मेरी गली में कल रात लोगों ने दिये जला रखे थे। ध्यान गया कि एकादशी है - देव दीपावली। देवता जग गये हैं। अब शादी-शुभ कर्म प्रारम्भ होंगे। आज वाराणसी में होता तो घाटों पर भव्य जगमहाहट देखता। यहां तो घाट पर गंगाजी अकेले चुप चाप बह रही थीं। मैं और मेरी पत्नीजी भर थे जो एकादशी के चांद और टॉर्च की रोशनी में रेत की चांदी की परत और जलराशि का झिलमिलाना निहार रहे थे।
Friday, October 30, 2009
देव दीपावली @
ब्लॉग लेखन - ज्ञानदत्त पाण्डेय Gyandutt Pandey समय (भारत) 4:00 AM
| प्रतिक्रियायें : |
Wednesday, October 28, 2009
हाँकोगे तो हाँफोगे
विवाह के तुरन्त बाद ही मुझे एक विशेष सलाह दी गयी:
’हाँकोगे तो हाँफोगे’
गूढ़ मन्त्र समझ में आने में समय लगता है| हर बार विचार करने में एक नया आयाम सामने आता है। कुछ मन्त्र तो सिद्ध करने में जीवन निकल जाते हैं।
ब्लॉग लेखन - ज्ञानदत्त पाण्डेय Gyandutt Pandey समय (भारत) 4:00 AM
| प्रतिक्रियायें : |
Tuesday, October 27, 2009
सोंइस होने की गवाही
निषादघाट पर वे चार बैठे थे। मैने पहचाना कि उनमें से आखिरी छोर पर अवधेश हैं। अवधेश से पूछा – डाल्फिन देखी है? सोंइस।
उत्तर मिला – नाहीं, आज नाहीं देखानि (नहीं आज नहीं दिखी)।
लेकिन दिखती है?
हां कालि रही (हां, कल थी)।
ब्लॉग लेखन - ज्ञानदत्त पाण्डेय Gyandutt Pandey समय (भारत) 4:00 AM
| प्रतिक्रियायें : |
Sunday, October 25, 2009
जवाहिरलाल बीमार है
कुत्तों और बकरियों का प्रिय पात्र है वह। आदमियों से ज्यादा उनसे सम्प्रेषण करता है। कुत्तों के तो नाम भी हैं – नेपुरा, तिलंगी, कजरी। आप जवाहिरलाल से पूर्वपरिचित हैं। तीन पोस्टें हैं जवाहिरलाल पर -
ब्लॉग लेखन - ज्ञानदत्त पाण्डेय Gyandutt Pandey समय (भारत) 4:00 AM
| प्रतिक्रियायें : |
Saturday, October 24, 2009
शिवकुटी घाट पर छठ
आज ब्लॉगरी के सेमीनार से लौटा तो पत्नीजी गंगा किनारे ले गयीं छठ का मनाया जाना देखने। और क्या मनमोहक दृष्य थे, यद्यपि पूजा समाप्त हो गयी थी और लोग लौटने लगे थे।
चित्र देखिये:
ब्लॉग लेखन - ज्ञानदत्त पाण्डेय Gyandutt Pandey समय (भारत) 8:16 PM
| प्रतिक्रियायें : |
Friday, October 23, 2009
अवधेश और चिरंजीलाल
मैं उनकी देशज भाषा समझ रहा था, पर उनका हास्य मेरे पल्ले नहीं पड़ रहा था। पास के केवट थे वे। सवेरे के निपटान के बाद गंगा किनारे बैठे सुरती दबा रहे थे होठ के नीचे। निषादघाट पर एक किनारे बंधी नाव के पास बैठे थे। यह नाव माल्या प्वाइण्ट से देशी शराब ट्रांसपोर्ट का भी काम करती है।
