समधान उस स्तर पर निकलना नहीं, जिस स्तर ने समस्या पैदा की है!
और मैं जम्मींदार बनने की बजाय चौकीदार बने रहने को अभिशप्त हूं?! गांव जाने लगूं तो क्या नीलगाय मारक में तब्दील हो जाऊंगा? शायद नहीं। पर तब समस्या बेहतर समझ कर समाधान की सोच सकूंगा।
संघ लोक सेवा आयोग के साक्षात्कार में केण्डीडेट सीधे या ऑब्ट्यूस सन्दर्भ में देशभक्ति ठेलने का यत्न करता है – ईमानदारी और देश सेवा के आदर्श री-इटरेट करता है। पता नहीं, साक्षात्कार लेने वाले कितना मनोरंजन पाते होते होंगे – “यही पठ्ठा जो आदर्श बूंक रहा है, साहब बनने पर (हमारी तरह) सुविधायें तलाशने लगेगा”! चयनित होने पर लड़की के माई-बाप दहेज ले कर दौड़ते हैं और उसके खुद के माई बाप अपने को राजा दरभंगा समझने लगते हैं। पर तीस साल नौकरी में गुजारने के बाद (असलियत में) मुझे लगता है कि जीवन सतत समझौतों का नाम है। कोई पैसा पीट रहा है तो अपने जमीर से समझौते कर रहा है पर जो नहीं भी कर रहा वह भी तरह तरह के समझौते ही कर रहा है। और नहीं तो मुनीश जी जैसे लोग हैं जो लैम्पूनिंग करते, आदमी को उसकी बिरादरी के आधार पर टैग चिपकाने को आतुर रहते हैं।
नहीं, यह आस्था चैनल नहीं है। और यह कोई डिफेंसिव स्टेटमेण्ट भी नहीं है। मेरी संवेदनायें किसान के साथ भी हैं और निरीह पशु के साथ भी। और कोई साहबी प्रिटेंशन्स भी नहीं हैं। हां, यह प्रलाप अवश्य है – चूंकि मेरे पास कई मुद्दों के समाधान नहीं हैं। पर कितने लोगों के पास समाधान हैं? अधिकांश प्रलाप ही तो कर रहे हैं। और मेरा प्रलाप उनके प्रलाप से घटिया थोड़े ही है!






37Comments so far:
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@ "अधिकांश प्रलाप ही तो कर रहे हैं .."
मेरे नाटक का बुद्ध भी यूँ ही बड़बड़ाने वाला प्रलापी है, पर....
I am one of your admirers Gyan ji
and it was not my intention to hurt you , but if it so happened ,even though in a humourous vein,I apologise unconditionally.
यह हमारे देश में दी जाने वाली शिक्षा का ही परिणाम है।
तो गौर फरमाए...
जम्मीदार तो बनना ही पड़ेगा, चाहे जैसे भी हालात हो चाहे प्रकृति को बचाना हो या बिगाड़ना हो ( अगर एक नया मेट्रोपोलिटन सिटी ही बसाना हो):) , अपने मन का नया काम कमसे कम भारतीय शहरों में तो नहीं ही किया जा सकता है. तो अगर सुविधा है तो जड़ो को पकड़ के रखिये. हां जड़ को फिर से ज़माने में मेहनत तो लगेगी ही.
पिछली पोस्ट सचमुच मानसिक हलचल पैदा करने वाली रही, कुछ हलचल मेरी तरफ से-
नीलगाय वाली समस्या का हल निशाचर जी की आखिरी टिपण्णी और आप के ब्लॉग के प्रारंभ में ही है, ये बात अलग है की बहस शहरी और ग्रामीण के नाम पर झिक झिक में बदल गयी. फ़ूड चेन के सबसे शिखर पर बैठे प्राकृतिक नियंत्रक यानी बड़े शिकारी शेर, बाघ, चीता, तेंदुआ, लोमड़ी, सियार, लकड़ बग्घा को तो "धर्मभीरु " राजा, नवाब और शिकारी साहब लोग मार के खा गए, तो नीचे की जनसँख्या का नियंत्रण कौन करेगा. इसलिए एक समझदार तरीका तो अपनाना ही होगा, नियंत्रित तरीके से पुराने पाप का असर कम करना ही होगा चाहे ये नया पाप ही हो . एक टिपण्णी और है कि नीलगायो का बंध्याकरण कर दिया जाय, सुनने में ये शायद कम क्रूर लगे, लेकिन ये एक अव्यवहारिक कदम ही होगा, नीलगाय ना तो दो चार की संख्या में है, ना तो पालतू जानवर है की उसको पकड़ा जा सके, तथा बंध्याकरण पर भी वो भोजन करना तो छोड़ेंगे नहीं, हां शायद वो ज्यादे आक्रामक हो जायेंगे ( ये तो सभी स्वीकार करेंगे की गैर पालतू जानवर का व्यवहार उसके शारीरिक परिवर्तन के बाद क्या होगा इसका केवल अनुमान लगाया जा सकता है). बेहतर यही होगा की प्राकृतिक संरक्षण को ध्यान में रखते हुए संरक्षित शिकार के साथ नीलगायो की जनसँख्या को नियंत्रित किया जाए.
