tag:blogger.com,1999:blog-7822286262846371486.post-19186377847579548382008-03-23T07:36:00.001+05:302009-04-19T11:28:46.945+05:30दीपक पटेल जी की सोच<hr style="width: 100%; height: 2px;" zid="1"><img align="right" alt="" border="0" hspace="10" src="http://writer.zoho.com:80/ImageDisplay.im?name=361614000000088001/1206163046487_gandhi.jpg&accId=361614000000002007" style="width: 226px; height: 147px;" vspace="10" zid="23"><span style="font-weight: bold;" zid="24">दीपक पटेल जी </span>कौन हैं - पता नहीं। मेरी <a href="http://hgdp.blogspot.com/2008/03/blog-post_20.html" zid="5">राजभाषा बैठक के दौरान इधर उधर की</a> वाली पोस्ट में बापू के लिखे के अनुवाद पर <a href="http://hgdp.blogspot.com/2008/03/blog-post_20.html#c3471922949983612967" zid="4">उनकी रोमनागरी में हिन्दी टिप्पणियां </a>हैं। कोई लिंक नहीं है जिससे उनका प्रोफाइल जाना जा सकता। पर उन्होनें जो टिप्पणियों में लिखा है; उसके मुताबिक वे बहुत प्रिय पात्र लगते हैं। उनकी हिन्दी का स्तर भी बहुत अच्छा है (बस, देवनागरी लेखन के टूल नहीं हैं शायद)। ऐसे लोग हिन्दी में नेट पर कण्ट्रीब्यूटर होने चाहियें।<br zid="6"><br zid="7">मैं तो उनकी टिप्पणी पर फुटकर विचार रखना चाहूंगा:<br zid="8"><ol zid="9"><li zid="10">बापू हमारे राष्ट्रपिता ही नहीं, हमारी नैतिकता के उच्चतम आदर्श हैं। भारत में जन्मने के जो भी कष्ट हों; हममें अन्तत: वह गर्व-भाव तो रहेगा ही कि यह हमारा वह देश है, जहां बापू जन्मे, रहे और कर्म किये। उनके आश्रम में उनकी वस्तुयें देखी परखी हैं और एक रोमांच मन में सदैव होता है कि इतना सरल आदमी इतना ऊंचा उठ गया। हमें उन लोगों से मिलने का भी गर्व है जो कभी न कभी बापू के सम्पर्क में आये थे।</li><li zid="12">बापू की भाषा - मैं उनकी अंग्रेजी की बात कर रहा हूं, इतनी सरल है कि समझने में कोई कठिनाई नहीं होती। शुरू में, स्कूली दिनों में, जब हमें अंग्रेजी कम आती थी तो गांधीजी की आत्मकथा और अन्य पतली-पतली बुकलेट्स जो उन्होंने लिखी थीं, मन लगा कर पढ़ते थे जिससे कि अंग्रेजी सीख सकें। बापू के कहे का आशय समझ में न आ सके - यह अटपटा लगता है। यह तो तभी हो सकता है जब किसी बन्दे का एण्टीना बापू के सिगनल पर शून्य एम्प्लीफिकेशन और राखी सावन्त के सिगनल पर 10K का एम्प्लीफिकेशन फैक्टर रखता हो। पर ऐसा व्यक्ति वास्तव में बिना सींग-पूंछ का अजूबा ही होगा।</li><li zid="14">इस ब्लॉगजगत में कई विद्वान ऐसे होंगे जो मरकहे बैल की तरह बापू को गरिया/धकिया सकते हैं। बापू को आउट डेटेड बता सकते हैं। बापू तो हिन्दी की तरह हैं - मीक और लल्लू! पर क्राइस्ट की माने तो भविष्य मीक और लल्लू का ही है। और एक प्रकार से सदा रहा है। बस - मीक और लल्लू के बदले कायर न पढ़ा जाये। मुझे बापू जैसा साहसी वर्तमान युग में देखने को नहीं मिला। जो आदमी अपनी न कही जा सकने वाली गलतियां भी स्वीकारने में झेंप न महसूस करे, उससे बड़ा साहसी कौन होगा? और मित्रों, हम साहस हीनता (<span style="text-decoration: line-through;" zid="22">दुस्साहस नहीं</span>) से ही तो जूझ रहे हैं? <br zid="15"></li></ol>दीपक पटेल जी की सोच को मेरी फुटकर पोस्ट ने टिकल किया; यह जान कर मुझे प्रसन्नता है। बापू की वर्तमान युग में प्रासंगिकता पर चर्चा होनी चाहिये और कस कर होनी चाहिये। <br zid="19"><br zid="20"><span style="font-weight: bold;" zid="21">ब्लॉगजगत में महाफटीचर विषयों पर अन्तहीन चर्चा होती है। बापू जैसे सार्थक चरित्र पर क्यों नहीं हो सकती?!</span><hr style="width: 100%; height: 2px;" zid="17"><div class="blogger-post-footer"><center><script type="text/javascript"><!-- google_ad_client = "pub-5359079673189253"; /* 468x60, created 4/27/08 */ google_ad_slot = "6177529860"; google_ad_width = 468; google_ad_height = 60; //--> </script> <script type="text/javascript" src="http://pagead2.googlesyndication.com/pagead/show_ads.js"> </script></center><img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7822286262846371486-1918637784757954838?l=halchal.gyandutt.com'/></div>ज्ञानदत्त पाण्डेय | Gyandutt Pandeyhttp://www.blogger.com/profile/05293412290435900116noreply@blogger.com21