वे उन्मुक्त भाव से हंस रहे थे और मैं अपनी ठुड्डी सहला रहा था – आखिर इसमें हंसने की बात क्या है? बड़ा कॉंस्टीपेटेड समझदान है हमारा – लोगों के सरल हास्य तक नहीं पंहुंच पाता। मैं उनसे बात करने का प्रयास करता हूं – यह नाव आपकी है? पहले वे चुप हो जाते हैं फिर एक जवाब देता है – नहीं, पर हमारे पास भी है, अभी झूरे (सूखे) में है। जब सब्जी होगी तो उस पार से लाने के काम आयेगी।
ब्लॉग लेखन - ज्ञानदत्त पाण्डेय Gyandutt Pandey समय (भारत) 4:00 AM
| प्रतिक्रियायें : |
Wednesday, October 21, 2009
सपाटा और सन्नाटा
ज्ञाता कहते हैं कि विश्व सपाट हो गया है। न केवल सपाट हो गया है अपितु सिकुड़ भी गया है। सूचना और विचारों का आदान प्रदान सरलतम स्थिति में पहुँच गया है। अब सबके पास वह सब कुछ उपलब्ध है जिससे वह कुछ भी बन सकता है। जहाँ हमारी सोच को विविधता दी नयी दिशाओं मे बढ़ने के लिये वहीं सभी को समान अवसर दिया अपनी प्रतिभा को प्रदर्शित करने का। अब निश्चय यह नहीं करना है कि क्या करें अपितु यह है कि क्या न करें। यह सोचकर बहुत से दुनिया के मेले में पहुँचने लगते हैं।
ब्लॉग लेखन - ज्ञानदत्त पाण्डेय Gyandutt Pandey समय (भारत) 4:00 AM
| प्रतिक्रियायें : |
Tuesday, October 20, 2009
चप्पला पहिर क चलबे?
एक लड़की और दो लड़के (किशोरावस्था का आइडिया मत फुटाइये), छोटे बच्चे; दिवाली की लोगों की पूजा से बचे दिये, केले और प्रसाद बीन रहे थे। तीनो ने प्लास्टिक की पन्नियों में संतोषजनक मात्रा में जमा कर ली थी सामग्री। घाट से लौटने की बारी थी।
ब्लॉग लेखन - ज्ञानदत्त पाण्डेय Gyandutt Pandey समय (भारत) 4:00 AM
| प्रतिक्रियायें : |
Sunday, October 18, 2009
उत्क्रमित प्रव्रजन
ब्लॉग लेखन - ज्ञानदत्त पाण्डेय Gyandutt Pandey समय (भारत) 4:00 AM
| प्रतिक्रियायें : |
Friday, October 16, 2009
शिक्षा व्यवस्था – ज्ञानदत्त पाण्डेय
मैं रिच डैड पूअर डैड पढ़ता हूं और वहां धनवान (पढ़ें सफल) बनने की शिक्षा बड़े अनौपचारिक तरीके से रिच डैड देते पाये जाते हैं। मैं मास्टर महाशय के रामकृष्ण परमहंस के संस्मरण पढ़ता हूं। रामकृष्ण निरक्षर हैं। वे जोड़ के बाद घटाना न सीख पाये – आमी विजोग कोरबे ना! और मास्टर महाशय यूनिवर्सिटी के प्राध्यापक होते हुये भी रामकृष्ण परमहंस के सामने नतमस्तक हैं।
ब्लॉग लेखन - ज्ञानदत्त पाण्डेय Gyandutt Pandey समय (भारत) 4:00 AM
| प्रतिक्रियायें : |
Wednesday, October 14, 2009
शिक्षा व्यवस्था
ब्लॉग लेखन - ज्ञानदत्त पाण्डेय Gyandutt Pandey समय (भारत) 4:00 AM
| प्रतिक्रियायें : |
Tuesday, October 13, 2009
रेत, वैतरणी नाला और बन्दर पांड़े
सो बनती है गड्डमड्ड पोस्ट – जैसे कि यह!
