tag:blogger.com,1999:blog-7822286262846371486.post-1450307941790367882008-03-24T04:30:00.003+05:302009-04-19T11:31:10.109+05:30हैरीपॉटरीय ब्लॉग की चाहत<hr style="width: 100%; height: 2px;">मैने हैरी पॉटर नहीं पढ़ा। मुझे बताया गया कि वह चन्द्रकांता संतति या भूतनाथ जैसी तिलस्मी रचना है। चन्द्रकांता संतति को पढ़ने के लिये उस समय की बनारस की अंग्रेज मेमों ने हिन्दी सीखी थी। नो वण्डर कि हैरी पॉटर पर इतनी हांव-हांव होती है।<br /><img alt="" src="http://writer.zoho.com/ImageDisplay.im?name=361614000000093003/1206247597396_Harry%20Potter.jpg&accId=361614000000002007" align="bottom" border="0" hspace="10" vspace="10" /><br />पर अब अगर हैरी पॉटर नुमा कुछ पढ़ना चाहूंगा तो ब्लॉग पर पढ़ना चाहूंगा। जेके रॉलिंस या देवकीनन्दन खत्री की प्रतिभा के दीवाने नहीं हैं क्या ब्लॉग जगत में?! वैसे तो <a href="http://azdak.blogspot.com/2008/03/blog-post_143.html">चचा हैदर वाले पॉडकास्ट में अज़दक</a> ने बारिश और टंगट्विस्टर भाषा के साथ जो प्रयोग किये हैं, उसे देख कर लगता है कि पटखनीआसन के बाद अगर वे "तिलस्म के अज़दकीय पॉडकास्ट" की शृंखला चलाये तो सबसे हिट ब्लॉगर साबित होंगे। खैर, मैं यह कदापि नहीं कहना चाहता कि वे अभी सबसे हिट नहीं हैं। पर बकरी की लेंड़ी की बजाय हैरीपॉटर का तिलस्म कहीं ज्यादा प्रिय लगेगा। और असली चीज है कि समझ में आयेगा। <img alt="" src="http://writer.zoho.com/ImageDisplay.im?name=361614000000093003/1206250749757_Harry-Potter.jpg&accId=361614000000002007" align="right" border="0" hspace="10" vspace="10" /><br /><br />हैरीपॉटरीय पोस्ट लिखने में <a href="http://hindini.com/fursatiya/">अनूप सुकुल </a>भी मुझे जबरदस्त काबिल लगते हैं। <a href="http://alokpuranik.com/">अगड़म-बगड़म पुराणिक </a>कदापि नहीं लगते। वे तो भूत-राखी-सेहरावत-चुड़ैल के साथ शाश्वत प्रयोग धर्मी हैं, पर सब के साथ व्यंग की तिताई लपेट देते हैं; वहीं गड़बड़ हो जाता है। तिलस्म चले तो बिना व्यंग के चले! <a href="http://shiv-gyan.blogspot.com/">शिव कुमार मिश्र</a> शायद लिख पाते, पर वे भी दुर्योधन की डायरी ले कर व्यंगकारों की *** टोली में जा घुसे हैं। कभी कभी ही जायका बदलने को दिनकर जी को ठेलते हैं ब्लॉग पर!<br /><br />खैर, और भी बहुत हैं प्रतिभा सम्पन्न। आशा है कोई न कोई आगे आयेंगे। और नहीं आये तो साल छ महीने बाद हम ही ट्राई मारेंगे। अपना अवसाद मिटाने को ऐसा लेखन-पठन होना चाहिये।<br /><br />और <a href="http://anahadnaad.wordpress.com/" target="_blank" title="">प्रियंकर जी </a>कहां गये - हैरीपॉटर/चन्द्रकांता संतति उनके लिये साहित्य की छुद्र पायदान हो सकती है। पर वे टिप्पणी तो कर ही सकते हैं!<br /><br /><span style="font-size:85%;">(चित्र <a href="http://www.google.com/url?sa=t&ct=res&cd=3&url=http%3A%2F%2Fwww.jkrowling.com%2F&ei=y-DlR9GfAoqw6wPvzZi6CA&usg=AFQjCNGBQiaNHIjCilED5XkahoSS9ytSYg&sig2=raOZZqmxHE25Mf1bDH5yZw">जेके रॉलिंस की ऑफीशियल वेब साइट</a> से।)</span><hr style="width: 100%; height: 2px;">कल बापू पर एक्स्ट्रीम रियेक्शंस मिले। अच्छा रहा। आश्चर्य नहीं हुआ। मैं अगर योगेश्वर कृष्ण पर चर्चा के लिये आह्वान करता तो भी शायद एक्स्ट्रीम रियेक्शंस मिलते!<br />श्री अरविन्द के सामने एक विक्षिप्त से लगते कुल्लासामी (मैं शायद नाम के हिज्जे ठीक से नहीं लिख पा रहा) ने चाय के कप को उलटा-पलटा। श्री अरविन्द ने बताया कि उसका अर्थ है कि अगर कप को भरना हो तो पहले खाली करना चाहिये। हमारे दिमाग में भी अगर कुछ भरना है तो पहले खाली करना होगा!<br /><hr /><div class="blogger-post-footer"><center><script type="text/javascript"><!--
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