आप गाँव गिरावं जाया करिए -जरा जमीन जायदाद पर पर भी नजर रखिये . लेकिन आप बहुत खटकेंगे उन की नज़रो मे जो आज कल देखभाल कर रहे आप की जायदाद का
और यह समधी जी का क्या रहस्य है...
आपसे सहमत हूँ |
समधी जी की बात सही है , गाँव जाना और समझना
जीवन को सम्पूर्णता में समझने में मदद देता है | किन्तु जो
न जा पायें उनकी संवेदनशीलता को किसी खांचे में फिट करना
असहिष्णुता होगी , ( चाहे वह '' Brown Sahib '' का खांचा ही क्यों न हो )
ऐसी स्थिति में बात देखी जानी चाहिए न कि बैक-ग्राउंड
यानी ''मोल करो तलवार का पड़ी रहन दो म्यान '' | क्या ग्राम
जीवन को ''आहा! ग्राम जीवन ही क्या है ...'' के भाव से देखा जा
सकता है ?,और ऐसी स्थिति में कोई आलोचनापरक हो तो उस पर
नागर-संस्कृति का तमगा लगा देना निश्यय ही अनुचित होगा |
@ हिमांशु जी
आपने ' व्यापक दर्द ' में अपने बुद्ध का दर्द भी समेत दिया !
विनम्र और सटीक ...!!!
@ नीलगाय : बचाओ या मारो विवाद
क्या कहूँ --- '' लोग नुक्ते का भी अफसाना बना लेते हैं ...''
धन्यवाद
-वैसे गांव जाया करिये कभी कभी..अच्छा लगता है-
-बकिया मामला तो निपट गया. :)
प्रवीण शर्मा: ...एक टिपण्णी और है कि नीलगायो का बंध्याकरण कर दिया जाय, सुनने में ये शायद कम क्रूर लगे, लेकिन ये एक अव्यवहारिक कदम ही होगा, नीलगाय ना तो दो चार की संख्या में है, ना तो पालतू जानवर है की उसको पकड़ा जा सके, तथा बंध्याकरण पर भी वो भोजन करना तो छोड़ेंगे नहीं, हां शायद वो ज्यादे आक्रामक हो जायेंगे ( ये तो सभी स्वीकार करेंगे की गैर पालतू जानवर का व्यवहार उसके शारीरिक परिवर्तन के बाद क्या होगा इसका केवल अनुमान लगाया जा सकता है)....
नीलगायों के बन्ध्याकरण का सुझाव इसलिए दिया गया था कि इससे उनके प्रजनन पर नियन्त्रण होगा जो भविष्य में इनकी संख्या को कम करने में सहायक होगा। केवल नर नीलगायों [सही शब्द है या नहीं? नीलवृषभ:)] को चिह्नित करके उनकी प्रजनन क्षमता नष्ट कर देने में कोई बड़ी क्रूरता नहीं है। गाँव में पहले बछड़े को बैल बनाने के लिए उसका बन्ध्याकरण गाँव के ही कुछ लोग खास रीति से कर देते थे। यह थोड़ी क्रूर भी थी। इसमें उसके बृषण (अंडकोष) को पत्थर से कूट कर बेकार कर दिया जाता था, शुक्रवाहिनी नली को भी कुचलकर अवरुद्ध किया जाता था। अब शायद कोई वैज्ञानिक तरीका अपनाया जाता है। नर नीलगायों को ध्यान में रखकर कोई तकनीक ईजाद की जानी चाहिए।
किसान का हित नीलगाय की जान से कम महत्वपूर्ण नहीं है। लेकिन इसके लिए नीलगाय की जान लेना ही एकमात्र विकल्प नहीं माना जा सकता है।
घुन्नन मिलन पार्ट-२ लिख दूँ क्या?
" जीवन सतत समझौतों का नाम है। "
& agree 100 % :-)
&
PETA ...is a powerful insitution !
अगर आप ब्राउन साहब भी हों, तो भी अधिसंख्यों से लाख गुना बेहतर हैं।
रही बात गाँव जाने की, तो सिर्फ ताजी हवा और ताजा दूध के सिवा कुछ भी स्वस्थ नहीं मिलेगा अब आपको। गाँवों का वातावरण भी बहुत विषाक्त हो चुका है। टुच्ची राजनीति, सामाजिक सरोकारों और तेजी से बदलते मानदंडॊं ने कुछ भी पहले जैसा नहीं रहने दिया है।
आदरणीय ज्ञान जी, एक महत्त्वपूर्ण एवं ज्वलंत विषय पर पोस्ट लिखने के लिए धन्यवाद. यह चर्चा शायद कुछ लम्बी खिंचती यदि comment moderation न होता (कृपया इसे अपने अधिकार क्षेत्र में अतिक्रमण न माने). इसी तरह व्यावहारिक परन्तु अनछुए मुद्दों पर स्वस्थ एवं रचनात्मक बहस होती रहे तो ब्लागजगत का वातावरण ज्यादा शुद्ध एवं "स्वच्छ" रहेगा. प्रणाम स्वीकार करें.
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