ब्लॉग लेखन - ज्ञानदत्त पाण्डेय Gyandutt Pandey समय (भारत) 4:00 AM
| प्रतिक्रियायें : |
Sunday, October 11, 2009
स्त्रियों के गंगा स्नान का महीना - कार्तिक
मैं तो सवेरे पौने छ बजे गंगा तट पर जाता हूं। बहुत सी स्त्रियां लौटती दीखती हैं और कई तो स्नान के बाद पण्डाजी के पास संकल्प करती पाई जाती हैं। बहुत सी शंकर जी के मन्दिर में पूजा-अर्चना में दीखती हैं।
ब्लॉग लेखन - ज्ञानदत्त पाण्डेय Gyandutt Pandey समय (भारत) 6:52 AM
| प्रतिक्रियायें : |
Saturday, October 10, 2009
पतझड़
ऋतुयें हैं – ग्रीष्म, वर्षा, शरद, शिशिर, हेमन्त वसन्त। पतझड़ क्या है – ऑटम (Autumn) शरद भी है और हेमन्त भी। दोनो में पत्ते झड़ते हैं।
ब्लॉग लेखन - ज्ञानदत्त पाण्डेय Gyandutt Pandey समय (भारत) 4:00 AM
| प्रतिक्रियायें : |
Wednesday, October 7, 2009
कहीं धूप तो कहीं छाँव
आप यदि अपने कार्य क्षेत्र में देखें तो व्यक्तित्वों के ४ आयाम दिखायी पड़ेंगे।
ब्लॉग लेखन - ज्ञानदत्त पाण्डेय Gyandutt Pandey समय (भारत) 4:00 AM
| प्रतिक्रियायें : |
Monday, October 5, 2009
हिन्दू धर्म के रहस्यों की खोज
कल जो लिखा – “लिबरेशनम् देहि माम!” तो मन में यही था कि लोग इन सभी कमियों के बावजूद हिन्दू धर्म को एक महान धर्म बतायेंगे। यह नहीं मालुम था कि श्री सतीश सक्सेना भी होंगे जो हिन्दुत्व को कोसने को हाथो हाथ लेंगे। और मैं अचानक चहकते हुये थम गया।
«« गंगा किनारे सवेरा।
सोचना लाजमी था – इस देश में एक आस्तिक विरासत, ब्राह्मणिक भूत काल का अनजाना गौरव, भाषा और लोगों से गहन तौर पर न सही, तथ्यात्मक खोजपरख की दृष्टि से पर्याप्त परिचय के बावजूद कितना समझता हूं हिन्दू धर्म को। शायद बहुत कम।
ब्लॉग लेखन - ज्ञानदत्त पाण्डेय Gyandutt Pandey समय (भारत) 4:00 AM
| प्रतिक्रियायें : |
Sunday, October 4, 2009
लिबरेशनम् देहि माम!
अद्भुत है हिन्दू धर्म! शिवरात्रि के रतजगे में चूहे को शिव जी के ऊपर चढ़े प्रसाद को कुतरते देख मूलशंकर मूर्तिपूजा विरोधी हो कर स्वामी दयानन्द बन जाते हैं। सत्यार्थप्रकाश के समुल्लासों में मूर्ति पूजकों की बखिया ही नहीं उधेड़ते, वरन गमछा-कुरता-धोती तार तार कर देते हैं। पर मूर्ति पूजक हैं कि अभी तक गोईंग स्ट्रॉग!
ब्लॉग लेखन - ज्ञानदत्त पाण्डेय Gyandutt Pandey समय (भारत) 4:00 AM
| प्रतिक्रियायें : |
Friday, October 2, 2009
पकल्ले बे, नरियर!
गरीब, चपल और प्रसन्न बच्चे।
ब्लॉग लेखन - ज्ञानदत्त पाण्डेय Gyandutt Pandey समय (भारत) 4:00 AM
| प्रतिक्रियायें : |




